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धोखा साबित हुआ ‘एक-एक दाना खरीदेंगे' वादा: सरकार की नीयत पर फिर उठे सवाल

Khulasa First

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संवाददाता

25 मई 2026, 6:37 pm
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धोखा साबित हुआ ‘एक-एक दाना खरीदेंगे' वादा

कॉरपोरेट लाॅबी और व्यापारियों के दबाव में बंद की स्लॉट बुकिंग ?

विपक्ष और किसान संगठन क्यों हैं मौन, मुख्यमंत्री के प्रयास पर पानी फिरा

भाकिंस ने सरकार से की भावांतर देने की मांग

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
प्रदेश सरकार ने बिना बताए गेहूं खरीदने से हाथ खींच लिए हैं? मीडिया की खबरें बता रही है गेहूं खरीदी की स्लॉट बुकिंग बंद की जा चुकी है। इस बारे में किसी भी तरह की जानकारी पंजीकृत किसानों को नहीं दी गई है।

यह इससे भी साबित होता है कि लगभग एक महीने से पंजीकृत किसान पैसा और समय खर्च कर लगातार स्लॉट बुकिंग की बार-बार कोशिश कर रहे हैं लेकिन जो बच गए, उनमें से किसी की बुकिंग नहीं हुई। कहा जा रहा है किसानों को अंधेरे में रख स्लॉट बुकिंग तो कई दिन पहले बंद कर दी गई।

जैसा उज्जैन जिले से आ रही खबरें बता रही है यहां पर पूरी तरह सरकारी विधि विधान और नियम कायदों के अंतर्गत सरकार द्वारा पंजीकृत लगभग 21 हजार से अधिक किसान सरकार के छल-कपट का शिकार हो गए है।

यही स्थिति खरगोन जिले की महेश्वर तहसील की है। बीते तीन हफ्ते से स्टॉल बुकिंग के लिए किसान तपती धूप में परेशान हो रहे हैं लेकिन आज तक एक स्लॉट बुक नहीं हुआ।

किसानों को नहीं मालूम स्लॉट बुक होगा, सरकार की धोखाधड़ी के शिकार हो चुके हैं या उन्हें सुनियोजित तरीके से मुनाफाखोर कमॉडिटी की बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों (इनमें बाबा रामदेव की पतंजलि से अडानी तक की कंपनियां शामिल हैं) और व्यापारियों के सिंडिकेट के सामने लुटने-पिटने के लिए छोड़ दिया गया है।

सरकार द्वारा स्लॉट बुकिंग बंद करने से किसानों को खुले बाजार मंडी में गेहूं बेचने पर प्रति क्विंटल लगभग 200 से 400 रुपए का नुकसान होगा, जो करोड़ों में है।

भुगतान करे सरकार
किसानों को इस समस्या से बचाने के लिए भारतीय किसान संघ के प्रदेश अध्यक्ष कमलसिंह अंजना ने कहा है सरकार किसानों को खुले बाजार में गेहूं बेचने पर भावांतर का भुगतान करें। सरकार खरीदी बंद करने के बाद भावांतर नहीं देती है तो फायदा व्यापारियों और कंपनियों को होगा।

अब सवाल किया जा रहा है मुख्यमंत्री की मंशा के विपरीत अफसर लॉबी ने क्या कंपनियों और व्यापारियों को फायदा पहुंचाने के लिए किसानों के साथ शुरू से ही छल-कपट किया है? क्योंकि मुख्यमंत्री ने गेहूं उपार्जन की घोषणा करते हुए कहा था किसानों के गेहूं के एक-एक दाने को सरकार खरीदेगी।

अपने मुख्यमंत्री पर भरोसा कर किसान तमाम तकलीफों के बावजूद निश्चिंत रहे कि आगे-पीछे देर-सवेर सरकार गेहूं खरीद लेगी। किसानों को अभी भी यह नहीं मालूम की स्टॉल बुकिंग नहीं होने के पीछे कोई बड़ी सोची समझी योजना है ?

प्रदेश में सरकार ने काफी कुछ गेहूं खरीदा लेकिन अंत में जो थोड़े बहुत किसान बचे है या जिन्हें खुले बाजार के भरोसे छोडा जा रहा है इनका गेहूं खरीदने से सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता और मुख्यमंत्री के वादा खिलाफी की जो बदनामी लंबे समय तक होगी, उससे भी बचा जा सकता है।

गेहूं की खरीद को लेकर प्रदेश में विपक्ष और किसान संगठनों ने उग्र आंदोलन किए थे। मुख्यमंत्री ने किसी तरह इस संकट से सरकार और संगठन को बचाते हुए खरीदी शुरू करवाई।

यह कहते हुए कि हर पंजीकृत किसान के एक-एक दाने को सरकार खरीदेगी। हमेशा की तरह मुख्यमंत्री के इस वादे पर किसानों ने भरोसा कर लिया और इसी भरोसे पर स्लॉट बुकिंग से वंचित किसान बुकिंग का इंतजार कर रहे हैं।

