फर्जी दस्तावेजों के दम पर सरकारी बगीचा हड़पने का खेल: स्टे, नोटिस और नगर निगम ने दी भवन अनुमति
KHULASA FIRST
संवाददाता

फाइलों के बीच चलता रहा निर्माण, प्रशासनिक मिलीभगत पर अब उठे गंभीर सवाल
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर में सरकारी जमीन, देवस्थल, बगीचे और सार्वजनिक संपत्तियां अब भू-माफियाओं के निशाने पर हैं। फर्जी दस्तावेजों, पुराने नक्शों और संदिग्ध अनुमतियों के सहारे सरकारी भूमि पर कब्जा कर अवैध निर्माण किए जा रहे हैं।
करोड़ों की जमीन को निजी संपत्ति बताकर बेचा जा रहा है और जिम्मेदार विभाग केवल नोटिस, पत्राचार और फाइलों में कार्रवाई का दिखावा करते नजर आ रहे हैं। छत्रीबाग राजस्व ग्राम कॉलोनी स्थित ‘तिकोना गार्डन’ का मामला इसी संगठित खेल की परतें खोल रहा है, जहां हाई कोर्ट में मामला लंबित होने और राजस्व रिकॉर्ड में भूमि शासकीय दर्ज होने के बावजूद निर्माण कार्य लगातार जारी रहा।
कलेक्टर कार्यालय के पीछे स्थित राजस्व ग्राम कॉलोनी में वर्षों से सरकारी बगीचे की जमीन पर कब्जे और निर्माण का सिलसिला चल रहा है। रहवासियों के अनुसार पहले आधे बगीचे पर छह दुकानें और एक कार्यालय बना दिया गया, जहां वर्तमान में व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं।
अब उसी विवादित भूमि के शेष हिस्से पर ग्रीन नेट लगाकर नया निर्माण शुरू कर दिया गया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि भू-माफियाओं ने फर्जी दस्तावेजों और पुराने नक्शों के आधार पर सरकारी भूमि को निजी प्लॉट बताकर कब्जा जमा लिया।
शिकायतों के बावजूद प्रशासन और नगर निगम एक-दूसरे को पत्र लिखते रहे, जबकि मौके पर निर्माण कार्य लगातार चलता रहा। रहवासियों के मुताबिक मौके पर मौजूद मजदूरों ने निर्माण कार्य ‘बलराज कमांडो’ द्वारा करवाए जाने की जानकारी दी।
बगीचे में पहले से संचालित एक कार्यालय में प्रॉपर्टी संबंधी गतिविधियां भी चल रही हैं। आरोप है कि धीरे-धीरे पूरे बगीचे को निजी कब्जे में बदलने की तैयारी की जा रही है। निर्माण से जुड़े पक्ष की ओर से दावा किया गया कि सभी आवश्यक अनुमतियां ली गई हैं, लेकिन रहवासियों ने इन दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की मांग उठाई है।
स्टे के बावजूद नहीं रुका कब्जे का खेल
मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस भूमि को लेकर हाई कोर्ट में मामला विचाराधीन है और जिस पर तहसीलदार न्यायालय द्वारा स्थगन आदेश जारी किया जा चुका है, वहां निर्माण आखिर कैसे जारी रहा?
तहसीलदार मल्हारगंज द्वारा 9 अप्रैल 2026 को जारी आदेश में स्पष्ट कहा गया था कि सर्वे नंबर 911 की शासकीय भूमि पर निर्माण कार्य तत्काल रोका जाए। इसके बावजूद निर्माण सामग्री पहुंचना, खुदाई, ट्रैक्टर-ट्रॉली से मिट्टी परिवहन और बीम डालने जैसे कार्य लगातार जारी रहे।
1974 के ले-आउट के आधार पर जारी हुई भवन अनुमति
रिपोर्ट के अनुसार नगर तथा ग्राम निवेश विभाग द्वारा 1 मई 1974 को स्वीकृत ले-आउट में भूखंड क्रमांक 71 से 78 दर्शाए गए थे। इन्हीं में से भूखंड क्रमांक 72 पर नगर निगम द्वारा 14 अगस्त 2025 को भवन अनुज्ञा जारी की गई, जिसके बाद भू-स्वामी परमजीत कौर लौंगिया द्वारा निर्माण कार्य प्रारंभ किया गया।
हालांकि, बाद में राजस्व रिकॉर्ड और हल्का पटवारी की जांच रिपोर्ट में सामने आया कि कस्बा इंदौर पार्ट मल्हारगंज के सर्वे नंबर 911, रकबा 0.6110 हेक्टेयर शासकीय भूमि के लगभग 1200 वर्गफीट हिस्से पर निर्माण कार्य किया जा रहा था।
राजस्व रिकॉर्ड में शासकीय भूमि साबित...
