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भक्ति का ‘शॉर्टकट‘ और हिमालय की सिसकियां: क्या सुविधाओं में खो गया चार धाम का पौराणिक मर्म

KHULASA FIRST

संवाददाता

24 अप्रैल 2026, 5:56 pm
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भक्ति का ‘शॉर्टकट‘ और हिमालय की सिसकियां

आधुनिकता की ‘उड़ान’ और डगमगाती पौराणिक आस्था

सुविधा के गलियारे में खोता तीर्थयात्रा का ‘तप’

हिमालय की देहरी पर बढ़ती भीड़, सवाल-श्रद्धा या मात्र पर्यटन

पगडंडियों से हाईवे तक, चार धाम की बदलती रूह

मशीनी शोर में दबी देवभूमि की पौराणिक गूंज

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
हिमालय की गोद में बसे चार धाम-बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री सदियों से हमारी सनातन परंपरा के ऊर्जा से भरपूर केंद्र रहे हैं। एक समय था, जब इन धामों की ओर बढ़ता हर कदम एक ‘आहुति’ माेना जाता था। लोग घर से ‘गंगाजली’ उठाकर निकलते थे और यह संकल्प लेकर चलते थे कि यदि शरीर इन बर्फीली चोटियों में शांत भी हो जाए, तो मोक्ष निश्चित है, लेकिन आज, 21वीं सदी के तीसरे दशक में, यात्रा का वह ‘तप’ डिजिटल सुगमता और हेलिकॉप्टरों के शोर में कहीं दब गया है।

हर चढ़ाई के साथ यात्री का अहंकार कम होता था... पौराणिक ग्रंथों में तीर्थयात्रा के लिए ‘काय-क्लेश’ का सिद्धांत वर्णित है। इसका अर्थ है शरीर को संयम और कष्ट में रखकर अंतःकरण को शुद्ध करना। पुराने समय में ऋषिकेश से आगे की डगर केवल शारीरिक श्रम नहीं, बल्कि मानसिक जप का मार्ग थी। हर चढ़ाई के साथ यात्री का अहंकार कम होता था और समर्पण बढ़ता था।

‘तपस्या’ का तत्व पूरी तरह गायब... इस यात्रा को सफलतापूर्वक पूरी कर चुके एकाधिक श्रद्धालुओं से बातचीत का यही सार निकला कि आज जब हम अपनी वातानुकूलित गाड़ियों में बैठते हैं या केदारनाथ के लिए चंद मिनटों की हवाई उड़ान भरते हैं, तो वह ‘तपस्या’ का तत्व पूरी तरह गायब हो चुका है। तकनीक ने मंदिर की भौतिक दूरी तो कम कर दी, लेकिन यह भी तो सोचिए क्या उसने भक्त और भगवान के बीच की आध्यात्मिक दूरी को बढ़ा दिया है। क्या अब सुगमता ने श्रद्धा को ‘सुविधा’ में बदल दिया है।

यात्री अब गंतव्य पर पहुंचने की होड़ में...चार धाम यात्रा का पौराणिक महत्व केवल मुख्य मंदिरों तक सीमित नहीं था। पैदल रास्तों पर पड़ने वाली चट्टी, जल-प्रपात और गुफाओं का अपना एक शास्त्र था। पांडुकेश्वर से गरुड़चट्टी तक भगवान बद्रीविशाल के मार्ग पर स्थित वह भूमि है, जहां राजा पांडु ने तपस्या की थी, या केदारनाथ मार्ग की वह गरुड़चट्टी जहां कभी सन्नाटा भी मंत्रोच्चार जैसा लगता था।

आज ये स्थान सन्नाटे में हैं। आधुनिक ‘ेहाईवे संस्कृति’ ने इन सूक्ष्म ऊर्जा केंद्रों को दरकिनार कर दिया है। यात्री अब गंतव्य पर पहुंचने की होड़ में है, यात्रा के आनंद और उसके मर्म में नहीं। स्कंद पुराण और सनत कुमार संहिता में स्पष्ट उल्लेख है कि जैसे-जैसे कलियुग प्रगाढ़ होगा, तीर्थ स्थान हाट या बाजार में बदलने लगेंगे। आज चार धाम यात्रा में बढ़ती भीड़ और ‘वीआईपी दर्शन’ की होड़ इसी भविष्यवाणी को चरितार्थ करती नजर आती है।

अब रील्स बनाने की होड़ और मोबाइल कैमरों की फ्लैश लाइट... जहां कभी शांति का साम्राज्य था, वहां अब रील्स बनाने की होड़ और मोबाइल कैमरों की फ्लैश लाइट है। हालांकि इस सबको देखते हुए इस वर्ष इनके संबंध में कड़े नियम और दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। अधिकांश श्रद्धालुओं की भरे मन से यह शिकायत है कि मंदिर के गर्भगृह में दर्शन का समय अब ‘श्रद्धा’ से नहीं, बल्कि आपकी ‘जेब’ और ‘पहुंच’ से तय होने लगा है।

अनथक बहस चली है और चलती रहेगी... हिमालय केवल भूगोल नहीं है, वह ‘देवात्मा’ है। पौराणिक मान्यता है कि पहाड़ों के साथ की गई छेड़छाड़ सीधे प्रकृति के क्रोध को निमंत्रण देती है। इस विषय पर अनथक बहस चली है और चलती रहेगी।

निरंतर उड़ते हेलिकॉप्टर और हजारों गाड़ियों का धुआं उन ग्लेशियर्स को पिघला रहा है, जो नदियों के स्रोत हैं। यात्रा मार्ग पर फैलता कचरा और प्लास्टिक केवल पर्यावरण की समस्या नहीं है, बल्कि यह उस पवित्र भूमि का अपमान भी है जिसे हम ‘देवभूमि’ कहते हैं।

अब युवा भी हो रहे आराम तलब... आलोचकों की ओर से यह तर्क दिया जा सकता है कि वृद्धों और बीमारों के लिए सुविधाएं अनिवार्य हैं। धर्मशास्त्र भी ‘आपद्धर्म’ यानी आपत्ति या संकट के समय अपनाया जाने वाला धर्म या आचरण की अनुमति देते हैं, लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब समर्थ युवा भी केवल ‘आराम’ के लिए ऐसे शॉर्ट कट्स को चुनते हैं। शास्त्रों के अनुसार-जितना अधिक कष्ट, उतना अधिक फल। यह कोई शारीरिक प्रताड़ना नहीं, बल्कि धैर्य की परीक्षा है।

केवल पिकनिक नहीं है तीर्थयात्रा... आज जब हम ‘घोड़े-खच्चर’ से ‘हेलिकॉप्टर’ के युग में आ चुके हैं, तो हमें यह समझना होगा कि तीर्थयात्रा ‘पिकनिक’ नहीं है। विकास अनिवार्य है, लेकिन वह ‘विनाश’ की कीमत पर न हो। यदि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को केवल कांक्रीट के मंदिर और व्यावसायिक गलियारे देना चाहते हैं, तो यह यात्रा सफल है, लेकिन यदि हम उन्हें वह ‘दिव्य ऊर्जा’ देना चाहते हैं जिसे आदि शंकराचार्य ने महसूस किया था, तो हमें पुनः प्रकृति और तपस्या की ओर लौटना होगा।

चार धाम की डगर वह नहीं जो सड़क पर खत्म हो, बल्कि वह है जो हमारे भीतर के अंधकार को मिटा दे।

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