भारत में अस्वीकार्य सर तन से जुदा: इलाहाबाद हाई कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी
KHULASA FIRST
संवाददाता

‘गुस्ताख-ए-नबी’ की एक ही सजा, सर तन से जुदा' नारे पर हाई कोर्ट का रुख बेहद सख्त
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सर तन से जुदा नारे को देश की संप्रभुता के लिए चुनौती बताया, कोर्ट ने ‘जय श्रीराम’, ‘हर-हर महादेव’, ‘अल्लाह हू अकबर’ से अलग बताया सर तन से जुदा नारा
कोर्ट ने कहा- ये महज एक नारा नहीं, भारतीय कानून के शासन, देश की संप्रभुता, अखंडता को सीधी चुनौती है
सर तन से जुदा पर न्यायपालिका का सख्त व ऐतिहासिक फैसला, नारे को सशस्त्र विद्रोह के लिए उकसाने वाला करार दिया
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सोमवार को एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल के प्रमुख मौलाना तौकीर रजा खान की जमानत याचिका खारिज कर दी। यह मामला सितंबर 2025 में उत्तर प्रदेश के बरेली में हुई हिंसा से जुड़ा है। इस दौरान कोर्ट ने ‘सर तन से जुदा’ नारे को लेकर बेहद सख्त और ऐतिहासिक टिप्पणी की है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा’ का नारा महज किसी धार्मिक विश्वास की अभिव्यक्ति नहीं है। यह देश की संप्रभुता को चुनौती है।
यह नारा भारतीय कानून के शासन, देश की संप्रभुता और अखंडता के लिए एक सीधी चुनौती है। यह सशस्त्र विद्रोह को एक तरह का उकसावा है। कोर्ट के मुताबिक इस तरह के भड़काऊ नारे लोगों को एक तरह से ‘सशस्त्र विद्रोह’ के लिए उकसाते हैं, जो कानूनन पूरी तरह दंडनीय है।
इस नारे की तुलना अन्य धार्मिक नारों से की गई थी, जिसे कोर्ट ने अस्वीकार कर याचिका पर सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि ‘सर तन से जुदा’ के नारे को अन्य धार्मिक नारों के समकक्ष नहीं रखा जा सकता। ‘जय श्री राम’, ‘हर-हर महादेव’, ‘अल्लाह हू अकबर’ या ‘सतश्री अकाल’ जैसे नारे संबंधित भगवान, ईश्वर या गुरु के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए लगाए जाते हैं। इसके विपरीत ‘सर तन से जुदा’ का नारा किसी सम्मान को नहीं, बल्कि हिंसा और कानून के उल्लंघन को बढ़ावा देता है, इसलिए इसकी प्रकृति पूरी तरह अलग और खतरनाक है।
इस मामले में कोर्ट ने केस डायरी और सबूतों का अध्ययन करने के बाद मौलाना तौकीर रजा को जमानत देने से साफ इनकार कर दिया। इसके पीछे कारण बताया कि रजा ने बिना अनुमति भीड़ जुटाई। सितंबर 2025 में प्रशासन द्वारा अनुमति न दिए जाने और धारा 163 लागू होने के बावजूद एक बड़ी भीड़ को इस्लामिया ग्राउंड की तरफ मार्च करने के लिए उकसाया गया।
इस कारण हिंसा हुई और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। जब पुलिस ने इस गैरकानूनी भीड़ को रोकने की कोशिश की तो उपद्रवियों ने दंगा किया, पथराव और पेट्रोल बमों का इस्तेमाल किया, जिसमें कई पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए और सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा।
कोर्ट ने घटना के बाद की तौकीर रजा की भूमिका को भी बेहद आपत्तिजनक माना। कोर्ट ने नोट किया कि हिंसा के बाद तौकीर रजा ने एक भाषण देकर उस भीड़ का शुक्रिया अदा किया और उनके कृत्यों की सराहना की, जिसे किसी भी सभ्य समाज या कानून के तहत स्वीकार नहीं किया जा सकता।
बचाव पक्ष की दलील- आयोजन निरस्त कर दिया था...इलाहाबाद हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान मौलाना तौकीर रजा खान के बचाव पक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश त्रिवेदी और इमरानुल्लाह ने मुख्य रूप से यह दलील दी कि उन्हें राजनीतिक रंजिश और दबाव के तहत इस मामले में फंसाया गया और उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों का कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है।
वकीलों ने दलील दी कि 19 सितंबर को विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया गया था, लेकिन जब स्थानीय प्रशासन ने इसकी अनुमति नहीं दी, तो कार्यक्रम रद्द कर दिया गया था। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि मौलाना न तो मुख्य रूप से उस घटना में शामिल थे और न ही उन्होंने मौके पर पहुंचकर व्यक्तिगत रूप से किसी हिंसा या पथराव में हिस्सा लिया था।
तौकीर को हिंसात्मक भीड़ को शुक्रिया कहना भारी पड़ा
कोर्ट के इनकार की अन्य वजहें भी रहीं, जिनमें रजा का गैरजिम्मेदाराना आचरण अहम रहा। सरकारी पक्ष ने दलील दी कि हिंसा के बाद मौलाना ने एक सह-आरोपी के घर से वीडियो जारी कर भीड़ जुटने के लिए धन्यवाद दिया था, जिसे कोर्ट ने गंभीर आचरण माना। अभी इस मामले में आरोप तय होना बाकी हैं।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि हालांकि इस मामले में 21 दिसंबर 2025 को ही चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, लेकिन अभी तक निचली कोर्ट में आरोपियों के खिलाफ आरोप तय नहीं किए गए हैं। ऐसे में इस चरण पर आरोपी को रिहा करना कानून व्यवस्था के लिए उचित नहीं होगा। जमानत में रजा का पुराना इतिहास भी आड़े आ गया। कोर्ट ने आरोपी के पुराने आपराधिक इतिहास और बाहर आने पर सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने की आशंका को भी जमानत खारिज करने का आधार बनाया है।
‘आई लव मोहम्मद’ पोस्टर से उत्तर प्रदेश के बरेली में 26 सितंबर 2025 को भड़की हिंसा का मामला हाई कोर्ट की चौखट पर अब कड़ी टिप्पणी के साथ फिर चर्चा में आ गया है। इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार करते हुए मौलाना तौकीर रजा की जमानत अर्जी खारिज कर दी।
यहां नमाज के बाद भड़की हिंसा में पुलिस पर पेट्रोल बम व फायरिंग हुई थी। तब से ही जेल में बंद तौकीर रजा को इस हिंसा का मास्टरमाइंड बताया गया है। इस हिंसा में ‘सर तन से जुदा’ का नारा बुलंद हुआ था। कोर्ट ने इस नारे पर ऐतिहासिक टिप्पणी की और इसे भारत के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह के लिए उकसाने वाला बताया।
कोर्ट ने इस नारे की तुलना जय श्रीराम व अल्लाह हू अकबर से करने के तर्क को सख्ती से खारिज कर दिया और दो-टूक कहा कि ये नारा देश की अखंडता व संप्रभुता को चुनौती देता है। यह दंडनीय है। मौलाना तौकीर रजा दुनियाभर में प्रसिद्ध आला हजरत खानदान से ताल्लुक रखते हैं और सुन्नी संप्रदाय के बड़े अगुआकार व धार्मिक नेता भी हैं।
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