मिलम हिमनद का सूर्यकुंड: वह ओझल तीर्थ जहां नियति ने रचा था ‘सूर्यपुत्र’ का जन्म; हिमालय की गोद में दबा रहस्य, जहां कुंती ने ‘महादानी’ कर्ण को दिया था जन्म
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
उत्तराखंड की गगनचुंबी चोटियों के बीच, जहां बादल थपेड़ों की तरह पहाड़ों से टकराते हैं और नदियां अपने उद्गम की बेचैनी में शोर मचाती हैं, वहां एक ऐसा स्थान है जिसे आज भी श्रापित और पवित्र का अनूठा संगम माना जाता है।
यह है मिलम हिमनद के ऊपर स्थित सूर्यकुंड। जहां दुनिया की नजरें चार धाम की सुगम सीमाओं पर थमी रहती हैं, वहीं यह दुर्गम कुंड उस महादानी कर्ण के प्राकट्य की कथा को अपने भीतर सहेजे हुए है, जिसने महाभारत के महासंग्राम की दिशा और दशा दोनों बदल दी थी।
कुंती का कौतूहल और एक दिव्य वरदान
पौराणिक आख्यानों और हिमालय की लोकगाथाओं में इस स्थान का वर्णन किसी रोमांचित कर देने वाली फिल्म की तरह मिलता है। कहते हैं, मिलम हिमनद के ऊपरी क्षेत्र में स्थित यह सूर्यकुंड वह स्थान है जहां माता कुंती ने अपनी किशोरावस्था में ऋषि दुर्वासा द्वारा दिए गए मंत्र की शक्ति को आजमाना चाहा था।
हिमालय की इसी कंदरा के पास कुंती ने एकांत पाकर भगवान सूर्य का आह्वान किया। उनके कौतूहल के जवाब में साक्षात सूर्यदेव यहां प्रकट हुए और नियति के खेल के रूप में कुंती की गोद में कर्ण आए।
एक ऐसा पुत्र जो जन्म से ही अभेद्य कवच और कुंडलों से सुसज्जित था। आज भी स्थानीय लोगों का मानना है कि इस कुंड पर सूर्योदय की पहली किरण एक ऐसी अलौकिक चमक पैदा करती है, जो उस प्राचीन तेजपुंज की याद दिलाती है।
पांडुकेश्वर- जहां राजा पांडु ने बिताया था वनवास
सूर्यकुंड की इस गाथा का दूसरा महत्वपूर्ण सिरा पांडुकेश्वर से जुड़ा है। बद्रीनाथ के मार्ग पर स्थित यह वह आध्यात्मिक भूमि है, जहां राजा पांडु ने अपनी पत्नियों कुंती और माद्री के साथ निर्वासन का समय बिताया था।
मान्यता है कि यहीं कुंती और पांडु का विवाह संपन्न हुआ और इसी क्षेत्र की कंदराओं में पांचों पांडवों ने भी अपनी प्रारंभिक सांसें ली थीं। यहां स्थित योग-ध्यान बद्री मंदिर आज भी राजा पांडु की तपस्या का जीवंत प्रमाण माना जाता है।
आस्था और दुर्गमता के बीच ओझल विरासत...पिथौरागढ़ की जोहार घाटी में स्थित मिलम हिमनद भारत के सबसे बड़े ग्लेशियर्स में से एक है। प्राचीन समय में यह तिब्बत से व्यापार का प्रमुख मार्ग हुआ करता था, लेकिन धार्मिक दृष्टि से इसकी पहचान हमेशा गौण रही।
सूर्यकुंड तक पहुंचना किसी कठिन तपस्या से कम नहीं है। मुनस्यारी से लगभग 50-60 किमी का थका देने वाला पैदल सफर और ग्लेशियर की बर्फीली बाधाओं को पार करने का जोखिम हर किसी के बस की बात नहीं। यही कारण है कि यह ओझल तीर्थ आज भी आम श्रद्धालुओं की नज़रों से दूर केवल पर्वतारोहियों और चरवाहों तक सीमित रह गया है।
पत्थरों में कैद महाकाव्य
जब आज के दौर में हर धार्मिक कोना ‘टूरिज्म’ के शोर में खो रहा है, तब मिलम का सूर्यकुंड गुमनामी के अंधेरे में अपनी पवित्रता बचाए हुए है। यह केवल एक पर्यटन स्थल या ट्रेकिंग रूट नहीं है, बल्कि उस ‘कर्ण’ की स्मृति है जिसने अपनी नियति से लड़कर अपना नाम अमर किया। कुंती का वह कौतूहल और सूर्यदेव का वह तेज आज भी हिमालय की हवाओं में एक स्पंदन की तरह महसूस किया जा सकता है।
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