गोमुख की सिसकियां: आस्था के शोर में कहीं दब न जाए हिमालय की यह चेतावनी
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
गंगोत्री से ऊपर 18 किलोमीटर की वह संकरी और पथरीली राह, जहां फेफड़ों को ऑक्सीजन के लिए मशक्कत करनी पड़ती है और पैरों के छाले श्रद्धा के आवेग में ओझल हो जाते हैं। वहां पहुंचकर जब आप गोमुख के विशाल ग्लेशियर के सामने खड़े होते हैं, तो एक अजीब सा सन्नाटा आपको घेर लेता है।
यह सन्नाटा सुकून का नहीं, बल्कि एक ‘अनकही सिहरन’ का है। यह सिहरन केवल हिमालय की बर्फीली हवाओं की नहीं, बल्कि उस ‘पिघलते सच’ की है जो हमारे देश की जीवनरेखा गंगा के वजूद पर सवालिया निशान लगा रहा है।
आस्था का उद्गम-जहां भगीरथ की तपस्या आज भी मौन है... गोमुख केवल बर्फ का एक ढेला या एक भूगोल मात्र नहीं है। यह करोड़ों भारतीयों की सामूहिक चेतना का वह केंद्र है जहां आस्था और प्रकृति एक दूसरे में विलीन हो जाती हैं।
गाय के मुख जैसी उस बर्फीली गुफा से जब भागीरथी की शीतल धारा फूटती है, तो मानस पटल पर राजा भगीरथ की वह पौराणिक तपस्या जीवंत हो उठती है, लेकिन आज नियति का पहिया घूम चुका है। सदियों पहले भगीरथ गंगा को धरती पर लाने के लिए तपस्या कर रहे थे, आज हमें गंगा को धरती पर बचाए रखने के लिए एक नए किस्म की तपस्या यानी कठोर संरक्षण की दरकार है।
पीछे खिसकता भूगोल- नक्शे से गायब होती विरासत...वाडिया इंस्टिट्यूट और दुनिया भर के भू-वैज्ञानिकों के आंकड़े किसी डरावनी फिल्म की पटकथा से कम नहीं हैं।
वह दौर भी था जब गोमुख की बर्फीली दीवार गंगोत्री मंदिर के बेहद करीब हुआ करती थी। लेकिन आज? आज यह बर्फ का पहाड़ पीछे हटते-हटते भोजबासा के पड़ाव को भी बहुत पीछे छोड़ चुका है।
रिकॉर्ड बताते हैं कि पिछले 70 वर्षों में यह ग्लेशियर करीब 1.5 से 2 किलोमीटर पीछे खिसक चुका है। पहाड़ों पर जमती धूल और मानवीय गतिविधियों से पैदा हुआ कार्बन सूरज की गर्मी को सोख रहा है।
नतीजा यह है कि बर्फ के पिघलने की दर अब आउट ऑफ कंट्रोल हो चुकी है।
आस्था और पर्यावरण- एक कड़वा संतुलन... ‘धार्मिक पर्यटन’ का अनियंत्रित दबाव इस नाजुक इकोसिस्टम के लिए साइलेंट किलर साबित हो रहा है। हजारों की भीड़, प्लास्टिक का कचरा और पहाड़ों का बढ़ता तापमान यह सब मिलकर हिमालय की उस शांति को भंग कर रहे हैं जो कभी ग्लेशियर्स की सुरक्षा कवच थी।
जानकारों की राय को सच मानें तो अगर यही रफ्तार रही, तो आने वाले कुछ दशकों में गंगा का प्रवाह डरावने असंतुलन का शिकार होगा। शुरुआत में विनाशकारी बाढ़ और बाद में नदियों का सूख जाना। यह वह भविष्य है जो गौमुख के मुहाने पर दस्तक दे रहा है।
केवल पाबंदियां या सामूहिक संकल्प... गौमुख को बचाने का अर्थ केवल एक ग्लेशियर को बचाना नहीं, बल्कि उत्तर भारत की कृषि, संस्कृति और जीवन को बचाना है। इसके लिए किताबी दावों से हटकर कुछ ठोस करना होगा। गौमुख जाने वाले यात्रियों की संख्या किसी भी हाल में पहाड़ों की सहने की क्षमता से अधिक नहीं होनी चाहिए।
गंगोत्री से आगे का पूरा रास्ता ‘नो प्लास्टिक और नो कार्बन’ जोन बने। इसे केवल बोर्ड तक सीमित न रखकर जमीनी स्तर पर कड़ाई से लागू करना होगा।
गंगा की असली पूजा उसे जल चढ़ाने में नहीं... जानकारों की राय है कि श्रद्धालुओं को यह समझना होगा कि गंगा की असली पूजा उसे जल चढ़ाने में नहीं, बल्कि उसके उद्गम को सुरक्षित और प्रदूषण मुक्त रखने में है।
आज गौमुख से निकलने वाली भागीरथी की कल-कल ध्वनि कोई मधुर संगीत नहीं, बल्कि एक ‘करुण पुकार’ है। हिमालय का यह ‘सफेद सोना’ हमारी आधुनिकता और लापरवाही की गर्मी से पिघल रहा है।
समय की रेत हाथों से फिसल रही है। यदि हम आज नहीं जागे, तो भविष्य की पीढ़ियां हमसे कड़े सवाल पूछेंगी- जब गंगा का उद्गम सिसक रहा था, तब आप केवल नारों में व्यस्त थे या उसे बचाने के लिए कोई पत्थर भी हटा रहे थे।
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