अपर तहसीलदार मल्हारगंज की जांच रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख किया गया कि सर्वे नंबर 911 और 912 शासकीय भूमि हैं। सीमांकन रिपोर्ट में तिकोना बगीचा सरकारी भूमि पर निर्मित पाया गया।
लगभग 1200 वर्गफीट क्षेत्र में निर्माण कार्य किया जा रहा था। निर्माण रोकने के लिए स्थगन आदेश जारी किया गया था। इसके बावजूद निर्माण गतिविधियां जारी रहना प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न माना जा रहा है।
2005 से लड़ रहे रहवासी
कॉलोनीवासियों का कहना है कि वे वर्ष 2005 से बगीचे को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। भोपाल, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग और नगर निगम सहित कई विभागों में शिकायतें की जा चुकी हैं, लेकिन प्रभावी कार्रवाई आज तक नहीं हुई।
रहवासियों ने मांग की है कि पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए। फर्जी दस्तावेज तैयार करने वालों पर एफआईआर दर्ज हो। अवैध निर्माण तत्काल हटाया जाए। संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच हो। सरकारी भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराया जाए।
प्रशासनिक कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित?
एसडीएम मल्हारगंज निधि वर्मा ने शिकायत के बाद निर्माण रुकवाने और आगे की कार्रवाई के लिए मामला नगर निगम को भेजने की बात कही थी। लेकिन रहवासियों का आरोप है कि अगले ही दिन निर्माण फिर शुरू हो गया।
नगर निगम ने भी राजस्व विभाग को पत्र लिखकर भूमि की वास्तविक स्थिति पूछी, जबकि राजस्व विभाग की जांच रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख किया गया कि निर्माण शासकीय भूमि पर हो रहा है। इसके बावजूद न तो निर्माण हटाया गया और न ही जिम्मेदारों पर कोई कठोर कार्रवाई हुई।
फर्जी दस्तावेजों का ‘जादू’ और विभागों की चुप्पी... स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि शहर में ऐसे ‘दस्तावेज जादूगर’ सक्रिय हैं, जो वर्षों पुराने नक्शों और संदिग्ध रिकॉर्ड के आधार पर सरकारी जमीन को निजी संपत्ति साबित कर देते हैं।
रहवासियों के अनुसार वर्ष 1993 का कथित नक्शा ऐसे व्यक्ति के नाम पर पेश किया गया, जिसका जमीन से कोई संबंध नहीं था। वर्ष 1999 के नक्शे का उपयोग वर्ष 2024 में निर्माण को वैध साबित करने के लिए किया गया।
नगर निगम ने पहले लिखित में कहा था कि कोई स्वीकृत नक्शा उपलब्ध नहीं है, फिर बाद में भवन अनुज्ञा कैसे जारी कर दी गई? इन सवालों ने नगर निगम, राजस्व विभाग, विद्युत मंडल और अन्य संबंधित विभागों की भूमिका पर गंभीर संदेह खड़े कर दिए हैं।
सरकारी जमीन पर बिजली कनेक्शन भी!... रहवासियों ने आरोप लगाया कि शासकीय बगीचे की जमीन पर बने निर्माण को बिजली कनेक्शन तक उपलब्ध करा दिया गया। सवाल उठ रहा है कि जब भूमि विवादित थी और मामला न्यायालय में लंबित था, तब विद्युत कनेक्शन किस आधार पर जारी किया गया?
स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन केवल नोटिस जारी कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान रहा है, जबकि जमीन पर कब्जा लगातार बढ़ता जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल...
जब राजस्व रिकॉर्ड भूमि को शासकीय बता रहा है, हाई कोर्ट में मामला लंबित है, तहसीलदार स्थगन आदेश जारी कर चुका है, तब आखिर किसके संरक्षण में सरकारी बगीचे पर निर्माण जारी है?
क्या नोटिस और पत्राचार की आड़ में भू-माफियाओं को खुली छूट दी जा रही है? और क्या सरकारी जमीन बचाने की जिम्मेदारी अब सिर्फ शिकायत करने वाले नागरिकों पर छोड़ दी गई है?
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