मंत्रीजी को लगा ‘अंतर्वस्त्र’ खरीदी का अनोखा शौक!
KHULASA FIRST
संवाददाता

महेश दीक्षित 98935-66422 खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
मप्र सरकार के एक मंत्रीजी इन दिनों अपने एक अजीबोगरीब शौक को लेकर सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बने हुए हैं। मंत्रीजी का यह शौक भी कुछ ऐसा है कि सुनने वाले भी हैरान रह जाएं। दरअसल, मंत्रीजी हर महीने भोपाल से दिल्ली की दौड़ लगाते हैं।
वहां बड़े नेताओं और अपने सियासी आकाओं के दरबार में हाजिरी लगाने के बाद मंत्रीजी एक खास दुकान का रुख करना नहीं भूलते। बताते हैं कि मंत्रीजी को महंगे अंतर्वस्त्र (अंडर गारमेंट्स) खरीदने का कुछ ऐसा चस्का लगा है कि हर महीने इस शौक पर हजारों रुपये खर्च कर डालते हैं।
अब यह शौक उन्हें कब, क्यों और कैसे लगा, इतने सारे अंतर्वस्त्रों का उपयोग कहां करते हैं और इसकी खरीदारी में उन्हें ऐसा कौन-सा सुकून मिलता है? यह तो मंत्रीजी ही बेहतर बता सकते हैं। फिलहाल, मंत्रीजी के अनोखे शौक की सियासी गलियारों में जमकर चर्चा हो रही है।
शाह के छह घंटे का रहस्य क्या है?
पिछले दिनों भोपाल में गोपालक सम्मेलन के बाद अमित शाह के दोपहर बाद के सभी तय कार्यक्रम अचानक टाल दिए गए। करुणा धाम मंदिर का दौरा रद्द हुआ, प्रेस वार्ता नहीं हुई और पश्चिमी बायपास का भूमिपूजन भी आगे बढ़ा दिया गया।
लेकिन कार्यक्रम टालने के बावजूद शाह करीब छह घंटे भोपाल में ही रहे और फिर तय समय पर दिल्ली रवाना हुए। आखिर इन छह घंटों में ऐसा क्या हुआ? जब सार्वजनिक कार्यक्रम नहीं थे, तो शाह भोपाल में क्यों रुके? क्या बंद कमरे में कोई अहम बैठक चली? क्या किसी खास मुलाकात ने कार्यक्रम का पूरा गणित बदल दिया?
या फिर कोई ऐसा सियासी मसला था, जिस पर तत्काल मंथन जरूरी था? नारदजी कहते हैं कि छह घंटे का यह सन्नाटा बहुत कुछ कह रहा है। अब सवाल कार्यक्रमों के टलने का नहीं, उन छह घंटों में हुई ‘कहानी’ का है।
श्रीमंत से भाजपा में परहेज
श्रीमंत भले ही इस मुगालते में हों कि भाजपा में अब उनकी तूती बोलने लगी है और वे पार्टी में सर्वमान्य हो चुके हैं, लेकिन ग्वालियर की सियासी तस्वीर इस दावे पर सवाल खड़े कर रही है। पार्टी में पद, प्रतिष्ठा और प्रभाव भले ही हासिल हो गया हो, मगर भाजपाइयों के दिलों में जगह बनाने की कहानी अभी अधूरी नजर आती है।
ताजा वाक्या ग्वालियर किले पर देखने को मिला। श्रीमंत ने अपने स्वर्गीय पिता माधवराव की स्मृति में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया। स्वाभाविक रूप से श्रीमंत के समर्थक और निष्ठावान दरबारी बड़ी संख्या में पहुंचे, लेकिन भाजपा के प्रमुख नेताओं और पदाधिकारियों की गैरमौजूदगी ने सियासी चर्चाओं को हवा दे दी।
यही नहीं भाजपा मुख्यालय ने भी जनसंघ के संस्थापकों में शामिल रहे स्वर्गीय माधवराव को याद करने की जरूरत महसूस नहीं की। नारदजी कहते हैं- भाजपा में पद मिल सकता है, मंच मिल सकता है, सत्ता मिल सकती है... लेकिन भरोसा मांगने से नहीं, समय के साथ कमाना पड़ता है। फिलहाल ग्वालियर किले से जो संदेश निकला, उसमें श्रद्धांजलि से ज्यादा चर्चा श्रीमंत से भाजपा में परहेज की हो रही है।
कांग्रेस में भाजपा के स्लीपर सेल!
मप्र कांग्रेस में इन दिनों भाजपा की कथित ‘स्लीपर सेल’ की खूब चर्चा है। चर्चा यह भी है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी के लगातार मप्र दौरों से इस ‘स्लीपर सेल’ में बेचैनी बढ़ गई है। वजह भी दिलचस्प बताई जा रही है। कहा जा रहा है कि राहुल गांधी की नजर अब उन नेताओं पर है, जो कांग्रेस के लिए ‘विषधर’ साबित हो रहे हैं या यूं कहें कि जिनकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं पार्टी पर भारी पड़ती रही हैं।
बताते हैं कि ऐसे नेताओं को राहुल गांधी के आसपास फटकने से लेकर उनके दाएं-बाएं खड़े होने तक से परहेज करने की हिदायत है। हाईकमान तक पहुंची रिपोर्टों में भी इन नेताओं की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि जब तक पार्टी में भाजपा के ये ‘स्लीपर सेल’ सक्रिय हैं, 2028 में भाजपा को हराना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। नारदजी बता दें कि, कभी भी इनकी ‘कांग्रेस से मुक्त’ किया जा सकती है!
आंदोलित भाजपा मुख्यालय के कर्मचारी
भाजपा मुख्यालय में इन दिनों वर्षों से सेवाएं दे रहे कर्मचारियों का असंतोष चर्चा का विषय बना हुआ है। वजह है-सालाना वेतन वृद्धि पर विराम और कर्मचारियों के रोजमर्रा के कामकाज में बढ़ती रोक-टोक। कर्मचारियों की नाराजगी का असर अब मुख्यालय के माहौल और कामकाज पर भी नजर आने लगा है।
नाराजगी की वजह मुख्यालय का प्रबंधन संभाल रहे ‘भाईसाब’ की कार्यशैली को माना जा रहा है। भाईसाब चाहते हैं कि, कर्मचारी उनके नियम-कायदों के मुताबिक हिलें-डुलें और चलें। बात यहां तक पहुंच गई है कि चाय, नाश्ते और भोजन तक का हिसाब पूछा जा रहा है। नारदजी बता दें कि कर्मचारियों के असंतोष के स्वर पार्टी नेतृत्व तक पहुंच चुके हैं। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि कहानी का पटाक्षेप कैसे होता है?
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