स्लाट बुकिंग बंद कर दिए जाने की खबरों से किसानों में गुस्सा है। सरकार एक बार फिर किसानों के निशाने पर है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उपार्जन सीजन की शुरुआत में कई मंचों से यह भरोसा दिलाया था कि ‘किसानों के गेहूं का एक-एक दाना सरकार खरीदेगी’, लेकिन अब समर्थन मूल्य पर गेहूं बेचने के लिए पंजीकरण करा चुके हजारों किसान स्लॉट बुकिंग के लिए भटक रहे हैं।

सरकार द्वारा शायद अचानक स्लॉट बुकिंग पोर्टल बंद कर दिए जाने से किसानों के सामने अपनी उपज औने-पौने दाम पर बेचने की मजबूरी खड़ी हो गई है।

उज्जैन में 21 हजार किसान खरीदी से वंचित
उज्जैन से मीडिया में आई खबर के अनुसार जिले के 1 लाख 25 हजार से अधिक पंजीकृत किसानों में से लगभग 21 हजार किसान समर्थन मूल्य पर अपनी उपज नहीं बेच पाए। खरीद अवधि समाप्त होने से पहले ही स्लॉट बुकिंग पोर्टल बंद कर दिए जाने के कारण हजारों किसानों का नंबर ही नहीं आ सका।

अब जबकि खरीदी की तिथि बढ़ाकर 28 मई तक कर दी गई है, फिर भी जिन किसानों को स्लॉट नहीं मिला, उनकी समस्या जस की तस है।

मुख्यमंत्री के वादे का क्या हुआ?
किसानों का सबसे बड़ा सवाल है जब सरकार स्वयं घोषणा कर चुकी थी हर किसान की उपज खरीदी जाएगी, तो फिर खरीद प्रक्रिया के बीच में स्लॉट बुकिंग क्यों बंद कर दी गई? यदि सरकार के पास पर्याप्त व्यवस्था थी तो हजारों किसानों को अपनी उपज घरों में रखने या निजी व्यापारियों को बेचने की नौबत क्यों आई?

किसानों ने बताया पंजीयन कराने और कई दिनों तक इंतजार करने के बाद भी कई किसानों ने मजबूरी में खुले बाजार में कम कीमत पर गेहूं बेच दिया, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। अब बचे हुए किसानों का भी यही हश्र होना है।

भारतीय किसान संघ ने उठाई थी समस्या
किसानों की इस समस्या को लेकर भारतीय किसान संघ ने सरकार के सामने गंभीर आपत्ति दर्ज कराई थी। कहना था जिन किसानों ने नियमानुसार पंजीयन कराया है, उनकी पूरी उपज खरीदना सरकार की जिम्मेदारी है।

संगठन ने मांग की थी स्लॉट बुकिंग पोर्टल तत्काल पुनः खोला जाए, सभी पंजीकृत किसानों की उपज खरीदी जाए, जिन किसानों को खरीद केंद्रों पर मौका नहीं मिला, उन्हें भावांतर अथवा मूल्य अंतर की भरपाई दी जाए, खरीदी अवधि और केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए ताकि कोई किसान वंचित न रहे।

किसान संघ का तर्क है प्रशासनिक खामियों का खामियाजा किसानों पर नहीं थोपा जा सकता। सरकार समय पर व्यवस्था नहीं कर सकी तो नुकसान की भरपाई भी सरकार को ही करना चाहिए।

खुले बाजार में लुटने को मजबूर किसान
सरकारी समर्थन मूल्य 2625 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित होने के बावजूद बड़ी संख्या में किसानों को निजी व्यापारियों के हाथों कम कीमत पर गेहूं बेचना पड़ा। कई किसानों ने बताया समर्थन मूल्य से 100 से 200 रुपए प्रति क्विंटल कम दाम पर उपज बेचने के कारण उन्हें हजारों रुपये का सीधा नुकसान हुआ।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है पंजीकृत किसानों की उपज समय पर नहीं खरीदी जाती तो सरकारी खरीद नीति का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है। इससे किसानों का सरकारी व्यवस्था पर विश्वास भी प्रभावित होता है।

विपक्ष को मिला बड़ा मुद्दा
गेहूं खरीदी में आई अव्यवस्थाओं ने विपक्ष को सरकार पर हमला बोलने का अवसर दे दिया है। विपक्षी दल आरोप लगा रहे हैं सरकार ने किसानों से बड़े-बड़े वादे किए लेकिन जमीनी स्तर पर पर्याप्त तैयारी नहीं की। किसानों को समर्थन मूल्य का लाभ दिलाने के बजाय उन्हें बाजार की दया पर छोड़ दिया गया।

सबसे बड़ा सवाल- अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है जब मुख्यमंत्री स्वयं ‘एक-एक दाना खरीदने’ का भरोसा दे चुके थे, तो फिर हजारों पंजीकृत किसानों की उपज खरीद से कैसे रह गई? क्या सरकार स्लॉट बुकिंग दोबारा खोलकर सभी किसानों को मौका देगी, या फिर उन्हें खुले बाजार में कम कीमत पर उपज बेचने की मजबूरी झेलनी पड़ेगी? किसानों की नजर अब सरकार के अगले कदम पर है।

यदि वंचित किसानों की उपज नहीं खरीदी गई तो यह मामला केवल प्रशासनिक अव्यवस्था नहीं, बल्कि किसानों के साथ किए गए वादे और उसकी विश्वसनीयता का भी बड़ा राजनीतिक प्रश्न बन सकता है।

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