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शेर के घर में अनसुनी टाइगर की दहाड़: रिंग मास्टर का इशारा या फिर चेतावनी

Khulasa First

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संवाददाता

15 अक्टूबर 2026, 2:02 pm
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शेर के घर में अनसुनी टाइगर की दहाड़

कोसमी कांड से गर्माई सियासत

केंद्रीय मंत्री शिवराज का अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा, दिए बड़े राजनीतिक संकेत

एमपी में सत्ता संतुलन की जंग: 'लाड़ली बहना' से 'वनवासी' तक, शिवराज सिंह के तेवरों से असहज सरकार!

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर ‘टाइगर अभी जिंदा है’ की गूंज पिछले दिनों देर रात अचानक सुनाई दी, लेकिन शेर की गर्जना में वह कहीं गुम हो गई। मध्य प्रदेश में अपने अतीत को जीने वाले शिवराज सिंह चौहान प्रदेश सरकार पर अपना प्रभाव कायम रखना चाहते हैं, मगर डॉ. मोहन यादव ऐसा होने नहीं दे रहे हैं। यह दहाड़ मुख्यमंत्री के लिए चेतावनी थी या संघ अथवा पार्टी हाईकमान के इशारे पर गूंजी, इसे समझना होगा। राजनीतिक विश्लेषक इस घटनाक्रम की अलग-अलग व्याख्याएं कर रहे हैं।

स वाल यह है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार के अधीन प्रशासनिक तंत्र पर सवाल उठाते हुए केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान का इस तरह मोर्चा लेना क्या संदेश देता है? इस बार उन्होंने सीधे मुख्यमंत्री को चेतावनी देने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि वनवासियों के वोट से वह मुख्यमंत्री बने हैं।

हालांकि, चुनाव शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में लड़ा गया था और भाजपा को जीत मिली थी। ऐसे में इसे इस संदेश के रूप में भी देखा जा सकता है कि सरकार बनने में शिवराज की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। इसके साथ ही धरना भी सांकेतिक रूप से दिया गया, जिसे सीधे तौर पर सरकार की नीतियों के खिलाफ माना जा रहा है।

बाद में उन्होंने लाड़ली बहना योजना का मुद्दा उठाते हुए भी सरकार को इशारों-इशारों में चेतावनी देने और अपनी जनप्रिय छवि को मजबूत करने की कोशिश की। प्रदेश सरकार के खजाने पर भारी पड़ रही इस योजना की आर्थिक लागत और इस तरह की अन्य मुफ्त योजनाओं से सरकार पर वित्तीय दबाव बढ़ रहा है। शिवराज इस स्थिति से भली-भांति परिचित हैं। संभव है कि वे सरकार की इसी कमजोर कड़ी की ओर बार-बार ध्यान दिला रहे हों।

एक राजनीतिक व्याख्या यह हो सकती है कि शिवराज अपने पुराने जननेता वाले स्वरूप को फिर सामने ला रहे हैं। दूसरी व्याख्या यह है कि वे अपने राजनीतिक समर्थकों और प्रदेश के मतदाताओं को बताना चाहते हैं कि पद भले बदल गया हो, लेकिन जनता के मुद्दों पर उनकी आवाज कमजोर नहीं हुई है।

विश्लेषकों का मानना है कि समय-समय पर इस तरह सामने आकर वे यह संदेश भी देना चाहते हैं कि प्रदेश में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। एक अनुमान यह भी है कि संघ परिवार के इशारे पर मुख्यमंत्री के सामने टाइगर की दहाड़ के जरिए पार्टी हाईकमान को कोई संकेत दिया गया हो।

संघ परिवार और पार्टी हाईकमान के बीच अंदरूनी खींचतान की चर्चाएं भी समय-समय पर होती रही हैं। यह भी हो सकता है कि सत्ता में संतुलन बनाए रखने की रणनीति के तहत शिवराज ने यह कदम उठाया हो। हालांकि, यह अनुमान लगाना कठिन है कि इसके पीछे किसका संकेत था। इतना जरूर है कि शिवराज सिंह चौहान ने सार्वजनिक रूप से अपनी बात दमदारी से रखी और उनकी देहभाषा से भी आत्मविश्वास झलक रहा था।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी जवाब में संतुलित रुख अपनाते हुए कहा कि सरकार संवेदनशील है और मामले की जांच कराई जाएगी। उनकी देहभाषा रक्षात्मक होने के साथ सम्मानजनक भी नजर आई। उन्होंने ईंट का जवाब पत्थर से देने की कोशिश नहीं की। यही उनकी राजनीतिक चातुर्य की खूबी है।

बीते करीब पौने तीन वर्षों में मुख्यमंत्री ने पार्टी के भीतर अपने विरोधियों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से नाराजगी व्यक्त करने या आरोप-प्रत्यारोप का रास्ता अपनाने से परहेज किया है। इसमें दो मत नहीं कि मुख्यमंत्री प्रदेश में भाजपा के सबसे प्रभावशाली नेताओं में अपनी जगह बना चुके हैं।

यदि वे इसी तरह राजनीतिक संतुलन साधते रहे, तो उनका भविष्य भी वर्तमान की तरह मजबूत बना रह सकता है। एक तरह से सियासत के इस जंगल में डॉ. मोहन यादव शेर की तरह विरोधियों से मोर्चा ले रहे हैं। इसीलिए उनकी गर्जना के आगे टाइगर की दहाड़ भाजपा के राजनीतिक बियाबान में अक्सर गुम हो जाती है या कर दी जाती है। फिलहाल, शिवराज के दांव उलटे पड़ते दिखाई दे रहे हैं।

