क्षेत्रीय क्षत्रपों की‘सूबेदारी’ पर लगेगी लगाम: मुख्यमंत्री की पारदर्शी कार्यशैली से हाईकमान ने समझी जमीनी हकीकत
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव लगातार प्रयास करते रहे हैं कि असंतुष्ट कहे जाने वाले वरिष्ठ क्षेत्रीय नेताओं को साथ में लेकर काम किया जाए, लेकिन क्षेत्रीय नेताओं ने ऐसा नहीं होने दिया। इसका जीता-जागता उदाहरण दतिया उपचुनाव का परिणाम है।
मुख्यमंत्री के राजनीतिक चातुर्य, उनकी सबको साथ लेकर चलने की कला और प्रशासनिक कसावट के पक्ष में यह चुनाव परिणाम एक बड़ा वैचारिक टर्निंग पॉइंट साबित हुआ है। शुरुआती समीक्षाओं में भले ही इसे किसी एकतरफा समीकरण से जोड़कर देखा गया, लेकिन गहराई से विश्लेषण करने पर यह साफ हो जाता है कि मध्य प्रदेश में भाजपा की असली चुनौती मुख्यमंत्री की कार्यशैली नहीं, बल्कि कुछेक अंचलों में स्थापित हो चुकी क्षेत्रीय ‘सूबेदारी’ की संस्कृति है।
क्षेत्रीय ‘सूबेदारी’ और व्यक्तिगत लालसाओं पर लगाम... बीते ढाई वर्षों में असंतुष्ट कहे जाने वाले नेताओं के कर्मकांड पार्टी और सरकार के लिए कितने महंगे साबित हुए हैं, यह चुनाव परिणाम ने बता दिया। हाईकमान ने इसे गंभीरता से लेते हुए सूबेदारी प्रथा पर नकेल कसने की तैयारी की है।
बताया जा रहा है कि अब मुख्यमंत्री की खिलाफत हाईकमान को मंजूर नहीं होगी। दतिया उपचुनाव के परिणामों के बाद हाईकमान के पास जो जमीनी फीडबैक पहुंचा, उसने एक खतरनाक राजनीतिक प्रवृत्ति से पर्दा उठा दिया है।
सूबे के किसी भी इलाके में यदि पूरी राजनीति किसी एक स्थापित बड़े नेता या क्षत्रप के हाथों में केंद्रित हो जाती है, तो वह पार्टी और सरकार दोनों के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाती है।
ऐसी ‘सूबेदारी’ की राजनीति में अक्सर यह देखने को मिलता है कि नेता संगठन और अनुशासन से ऊपर खुद को समझने लगते हैं। उनकी यह अपेक्षा बन जाती है कि सरकार और संगठन के तमाम निर्णय उनके अनुकूल ही हों।
इस प्रकार की प्रवृत्तियों के कारण न केवल जमीनी और निष्ठावान कार्यकर्ता हाशिए पर चले जाते हैं, बल्कि व्यक्तिगत सत्ता के दोहन की लालसा और निजी हितों से जुड़ी बड़ी-बड़ी फाइलें बताई जाती हैं व गड़बड़-घोटाले भी पनपने लगते हैं।
जब राजनीतिक मनमानी करने वाला ऐसा कोई गुट बेलगाम होता है, तो वह आम जनता को भी आतंकित करने की स्थिति पैदा कर देता है। चाहे वह बुंदेलखंड हो, महाकौशल, चंबल, मालवा या निमाड़ हो। इलाके के स्थापित नेता संगठन को कमजोर करने के साथ प्रशासनिक मनमानी भी करने लगते हैं।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की कार्यशैली बताती है कि वह शासन पर कड़ा नियंत्रण रखने के साथ संगठन में तालमेल और जनहितैषी नीतियों पर फैसला लेने में देर नहीं करते। इन तमाम आंतरिक विरोधों, गुटीय दबावों और निजी हितों की राजनीतिक उठापटक के बीच मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जिस दृढ़ता के साथ शासन और प्रशासन पर अपना नियंत्रण बनाए रखा है, वह उनकी मजबूत राजनीतिक परिपक्वता को दर्शाता है।
डॉ. मोहन यादव लगातार जनता के हित में बड़े और दूरदर्शी निर्णय ले रहे हैं। तमाम राजनीतिक अंतर्विरोधों और निहित स्वार्थों से लड़ते हुए उन्होंने जिस तरह से सरकार और संगठन के संतुलन को साधा है, उसने यह साबित कर दिया कि वे किसी के दबाव में काम करने के बजाय पारदर्शी और जनकेंद्रित शासन देने में विश्वास रखते हैं।
मंत्रियों और क्षेत्रीय दिग्गजों की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और प्रशासनिक अनियमिताओं की फाइलों पर जिस प्रकार से मुख्यमंत्री ने अंकुश लगाया है, उससे यह स्पष्ट है कि प्रदेश में सुशासन सर्वोपरि है।
मध्य प्रदेश की सियासत में दतिया उपचुनाव के परिणामों ने भले ही राजनीतिक विश्लेषकों को चौंकाया हो, लेकिन इस परिणाम ने राज्य की जमीनी राजनीतिक वास्तविकताओं को एक नया और स्पष्ट आईना दिखा दिया है। सतह पर इसे हार के रूप में देखा जा रहा है, मगर राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह परिणाम पार्टी द्वारा क्षेत्रीय नेताओं को बढ़ावा देने का नतीजा है, जो लगातार मुख्यमंत्री को कमजोर करने की कोशिश करते रहे हैं।
