रोते और खाते समय बच्चों को मोबाइल देना पड़ रहा भारी: फोन की लत से बच्चे हो रहे बेकाबू; स्क्रीन की लत से बढ़ी परेशानी, थेरेपी सेंटरों में लग रही कतार
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
बच्चा रोया तो मोबाइल थमा दिया, खाना नहीं खाया तो वीडियो चला दिया और माता-पिता व्यस्त हुए तो फोन बच्चे के हाथ में दे दिया। कोविड के दौरान और उसके बाद कई परिवारों में यह सामान्य दिनचर्या बन गई।
समस्याओं के साथ थेरेपी सेंटरों तक पहुंच रहे
अब कुछ ऐसे ही बच्चे देर से बोलने, कम आई-कॉन्टैक्ट, सामाजिक मेलजोल में कमी और अत्यधिक सक्रियता जैसी समस्याओं के साथ थेरेपी सेंटरों तक पहुंच रहे हैं। कुछ डॉक्टर और थेरेपिस्ट ऐसे मामलों के लिए ‘वर्चुअल ऑटिज्म’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं।
सावधानी बरतने की सलाह
हालांकि, विशेषज्ञ साहित्य में इस शब्द को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। 2026 के एक शोध-पत्र के अनुसार, ‘वर्चुअल ऑटिज्म’ कोई स्थापित अलग ऑटिज्म निदान नहीं है और यह शब्द लोगों को यह गलत धारणा दे सकता है कि स्क्रीन से ऑटिज्म होता है।
शोधकर्ताओं ने इसके बजाय स्क्रीन से जुड़े विकासात्मक विलंब जैसी अधिक सटीक भाषा की वकालत की है।
सोना की कहानी- दो साल तक ठीक थी, फिर बोलना कम हुआ
भोपाल की सोना का परिवार भी इसी तरह की परेशानी से गुजर रहा है। उसकी मां के मुताबिक, दो साल की उम्र तक सोना सामान्य रूप से बोलती थी और घर में सिखाए गए शब्द दोहराती थी। इसके बाद उसे मोबाइल देखने में रुचि बढ़ी।
परिवार ने उसे रोकना जरूरी नहीं समझा। मां के अनुसार, करीब 2 साल 7 महीने की उम्र तक सोना ने बोलना लगभग बंद कर दिया और आसपास की बातों को नजरअंदाज करने लगी। तीन साल की उम्र में परिवार उसे डॉक्टर के पास लेकर गया। अब वह नियमित रूप से थेरेपी सेंटर जाती है।
सरकारी DEIC में शुरुआती जांच और थेरेपी की व्यवस्था
बच्चों में विकासात्मक देरी और ऑटिज्म जैसे लक्षणों की शुरुआती पहचान के लिए सरकारी व्यवस्था में District Early Intervention Centre (DEIC) महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहां बच्चों की स्क्रीनिंग, असेसमेंट और जरूरत के अनुसार विभिन्न थेरेपी उपलब्ध कराई जाती हैं।
उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में सैकड़ों DEIC संचालित हैं। हालांकि, अलग-अलग राज्यों में इनके स्टाफ और सुविधाओं की स्थिति एक जैसी नहीं है।
भोपाल DEIC में स्टाफ की कमी
भोपाल के शासकीय जयप्रकाश जिला चिकित्सालय में संचालित DEIC में अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच ऑटिज्म से जुड़े 31 बच्चे पहुंचे। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इनमें एक बच्चे को स्क्रीन टाइम से जुड़े लक्षणों के संदर्भ में देखा गया।
सेंटर में ऑक्युपेशनल थेरेपिस्ट, स्पेशल एजुकेटर, पीडियाट्रिक और ऑप्थैल्मिक असिस्टेंट जैसे पद लंबे समय से खाली बताए गए हैं। स्टाफ की कमी के कारण सेंसर इंटीग्रेशन एरिया के इस्तेमाल पर भी असर पड़ रहा है।
सेंटर मैनेजर उज्जवल सिंह के अनुसार, रिक्त पदों की जानकारी राज्य सरकार को दी जा चुकी है, लेकिन नियुक्तियां नहीं हुई हैं।
वर्चुअल ऑटिज्म की अलग पहचान के लिए स्पष्ट व्यवस्था नहीं
सेंटर प्रबंधन के अनुसार, ऑटिज्म और स्क्रीन से जुड़े विकासात्मक लक्षणों को अलग-अलग पहचानने के लिए उनके पास कोई अलग असेसमेंट टूल नहीं है। ऐसे में बच्चों के लक्षणों का मूल्यांकन उपलब्ध मौजूदा टूल से ही किया जाता है।
यह स्थिति नीति और आंकड़ों के स्तर पर महत्वपूर्ण सवाल उठाती है- अगर स्क्रीन से जुड़े विकासात्मक विलंब को अलग श्रेणी में दर्ज ही नहीं किया जा रहा, तो इसके वास्तविक मामलों का आकलन और उनके लिए अलग रणनीति कैसे तैयार होगी?
