इस राज्य के दो सांसद-मंत्रियों को विधानसभा चुनाव में मिली शिकस्त: यह नेता केरल में हुआ पराजित; इसने तमिलनाडु में देखा पराजय का मुंह
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, दिल्ली।
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में जहां भाजपा को पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी में बड़ी सफलता मिली, वहीं मध्य प्रदेश के लिहाज से एक झटका देने वाली खबर सामने आई है। मध्य प्रदेश कोटे से राज्यसभा पहुंचे दो केंद्रीय मंत्रियों एल. मुरुगन और जॉर्ज कुरियन को दक्षिण भारत के चुनावी मैदान में हार का सामना करना पड़ा है।
केरल: कांजीरापल्ली में जॉर्ज कुरियन तीसरे नंबर पर
जॉर्ज कुरियन को भाजपा ने केरल की कांजीरापल्ली सीट से उम्मीदवार बनाया था। ईसाई बहुल इस क्षेत्र में उनसे पार्टी को खास उम्मीद थी, लेकिन वे मुकाबले में पिछड़ गए और तीसरे स्थान पर रहे। यहां सीधा मुकाबला यूडीएफ और एलडीएफ के बीच रहा, जिसमें कांग्रेस उम्मीदवार रोनी के. बेबी ने 56,646 वोट हासिल कर जीत दर्ज की।
दूसरे स्थान पर केरल कांग्रेस (एम) के उम्मीदवार रहे, जबकि कुरियन को करीब 26,984 वोट ही मिल सके। वे विजेता से लगभग 29 हजार वोटों के बड़े अंतर से हार गए। यह परिणाम इस बात का संकेत है कि केरल में भाजपा अभी भी मुख्य मुकाबले में जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रही है, खासकर उन सीटों पर जहां पारंपरिक रूप से कांग्रेस और वाम दल मजबूत रहे हैं।
तमिलनाडु: अविनाशी में मुरुगन को कड़ी टक्कर, पर जीत नहीं
तमिलनाडु की अविनाशी (एससी) सीट से चुनाव लड़ रहे एल. मुरुगन दूसरे स्थान पर रहे। उन्हें 68 हजार से अधिक वोट मिले, लेकिन वे जीत हासिल नहीं कर सके। इस सीट पर अभिनेता विजय की पार्टी TVK के उम्मीदवार कमाली एस. ने 84,209 वोट पाकर जीत दर्ज की। डीएमके उम्मीदवार तीसरे स्थान पर रहे। मुरुगन लगभग 15 हजार वोटों के अंतर से हारे। मुकाबला त्रिकोणीय था, लेकिन विजय की पार्टी की लहर ने पारंपरिक दलों के समीकरण बिगाड़ दिए।
क्यों अहम है यह हार
दोनों नेता केंद्र सरकार में मंत्री हैं और उन्हें भाजपा ने दक्षिण भारत में पार्टी के विस्तार के बड़े चेहरे के तौर पर उतारा था। केरल में कुरियन को ईसाई समुदाय में पकड़ बनाने वाला चेहरा माना जाता है। तमिलनाडु में मुरुगन दलित नेतृत्व और आक्रामक संगठनात्मक रणनीति के लिए जाने जाते हैं। इसके बावजूद, दोनों ही अपने-अपने राज्यों में निर्णायक बढ़त नहीं बना सके।
मुरुगन संगठन से सत्ता तक
एल. मुरुगन तमिलनाडु भाजपा के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं और वर्तमान में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री हैं। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और एबीवीपी से जुड़े रहे हैं। मद्रास हाई कोर्ट में वकालत करने के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के उपाध्यक्ष भी रहे। ‘वेल यात्रा’ के जरिए उन्होंने तमिलनाडु में भाजपा की पहचान को मजबूत करने की कोशिश की थी।
कुरियन अल्पसंख्यक राजनीति का चेहरा
जॉर्ज कुरियन लंबे समय से केरल में भाजपा का चेहरा रहे हैं। वे ईसाई समुदाय और पार्टी के बीच सेतु माने जाते हैं। वे राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं और वर्तमान में केंद्र में राज्य मंत्री हैं। उन्हें मध्य प्रदेश से राज्यसभा भेजा गया था, लेकिन केरल में चुनावी जमीन मजबूत नहीं कर पाए।
दक्षिण भारत में भाजपा की रणनीति को इन नतीजों से झटका जरूर लगा है। जहां एक तरफ पार्टी ने कुछ राज्यों में ऐतिहासिक जीत दर्ज की, वहीं दक्षिण में उसके प्रमुख चेहरे ही चुनाव नहीं जीत पाए। यह संकेत देता है कि क्षेत्रीय राजनीति, स्थानीय मुद्दे और सामाजिक समीकरण अभी भी दक्षिण भारतीय राज्यों में राष्ट्रीय रणनीति पर भारी पड़ रहे हैं।
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