खाली हो गए रास्ते भोजशाला के वास्ते: भोजशाला हिंदुओं की, मंदिर है; मस्जिद नहीं
KHULASA FIRST
संवाददाता

अब नमाज-अजान नहीं, शंखनाद होगा
बरस-ओ-बरस के संघर्ष-आस्था की हुई जीत, कोर्ट ने माना भोजशाला हिंदू मंदिर, अब 24 घंटे होगी पूजा
धार, मालवा, निमाड़ अंचल ही नहीं, पूरे देश में फैली खुशियों की लहर, अयोध्या जैसा आया फैसला, खूब मना जश्न
कोर्ट का फैसला सटीक और वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित, याचिकाकर्ता ने इसे संपूर्ण हिंदू समाज की जीत बताया
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी गद्गद्, बोले- अयोध्या की तर्ज पर होगा अब भोजशाला व धार का विकास
मुसलमान अब भी अड़े, सुप्रीम कोर्ट जाने की घोषणा, एएसआई की रिपोर्ट को झूठ करार दिया, सुप्रीम कोर्ट में लगी केविएट
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने शुक्रवार को धार स्थित भोजशाला पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा- वैज्ञानिक पुरातात्विक सर्वे, स्थापत्य विश्लेषण, शिलालेखों और ऐतिहासिक दस्तावेजों से यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान ढांचा एक पूर्ववर्ती मंदिरनुमा संरचना के ऊपर निर्मित है।
इसे बाद में मस्जिद के रूप में उपयोग किया गया। कोर्ट ने माना कि एएसआई की वैज्ञानिक रिपोर्ट में मिले साक्ष्य मंदिर स्थापत्य, देवी-देवताओं की प्रतिमाओं, संस्कृत-प्राकृत भाषा के अभिलेखों और परमारकालीन संरचना की ओर संकेत करते हैं।
कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला 242 पेज का है। 24 दिन इस मामले में लगातार सुनवाई हुई। वसंत पंचमी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 3 महीने की डेडलाइन दी थी। 22 जनवरी के बाद से लगातार सुनवाई हो रही थी।
कोर्ट ने 2003 का एएसआई का वह नोटिफिकेशन भी निरस्त कर दिया, जिसमें मुस्लिमों को नमाज पढ़ने की इजाजत दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम समाज मस्जिद के लिए अन्य स्थान पर जमीन का आवेदन करे तो सरकार विचार करे।
लंदन के जिस म्यूजियम में वाग्देवी की प्रतिमा रखी है, उसे वापस लाने के लिए याचिकाकर्ता कई आवेदन कर चुके हैं। केंद्र सरकार प्रतिमा वापस लाने का प्रयास करे। कोर्ट के फैसले का मुख्य याचिकाकर्ता आशीष गोयल ने स्वागत करते हुए इसे संपूर्ण हिंदू समाज की जीत बताया। वहीं धार शहर काजी वकार सादिक ने कहा कि ये फैसला समाज को स्वीकार नहीं है। हम इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएंगे।
झर-झर बहे खुशी के आंसू, होली-दीवाली साथ मनी...इंदौर के बगल में बसा धार शुक्रवार सुबह से ही टकटकी लगाए हुए इंदौर की तरफ देख रहा था। फैसले की आहट व बात धार के हर गली, मोहल्ले, चौक, चौराहों, दुकानों पर ही नहीं, घर-घर हो रही थी।
भोजशाला मुक्ति आंदोलन न सिर्फ धार शहर, बल्कि धार से लगे गांव-कस्बों का भी आंदोलन बन गया था। इसमें पुरुषों से ज्यादा महिलाएं जुड़ी हुई थीं। कल जुमा भी था, लिहाजा नमाज की बारी भी थी। भारी सुरक्षा बंदोबस्त थे। '
तय समय पर नमाजी पहुंचे और नमाज हुई। नमाज मुकम्मल होने के पहले ही फैसला भोजशाला के पक्ष में आ गया। बिजली की तरह ये खबर पूरे धार में दौड़ी और जनसैलाब पहले सड़कों पर उमड़ा, फिर भोजशाला की तरफ बढ़ चला।
महिलाओं की खुशी देखते ही बन रही थी। उनकी आंखों से खुशी के आंसू झर-झर बह रहे थे। कई मर्तबा उन्होंने भी अपनी कोमल देह पर लाठियां खाईं। इन्हीं लाठियों की मार ने उनके संकल्प को, उनकी हिम्मत की तरह दृढ़ कर दिया।
सड़कों पर उल्लास और उत्सव पसर गया। धार नगरी भगवा पताकाओं से पट गई। दिन में खूब रंग-गुलाल उड़ा। दिन ढलने के बाद घर-घर दीपक प्रज्ज्वलित कर दीवाली मनाई गई।
भोजशाला का जर्रा-जर्रा बता रहा था कि ये मंदिर है, पाठशाला है...भोजशाला को महज एक नजर देखने के बाद ही कोई नासमझ भी ये बता सकता था कि यह मस्जिद नहीं, केवल मंदिर है।
भोजशाला परिसर के 104 खंभे मजबूती से बोलते थे कि देख लीजिए हमारी बनावट, हम पर उकेरी गई शंख, चक्र, गदा, घंटियों की आकृतियां। भोजशाला के दरवाजे के ऊपर गजानंद महाराज भी गवाही देते थे कि जहां प्रथम पूज्य गणेश विराजे हैं, वह मस्जिद कैसे हो सकती है?