कम स्टाफ से थेरेपी में देरी
DEIC की साइकोलॉजिस्ट डॉ. नीम्रता दुबे के मुताबिक, OPD और फॉलोअप के मामलों की संख्या अधिक होने तथा स्टाफ कम होने के कारण हर बच्चे को बार-बार थेरेपी देना मुश्किल होता है।
कई बच्चों को 15 दिन या एक महीने बाद फॉलोअप के लिए बुलाना पड़ता है। उनका कहना है कि पर्याप्त स्टाफ उपलब्ध हो और बच्चों को समय पर उचित थेरेपी मिले तो विकासात्मक समस्याओं में सुधार के लिए शुरुआती हस्तक्षेप अधिक प्रभावी हो सकता है।
प्राइवेट सेंटर में भी बढ़ी बच्चों की संख्या
भोपाल के RAVI सेंटर की संचालक तृप्ति मंगल पिछले करीब 15 वर्षों से ऑटिज्म और विकासात्मक समस्याओं से जुड़े बच्चों के साथ काम कर रही हैं।
उनके अनुसार, लॉकडाउन से पहले स्क्रीन से जुड़े ऐसे मामले सालभर में सीमित संख्या में आते थे, जबकि लॉकडाउन के बाद ऐसे बच्चों की संख्या में काफी वृद्धि देखी गई।
कुछ गंभीर मामलों में बच्चों में आक्रामक व्यवहार और स्वयं को नुकसान पहुंचाने जैसी समस्याएं भी देखी गईं।
हालांकि, ऐसे अनुभवों को व्यापक आबादी में स्क्रीन टाइम और ऑटिज्म के बीच सीधा कारण-परिणाम साबित करने वाला वैज्ञानिक प्रमाण नहीं माना जा सकता।
मायरा को चुप कराने के लिए दिया जाता था मोबाइल
RAVI सेंटर में 8 साल की मायरा का उदाहरण भी सामने आया। परिवार के मुताबिक, बचपन में रोने पर उसे मोबाइल दे दिया जाता था और वह तुरंत शांत हो जाती थी।
परिवार का कहना है कि शुरुआती वर्षों में उसके विकास में देरी नजर आई और छह साल की उम्र में उसकी थेरेपी शुरू हुई।
अब परिवार के लिए मोबाइल से उसकी दूरी बनाना सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।
आरिश सवाल का जवाब देने के बजाय सवाल दोहराता है
सात साल के आरिश की स्थिति भी ध्यान खींचती है। उससे नाम पूछने पर वह जवाब देने के बजाय वही सवाल दोहरा देता है।
‘खाना खाया?’ पूछने पर भी उसने ‘खाना खाया’ दोहराया। उसकी मां फार्हानाज के मुताबिक, पहले वह मम्मा-पापा कहकर बुलाता था, लेकिन बाद में बोलना कम हो गया।
वह मोबाइल पर एक ही तरह के वीडियो बार-बार देखता और उनकी नकल करता था। परिवार पिछले तीन वर्षों से उसका इलाज और थेरेपी करा रहा है।
अलग-अलग राज्यों में अलग तस्वीर
इस पड़ताल में सामने आए अनुभवों के मुताबिक, राज्यों की राजधानियों में DEIC और अर्ली इंटरवेंशन सेवाओं की स्थिति अलग-अलग है।
राजस्थान: जयपुर में रिकॉर्ड में DEIC दर्ज है, लेकिन मौके पर सेंटर के पूरी तरह संचालित नहीं होने की जानकारी सामने आई।
बिहार: पटना के एक DEIC में सीमित जगह और स्टाफ की कमी बताई गई। सेंटर प्रबंधन के अनुसार ऑक्युपेशनल थेरेपिस्ट और स्पेशल एजुकेटर की नियुक्ति लंबे समय से नहीं हुई।
उत्तर प्रदेश: लखनऊ के KGMU स्थित DEIC में रोजाना बड़ी संख्या में बच्चे पहुंचते हैं। सेंटर के विशेषज्ञों के अनुसार कुछ बच्चों में स्क्रीन से जुड़े ऑटिज्म जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
गुजरात: गांधीनगर के DEIC में विशेषज्ञों ने पिछले दो वर्षों में ऐसे मामलों में वृद्धि महसूस होने की बात कही। यहां माता-पिता को स्क्रीन टाइम और शुरुआती हस्तक्षेप को लेकर जागरूक किया जाता है।
दिल्ली: यहां के DEIC में भी स्टाफ की कमी बताई गई है। सेंटर से जुड़े कर्मचारियों के अनुसार कोविड के बाद ऐसे लक्षणों वाले बच्चों की संख्या बढ़ी है।
महाराष्ट्र: मुंबई में जिला स्तर के DEIC की जगह BMC के अर्ली इंटरवेंशन सेंटरों के जरिए सेवाएं दी जा रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ‘वर्चुअल ऑटिज्म’ की अलग रिकॉर्डिंग अभी नियमित रूप से नहीं होती।
क्या स्क्रीन टाइम से ऑटिज्म होता है?