पुराने प्रभाव और नए नेतृत्व के बीच संघर्ष... केंद्रीय कृषि मंत्री और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सीहोर जिले के कोसमी गांव में आदिवासी परिवारों के घरों पर हुई कार्रवाई के विरोध में धरने पर बैठ गए।

यह घटनाक्रम महज 12 आदिवासी परिवारों के घरों पर हुई कार्रवाई का विरोध भर नहीं है, बल्कि इसे मध्य प्रदेश भाजपा के भीतर पुराने प्रभाव और नए नेतृत्व के बीच शक्ति-संतुलन के संघर्ष के रूप में भी देखा जा रहा है।

एक ओर शिवराज अपनी दहाड़ से यह रेखांकित करना चाहते हैं कि वे प्रदेश की राजनीति से अलग नहीं हुए हैं, वहीं दूसरी ओर यह घटनाक्रम इस बात की ओर भी संकेत करता है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद डॉ. मोहन यादव ने प्रदेश की राजनीतिक जमीन पर अपनी स्थिति मजबूत की है।

अपनी राजनीतिक धमक बनाए रखने के लिए शिवराज को समय-समय पर ऐसे कदम उठाने पड़ रहे हैं। वहीं, मुख्यमंत्री ने भी प्रदेश में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास किए हैं।

भले ही मंचों पर दोनों नेता पार्टी अनुशासन और आपसी समन्वय का संदेश देते हों, लेकिन प्रशासनिक नियंत्रण, नीतियों की दिशा और अपने-अपने राजनीतिक वजूद को बनाए रखने की खींचतान समय-समय पर सामने आती रही है।

भाजपा की अंदरूनी राजनीति में मौजूदा परिस्थितियां शिवराज सिंह चौहान के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं। उन्हें अपने परंपरागत राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखने के लिए भी काफी प्रयास करने पड़ रहे हैं।

परीक्षा दहाड़ की नहीं, नतीजे की... शिवराज सिंह चौहान की राजनीति में जनसंपर्क और भावनात्मक संवाद की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है, लेकिन इस बार असली कसौटी केवल उनकी दहाड़ नहीं है।

सवाल यह है कि कोसमी के प्रभावित परिवारों को क्या राहत मिलती है, उनके अधिकारों की जांच कैसे होती है और प्रशासनिक कार्रवाई की जवाबदेही किस स्तर पर तय की जाती है।

यह भी देखना होगा कि शिवराज भविष्य में दूसरे जनहित के मुद्दों पर इसी तरह सक्रिय होते हैं या उनका हस्तक्षेप इस घटना तक ही सीमित रहता है। कोसमी में शिवराज सिंह चौहान का धरना मध्य प्रदेश की राजनीति का उल्लेखनीय घटनाक्रम है।

इससे यह स्पष्ट हुआ है कि केंद्रीय मंत्री बनने के बाद भी वे प्रदेश के जनहित के मुद्दों पर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक आवाज उठा सकते हैं। अब देखना यह है कि इसका परिणाम आदिवासी परिवारों को न्याय दिलाने तक सीमित रहता है या मध्य प्रदेश भाजपा की अंदरूनी राजनीति में भी इसके दूरगामी संकेत दिखाई देते हैं।

भाजपा की ‘पॉलिटिकल सर्कस’ में कौन है रिंग मास्टर?
मध्य प्रदेश की राजनीति को यदि एक राजनीतिक रंगमंच माना जाए, तो यहां कई प्रमुख किरदार हैं-मुख्यमंत्री मोहन यादव, केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश भाजपा संगठन और दिल्ली का केंद्रीय नेतृत्व। हर किरदार की अपनी भूमिका और राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं।

इन सबके ऊपर रिंग मास्टर की भूमिका में पार्टी हाईकमान को देखा जाता है। संघ की भी अपनी भूमिका है, लेकिन वह अपनी क्षमता का उपयोग सीधे रिंग मास्टर की तरह नहीं करता। ऐसे में प्रदेश की राजनीति में होने वाले घटनाक्रमों के पीछे किसकी रणनीति है, यह समझना आसान नहीं है।

मकान और रोजगार दिलाने की पहल भी जरूरी...विस्थापित वनवासी परिवारों की मदद के लिए शिवराज सिंह चौहान चाहें तो उनके मकान बनवाने और रोजगार के साधन उपलब्ध कराने की पहल कर सकते हैं। इन परिवारों के बच्चों को अच्छे संस्थानों में शिक्षा दिलाने के साथ उन्हें सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ भी दिलाया जा सकता है।

भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं का भी मानना है कि जंगलों को बचाना जरूरी है और पार्टी अनुशासन के नियम सभी के लिए समान होने चाहिए। इसके साथ ही प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और उनकी आजीविका की व्यवस्था पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

कोसमी गांव में वनभूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान बरेला आदिवासी समुदाय के 12 परिवारों के घर तोड़े जाने का मामला सामने आया। शिवराज ने प्रभावित परिवारों से मुलाकात की, उनके साथ धरने पर बैठे और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई।

अब कुछ भाजपा नेताओं का कहना है कि शिवराज सिंह चौहान को बेघर हुए वनवासी परिवारों के पुनर्वास की पहल भी करनी चाहिए। इससे एक सकारात्मक संदेश जाएगा और यह भी स्पष्ट होगा कि उनका हस्तक्षेप केवल राजनीतिक उद्देश्य तक सीमित नहीं, बल्कि प्रभावित परिवारों की मदद के लिए भी है।

यदि ऐसी पहल नहीं होती है, तो मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को अपनी ओर से आगे आकर प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और सहायता के लिए कदम उठाने चाहिए। इससे सरकार की संवेदनशीलता का संदेश जाएगा और प्रभावित परिवारों को राहत मिलने का रास्ता भी खुल सकता है।

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