रेंजर और एसडीओ की मिलीभगत से छोड़ा अवैध लकड़ियों से भरा ट्रक: वन विभाग में बड़ा खेल
KHULASA FIRST
संवाददाता

चंचल भारतीय 98936-44317 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
प्रदेश के वन विभाग में भ्रष्टाचार और माफियाराज किस कदर हावी है, इसका एक सनसनीखेज खुलासा इंदौर रेंज हुआ है। यहां एक ईमानदार अधिकारी द्वारा पकड़े गए अवैध लकड़ी के दो ट्रकों को भ्रष्ट रेंजर और एसडीओ ने आपसी मिलीभगत और मोटे लेनदेन के दम पर बिना किसी कानूनी कार्रवाई के छोड़ दिया।
इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल सरकार और प्रशासन की छवि को धूमिल किया है, बल्कि विभाग में ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों के मनोबल को भी तोड़कर रख दिया है।
मामले की जड़ें इतनी गहरी हैं कि यदि वन परिक्षेत्र अधिकारी संगीता ठाकुर के खिलाफ निष्पक्ष उच्च स्तरीय जांच की जाए तो विभाग के भीतर एक बहुत बड़े संगठित भ्रष्टाचार का खुलासा होना तय है।
मामला जीएनटी मार्केट से शुरू हुआ, जहां मुस्तैद और ईमानदार वन परिक्षेत्र अधिकारी रेंजर प्रीति शाक्य ने संदिग्ध ट्रकों को पकड़ा था। इन ट्रकों में लदी लकड़ियों और उनके परिवहन से जुड़े दस्तावेजों में भारी गड़बड़ी पाई गई थी।
प्रारंभिक जांच में यह साफ हो गया था कि गाड़ी में मौजूद लकड़ी की प्रजाति कुछ और थी, जबकि परिवहन पास टीपी में किसी अन्य लकड़ी का उल्लेख किया गया था। नियमानुसार इस मामले में तत्काल वन अपराध दर्ज कर सख्त कार्रवाई की जानी थी।
कार्रवाई को आगे बढ़ाते हुए दोनों ट्रकों को रालामंडल भेजा गया था। इसके बाद वन विभाग के भ्रष्ट तंत्र का खेल शुरू हुआ। इंदौर रेंजर संगीता ठाकुर, जिनके पास वर्तमान में पर्यावरण वानिकी और वृत्त स्तरीय उड़न दस्ता प्रभारी सहित तीन महत्वपूर्ण प्रभार हैं, ने इस पूरे मामले को रफा-दफा करने का जिम्मा संभाल लिया।
रेंजर संगीता ठाकुर ने मामले को दबाने के लिए अनुविभागीय अधिकारी एसडीओ अमित सोलंकी के नाम की आड़ ली और मीडिया के सामने लगातार झूठे और भ्रामक बयान जारी किए। रेंजर की इस पूरी कवायद के पीछे लकड़ी माफियाओं के साथ हुआ मोटा लेनदेन और भ्रष्टाचार का बड़ा गठबंधन बताया जा रहा है।
हैरानी की बात यह है कि बिना लकड़ियों का भौतिक सत्यापन किए और दस्तावेजों की गंभीर विसंगतियों को नजरअंदाज करते हुए ट्रक को छोड़ने का आदेश जारी कर दिया गया। पकड़े गए ट्रक का नंबर मौके पर यूपी-टीएन 0636 पाया गया था, जबकि वन परिक्षेत्र अधिकारी के आधिकारिक पत्र क्रमांक 2026/1495/इंदौर दिनांक 20/05/2026 और टीपी पास क्रमांक एमपी/एसएच/1/5-8438 में दर्ज विवरण और ट्रक की वास्तविक स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर था।
टीपी में बबूल, नीम, आम, जामुन और यूकेलिप्टस जैसी शत्रुखा प्रजातियों का उल्लेख था, जबकि ट्रक में अवैध रूप से कीमती और दूसरी प्रजाति की लकड़ियां ले जाई जा रही थीं। इस विसंगति के बावजूद वन परिक्षेत्र अधिकारी मुंगावली (जिला अशोकनगर) ऋषि कुमार प्रजापति के एक पत्र और व्हाट्सएप पर मिली तथाकथित अधूरी जानकारी के आधार पर ही इंदौर रेंजर ने ट्रक को हरी झंडी दिखा दी।
सुनवाई और छोड़ने का अधिकार केवल वन विभाग के एसडीओ के पास... वन विभाग के कानूनी नियमों की बात करें तो यदि वन उपज का यह पहला अपराध भी था और नियमतः 1,000 रुपए से कम की लकड़ी होने पर सुनवाई के दौरान न्यूनतम 10,000 रुपए का जुर्माना बनता है, तो भी इसकी सुनवाई और छोड़ने का अधिकार केवल वन विभाग के एसडीओ के पास होता है, रेंजर के पास नहीं। इसके अलावा, नियम के मुताबिक संबंधित रेंज से यह पूरी जांच होनी थी कि इस वाहन या आरोपी के खिलाफ पूर्व में कोई वन अपराध दर्ज है या नहीं।
इस विभागीय प्रक्रिया और जांच को पूरा होने में आमतौर पर कम से कम एक महीने का समय लगता है। लेकिन यहां नियमों को ताक पर रखकर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले माफियाओं से सौदेबाजी की गई और चंद घंटों में ही ट्रकों को रफा-दफा कर दिया गया।
सरकार की नौकरी कर लकड़ी माफियाओं की हुजूरी करने वाले इन अधिकारियों के इस कारनामे से अब पूरे वन महकमे में हड़कंप मचा हुआ है। रेंजर संगीता ठाकुर की कार्यप्रणाली को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं और यदि उनकी संपत्ति व पुराने मामलों की जांच का दायरा बढ़ाया जाता है तो करोड़ों रुपये के सिंडिकेट का खुलासा हो सकता है।
विशेष टीम द्वारा पकड़े गए दोनों ट्रक मेरे संज्ञान में जरूर हैं, लेकिन इन्हें मेरी किसी भी अनुशंसा या निर्देश पर नहीं छोड़ा गया है। इस पूरे मामले में जांच और अंतिम कार्रवाई वन परिक्षेत्र अधिकारी संगीता ठाकुर द्वारा ही की गई है। मेरे किसी पत्र या सिफारिश के आधार पर वाहनों को नहीं छोड़ा गया है। -अमित सोलंकी, एसडीओ, वन विभाग, इंदौर
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