यहीं सबसे महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है। वैज्ञानिक अध्ययनों में ज्यादा स्क्रीन एक्सपोजर और बच्चों में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम से जुड़े लक्षणों के बीच संबंध पाया गया है, लेकिन उपलब्ध शोध मुख्यतः observational है और इससे यह साबित नहीं होता कि स्क्रीन टाइम सीधे ऑटिज्म पैदा करता है।
एक बड़े systematic review/meta-analysis ने भी कहा कि संबंध के प्रमाण मिश्रित हैं और कारण-परिणाम को लेकर और शोध की जरूरत है।
इसके अलावा यह संभावना भी मानी जाती है कि कुछ ऑटिस्टिक बच्चे सामाजिक परिस्थितियों की तुलना में स्क्रीन गतिविधियों को अधिक पसंद कर सकते हैं। यानी संबंध दोनों दिशाओं में हो सकता है।
छोटे बच्चों के स्क्रीन टाइम पर WHO की सलाह
WHO के अनुसार, एक साल के बच्चों के लिए sedentary screen time की सिफारिश नहीं की जाती। दो साल की उम्र में स्क्रीन टाइम एक घंटे से अधिक नहीं होना चाहिए और कम हो तो बेहतर है। 3 से 4 साल के बच्चों के लिए भी स्क्रीन टाइम एक घंटे तक सीमित रखने की सलाह दी गई है।
WHO साथ में सक्रिय खेल, नींद और माता-पिता के साथ बिना स्क्रीन वाली बातचीत को महत्वपूर्ण मानता है।
माता-पिता किन संकेतों पर ध्यान दें?
विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चे के विकास में अचानक बदलाव दिखाई दे तो उसे केवल ‘मोबाइल की आदत’ मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खासकर इन संकेतों पर ध्यान देना जरूरी है।
बच्चा पहले बोले गए शब्दों का इस्तेमाल कम या बंद कर दे।
आंखों में देखकर बातचीत या सामाजिक संपर्क कम हो जाए।
नाम पुकारने या सामान्य निर्देशों पर प्रतिक्रिया कम हो।
बार-बार एक ही तरह की गतिविधि या वीडियो में अत्यधिक रुचि दिखाई दे।
बोलने के बजाय लगातार इशारों या दूसरों के शब्द दोहराने लगे।
उम्र के हिसाब से भाषा और सामाजिक विकास में स्पष्ट देरी दिखाई दे।
ऐसे संकेत दिखने पर बाल रोग विशेषज्ञ या विकासात्मक विशेषज्ञ से मूल्यांकन कराना बेहतर है। केवल स्क्रीन टाइम के आधार पर ऑटिज्म का निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए।
सवाल सिर्फ मोबाइल का नहीं, सिस्टम का भी
बच्चों में स्क्रीन का बढ़ता इस्तेमाल निश्चित रूप से माता-पिता और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय है। लेकिन समस्या को सिर्फ ‘मोबाइल की वजह से ऑटिज्म’ कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।
असल चुनौती शुरुआती पहचान, पर्याप्त थेरेपिस्ट, स्पष्ट असेसमेंट व्यवस्था और माता-पिता की जागरूकता की है। अगर स्क्रीन से जुड़े विकासात्मक विलंब के मामलों की अलग पहचान और रिकॉर्डिंग नहीं होगी, तो नीति बनाने के लिए जरूरी आंकड़े भी सामने नहीं आ पाएंगे।
इसलिए जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें बच्चों की समस्या को जल्द पहचाना जाए, ऑटिज्म और अन्य विकासात्मक देरी के बीच चिकित्सकीय अंतर स्पष्ट किया जाए और जरूरत के अनुसार समय पर थेरेपी उपलब्ध हो।
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