शिलालेखों पर दर्ज मंत्र, संस्कृत-प्राकृत भाषा की शब्दावली चीख-चीखकर कहती थी कि बताइए, इसमें उर्दू कहां है? परिसर में बनी यज्ञवेदी गवाह थी कि कभी किसी मस्जिद में हवन-पूजन कहां होता है?
मुख्य हवन कुंड की प्रज्ज्वलित अग्निशिखा का आलोक हर बरस बोल उठता था कि ये भगवती सरस्वती का दिव्य, भव्य व अनुपम स्थान है।
बावजूद इसके भोजशाला को मस्जिद मानने की जिद दशकों से जारी थी और दुःखद है कि न्यायालय के फैसले के बाद भी ये जिद बरकरार है।
खाली कर दो रास्ते, भोजशाला के वास्ते...! 5 दशक से ये नारा राजा भोज की नगरी धार में ही नहीं, समूचे मालवा-निमाड़ अंचल में जन-जन की जुबां पर था। हर बरस की वसंत पंचमी इस नारे में जोश व जुनून भर देती थी, लेकिन हिंदू समाज सिर्फ मन मसोसकर रह जाता था।
चप्पा-चप्पा चीख-चीखकर कहता था कि मैं मंदिर हूं। मैं ज्ञान की देवी मां सरस्वती की पाठशाला हूं, लेकिन मुस्लिम समाज की जिद ऐसी कि ये मस्जिद है और नमाज यहीं पढ़ी जाएगी। वोट बैंक की राजनीति प्रति शुक्रवार नमाज की इजाजत भी देती है और जिसका मंदिर है, उस समुदाय को वर्ष में सिर्फ एक बार वसंत पंचमी को पूजा का अधिकार मिलता है।
है न हैरतअंगेज, रंजभरा व एकतरफा फैसला? जो जिद पर थे, वे खुश होते रहे, लेकिन नतीजा अब सबके सामने है। ज्यादा देर तक सत्य छिपाया नहीं जा सकता। भगवान के दर पर देर है, अंधेर नहीं। वैसे ही न्यायालय की चौखट पर देर है, पर मुकम्मल न्याय है।
न्याय की देवी की बंद आंखों ने भी माना कि भोजशाला एक सनातन धर्म का मंदिर है। यहां मस्जिद, मंदिर के भग्नावशेष पर तामीर की गई। अब जुमे की नमाज अलविदा कर दी गई और पूजन-अर्चन-वंदन शुरू हो गया है।
अलसुबह से भोजशाला में भक्तों की कतारें इस बात की गवाह हैं कि सहिष्णुता का प्रतीक सनातन धर्म अपने मानबिंदुओं की पुनर्स्थापना के लिए न कभी हारता है, न थकता है और न पीछे हटता है।
50 साल के संघर्ष, आस्था की जीत हुई। सत्य की जीत हुई। सनातन की जीत हुई। सत्य-सनातन धर्म की जीत हुई। अब खाली हो गए हैं सब रास्ते, भोजशाला के वास्ते।
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