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कारोबारी प्रतिष्ठानों के नाम आने से मचा हड़कंप: प्रशासनिक संरक्षण में चला कथित जमीन घोटाला

KHULASA FIRST

संवाददाता

01 मई 2026, 7:15 pm
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कारोबारी प्रतिष्ठानों के नाम आने से मचा हड़कंप

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर की सबसे कीमती व संरक्षित मानी जाने वाली ग्रीन-बेल्ट जमीन पर सबसे बड़े भूमि घोटाले का खुलासा हुआ है। विदुर नगर और झूलेलाल नगर सह. संस्थाओं के नाम पर फर्जी दस्तावेज, कूटरचित नामांतरण, अवैध रजिस्ट्रियां और डमी संस्थाएं बनाकर हजारों प्लॉट बेच दिए गए।

आरोप है कि सहकारिता विभाग, कलेक्ट्रेट, रजिस्ट्रार कार्यालय व कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से 1000 करोड़ से अधिक की शासकीय व ग्रीन-बेल्ट भूमि बेच दी गई। शिकायतकर्ताओं ने इसे संगठित भूमाफिया नेटवर्क बताते हुए एफआईआर दर्ज करने, जमीन की रिकवरी और दोषियों की गिरफ्तारी की मांग उठाई है।

5 हजार से ज्यादा फर्जी प्लॉट बेचने का आरोप- आरोपों के मुताबिक विदुर नगर गृह निर्माण सहकारी संस्था के नाम पर रजिस्ट्री क्रमांक 2584 और 2585 दिनांक 14 सितंबर 1995 के आधार पर 135.69 एकड़ ग्रीन-बेल्ट जमीन पर कब्जा जमाया गया।

इसके बाद इस भूमि पर 5000 से अधिक फर्जी प्लॉट बेच दिए गए। शिकायत में कहा गया है कि जमीन की मूल स्थिति और मालिकाना हक छिपाकर अपात्र लोगों को सदस्य बनाया गया तथा नियमों के खिलाफ एक ही परिवार को दो-दो, तीन-तीन प्लॉट तक आवंटित कर दिए गए।

835 पुराने आवंटियों का क्या हुआ?- शिकायत में यह बड़ा सवाल भी उठाया गया है कि वर्ष 1975 से 1995 के बीच जिन 835 लोगों को संस्था द्वारा भूखंड आवंटित किए गए थे, उनकी जमीन आखिर कहां गई? आरोप है कि पुराने सदस्यों के भूखंड निरस्त कर नए फर्जी सदस्य बनाए गए और करोड़ों रुपए की जमीन पर नया खेल शुरू कर दिया गया।

चर्चित कारोबारी प्रतिष्ठानों के नाम का खुलासा- शिकायत में शहर के कुछ चर्चित कारोबारी प्रतिष्ठानों के नाम का खुलासा किया गया है। इनमें शिरोमणि ज्वेलर्स (सराफा बाजार), आरती स्वीट्स (टॉवर चौराहा), गुलमोहर मार्केटिंग और आर्य कन्फेक्शनरी (पोलो ग्राउंड) का उल्लेख किया गया है।

आरोप है कि 3 नवंबर 2015 को जांच के निर्देश जारी किए गए थे, लेकिन पूरा मामला वर्षों तक दबाकर रखा गया। हर बार जांच का हवाला देकर फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, जबकि जमीन की खरीदी-बिक्री लगातार जारी रही।

28 एकड़ पर खड़ी कर दी ‘डमी’ झूलेलाल नगर संस्था
मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह कि विदुर नगर की ही जमीन में से 28.33 एकड़ भूमि निकालकर झूलेलाल नगर संस्था नाम से कथित डमी संस्था बनाई गई। रजिस्ट्री क्रमांक 4829 और 4830 दिनांक 24 मार्च 1998 के जरिये इस जमीन को कृषि भूमि बताकर बेच दिया गया। आरोप है कि यहां भी 2000 से ज्यादा अतिरिक्त प्लॉट काटे गए और रजिस्ट्री शुल्क में अवैध छूट लेकर शासन को करोड़ों का नुकसान पहुंचाया गया।

संस्था पर कब्जा, रिश्तेदारों को सदस्यता और प्लॉटों की बंदरबांट
आरोप है कि 1997-98 में संस्था की बैठकों के जरिये राजकुमार खतुरिया, मोहन रामरख्यानी और नारायणदास ने मिलकर संस्था के प्रमुख पदों पर कब्जा कर लिया। बाद में अपने रिश्तेदारों और करीबी लोगों को सदस्य बनाकर प्लॉट आवंटित किए गए।

ऑडिट रिपोर्ट में एक ही पते के पांच-पांच और छह-छह लोगों को सदस्य बनाए जाने का उल्लेख बताया गया है, जबकि सहकारिता अधिनियम के अनुसार पहले से मकान या प्लॉट रखने वाला व्यक्ति संस्था का सदस्य नहीं बन सकता।

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