इस तथ्य को हाईकमान समय पर समझ नहीं पाया, लेकिन दतिया के चुनाव परिणाम ने बता दिया कि सूबे के सूबेदारों की अपने-अपने इलाके में स्थापित राजनीति पार्टी के लिए कितने महंगी साबित होती है। पार्टी ही नहीं, सरकार के लिए भी यह मुश्किल खड़ी करती है।
हाईकमान को समझ आई जमीनी सच्चाई
दतिया के घटनाक्रम ने केंद्रीय हाईकमान की आंखें खोल दी हैं। यह बात अब पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है कि किसी भी सूबे में पार्टी संगठन से ऊपर उठकर व्यक्तिगत ‘सूबेदारी’ चलाने की छूट किसी को देना भाजपा की मूल विचारधारा और कैडर बेस के लिए घातक हो सकता है। पार्टी नेतृत्व को यह अहसास हो गया है कि मध्य प्रदेश को किसी एक व्यक्ति के इशारे पर नहीं, बल्कि सामूहिक नेतृत्व, वैचारिक अनुशासन और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के भ्रष्टाचारमुक्त तथा जनता-उन्मुख दृष्टिकोण के साथ ही आगे बढ़ाया जा सकता है।
यह उपचुनाव परिणाम पार्टी के लिए एक आत्ममंथन का अवसर जरूर बना है, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के उस राजनीतिक चातुर्य को और अधिक मजबूत करेंगे, जिसके तहत वे बिना झुके, बिना डिगे हर चुनौती का सामना करते हुए मध्य प्रदेश को विकास के पथ पर अग्रसर रख रहे हैं।
क्षेत्रीय नेताओं की महत्वाकांक्षा और आलाकमान की छूट बनी हार की वजह
प्रदेश की राजनीति में दतिया उपचुनाव के नतीजे भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के लिए बड़ा राजनीतिक सबक बन गए हैं। इस चुनाव ने यह साबित कर दिया है कि आलाकमान राज्य के क्षत्रपों को जरूरत से ज्यादा ताकत दे दे व सीएम डॉ. यादव की खिलाफत करने वालों को प्रश्रय देने लगे, तो उसका कितना प्रतिकूल असर संगठन और सरकार पर पड़ता है।
भारी पड़ रही क्षेत्रीय नेताओं की घेराबंदी...दतिया में मिली हार का मुख्य कारण यह रहा कि मध्य प्रदेश संगठन पर अपना दबदबा कायम करने के लिए प्रयासरत कुछ क्षेत्रीय दिग्गजों ने सरकार और पार्टी के भीतर अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल किया।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पूरी छूट देने के बजाय जब आलाकमान ने उन नेताओं को तरजीह दी, जो अंदरखाने मुख्यमंत्री के विरोधी माने जाते हैं, तो इससे गुटबाजी को हवा मिल गई। इन क्षेत्रीय क्षत्रपों ने आपसी वर्चस्व की लड़ाई में संगठन की प्राथमिकताओं को पीछे छोड़ दिया, जिसका सीधा नुकसान दतिया के चुनावी मैदान में पार्टी को भुगतना पड़ा।
प्रमुख अंचल और उनके क्षत्रप
इस पूरी अंदरूनी कलह और राजनीतिक खींचतान में राज्य के प्रमुख अंचलों और वहां के क्षत्रपों की भूमिका अहम रही-
ग्वालियर-चंबल अंचल (दतिया का केंद्र): इस क्षेत्र में पार्टी के भीतर आपसी समन्वय की कमी और क्षत्रपों के शक्ति प्रदर्शन ने चुनावी नतीजों को सीधे तौर पर प्रभावित किया। यहां नरेंद्रसिंह तोमर व ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रमुख क्षेत्रीय नेताओं में गिने जाते हैं। इनकी चुनाव में भूमिका पर सवाल खडेि हुए हैं।
मालवा अंचल: यहां के कद्दावर नेता कैलाश विजयवर्गीय का प्रभाव और संगठन में उनकी पकड़ जगजाहिर है, जिनका असर पूरे सूबे के सियासी समीकरणों पर रहता है।
महाकौशल अंचल: इस क्षेत्र में प्रह्लाद पटेल और गोपाल भार्गव जैसे दिग्गज नेता अपने-अपने स्तर पर संगठन और प्रशासन में मजबूत दखल रखते हैं, जो कई बार सरकार के समानांतर शक्ति केंद्र के रूप में उभरते हैं।
विंध्य और बुंदेलखंड अंचल: इन इलाकों में भी क्षेत्रीय क्षत्रपों की व्यक्तिगत पकड़ इतनी मजबूत है कि वे पार्टी अनुशासन से ऊपर अपनी राजनीतिक जमीन को तरजीह देते आए हैं।
प्रह्लाद पटेल और उमा भारती जैसे नेता बुंदेलखंड, टीकमगढ़ क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए हुए हैं। दतिया के इस झटके ने यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि दिल्ली के ‘कंट्रोल रूम’ को जमीन पर काम करने वाले मुख्यमंत्री को कमजोर करने के बजाय क्षेत्रीय नेताओं की बेलगाम महत्वाकांक्षाओं पर लगाम कसना होगी, अन्यथा यह गुटबाजी पार्टी के लिए भविष्य में और नुकसानदेह साबित हो सकती है।
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