पूर्वजों की तृप्ति के लिए श्राद्ध और तर्पण की महिमा: पितृ ऋण से मुक्ति का पावन पर्व
KHULASA FIRST
संवाददाता

श्राद्ध पक्ष में पितरों का तर्पण: माता सीता और फल्गु नदी से जुड़ी अनूठी कथा
पंचबलि और पितृ तर्पण: जानिए, क्यों श्राद्ध में अनिवार्य है गाय, कौए और चींटी का भोजन
श्राद्ध कर्म में सात्विकता और संयम: पूर्वजों के आशीर्वाद से घर में आएगी सुख-समृद्धि
पितृ पूजन की पावन तिथियां: प्रतिपदा से सर्वपितृ अमावस्या तक पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का महापर्व
हेमंत उपाध्याय 99930-99008, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सनातन संस्कृति में पितृपक्ष केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों (पितरों) के प्रति अगाध श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने का एक पावन अवसर है। मान्यता है कि हर मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण होते हैं- देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण।
इनमें से पितृ ऋण से मुक्ति पाने का एकमात्र माध्यम श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान को माना गया है। वर्ष 2026 में आश्विन मास के कृष्णपक्ष के साथ पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध के साथ हो रही है, जिसका समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा।
15 दिन की इस अवधि में पूर्वज अपने वंशजों के निकट आते हैं और उनके द्वारा प्रेम व सात्विकता से अर्पित किए गए अन्न-जल से तृप्त होकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
श्राद्ध और तर्पण का पौराणिक विधान... धार्मिक मान्यता के अनुसार परिवार में जिस पूर्वज की मृत्यु जिस तिथि को हुई होती है, पितृपक्ष में उसी तिथि पर उनका श्राद्ध किया जाता है।
यदि मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो, तो आश्विन मास की सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध करने की व्यवस्था शास्त्रों में दी गई है। इस दौरान पवित्र नदियों में स्नान कर जल में काले तिल, दूध और कुश मिलाकर पूर्वजों का ध्यान करते हुए तर्पण किया जाता है।
पके हुए चावल, जौ के आटे, तिल, घी और शहद के मिश्रण से बने ‘पिंड’ अर्पित करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है।
श्राद्ध परंपरा से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा के अनुसार वनवास के दौरान जब भगवान राम और लक्ष्मण पिता दशरथ के श्राद्ध की सामग्री जुटाने गए थे, तब देरी होते देख माता सीता ने फल्गु नदी के तट पर बालू से पिंड बनाकर स्वयं पिंडदान किया था।
इस अद्भुत घटना के साक्षी फल्गु नदी, वटवृक्ष, गाय, तुलसी और एक ब्राह्मण बने थे। जब श्री राम लौटे, तो वटवृक्ष को छोड़कर अन्य सभी साक्षियों ने असत्य गवाही दी, जिससे क्रोधित होकर सीताजी ने फल्गु नदी को सदा सूखी रहने का शाप दिया था।
पंचबलि और कौओं को भोजन कराने का रहस्य... पितृपक्ष में केवल ब्राह्मण भोजन ही पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि 'पंचबलि' का विशेष विधान है। इसमें भोजन का अंश गाय, कुत्ते, कौए, चींटी और देवों के लिए निकाला जाता है।
पौराणिक मान्यताओं में कौए को यमराज का संदेशवाहक और पितरों का प्रतिनिधि माना गया है। त्रेतायुग में भगवान राम द्वारा जयंत (कौए के रूप में) को दिए गए वरदान के कारण माना जाता है कि कौए द्वारा भोजन स्वीकार करने पर ही श्राद्ध कर्म पूर्ण होता है। इससे पितृ दोष और शनि दोष की शांति भी होती है।
आचरण, संयम और सात्विकता के नियम... पितृपक्ष उत्सव का नहीं, बल्कि सादगी और आत्म-संयम का समय है। यही कारण है कि इस दौरान सगाई, विवाह, गृह प्रवेश, नए कारोबार की शुरुआत और नया मकान या गाड़ी खरीदने जैसे मांगलिक और भौतिक कार्यों को टालने की सलाह दी जाती है।
इन दिनों सात्विक जीवनशैली अपनाने, मांस-मदिरा से दूर रहने, गृह कलह से बचने और किसी भी जीव को न सताने का विधान है। हालांकि इस पर मतभिन्नता भी है कुछ जानकारों का कहना है कि शुभ कार्य और खरीदी से पितृ प्रसन्न ही होते हैं।
गरुड़ पुराण में वर्णित श्राद्ध पक्ष की महिमा... सनातन धर्म के प्रसिद्ध गरुड़ पुराण के अनुसार पितृपक्ष के दौरान पूर्वज सूक्ष्म रूप में अपने वंशजों के घर आते हैं और उनके द्वारा अर्पित किए जाने वाले अन्न और जल की आस रखते हैं।
पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि जो व्यक्ति समर्थ होते हुए भी पितृपक्ष में अपने पूर्वजों के निमित्त श्रद्धा से श्राद्ध, तर्पण और दान-पुण्य नहीं करता, उसके घर में पितृ दोष उत्पन्न होता है। इसके विपरीत, जो मनुष्य पूरे भाव से काले तिल, जल और सात्विक भोजन से अपने पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण करता है, उसके पूर्वज प्रसन्न होकर उसे दीर्घायु, आरोग्य, धन-धान्य और वंश वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
मार्कंडेय पुराण और वायु पुराण का मत... मार्कंडेय पुराण और वायु पुराण में भी श्राद्ध पक्ष के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि 'श्रद्धया दीयते यत्स्मिन तच्छ्राद्धम्' अर्थात् जो कर्म पूर्ण श्रद्धा और नियम के साथ पूर्वजों को समर्पित किया जाए, वही श्राद्ध है।
इन पुराणों के अनुसार, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में किया गया पिंडदान सीधे पितरों की आत्मा तक पहुंचता है और उन्हें देवलोक या मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। पुराणों में यह भी उल्लेख है कि पितरों की तृप्ति से भगवान विष्णु और सभी देवी-देवता भी स्वतः ही प्रसन्न हो जाते हैं, जिससे साधक के जीवन के समस्त विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं।
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