देवों के कोषाध्यक्ष की ‘अदृश्य’ नगरी: जहां आज भी सुरक्षित है कुबेर का वैभव
KHULASA FIRST
संवाददाता

बद्रीनाथ से 12 किमी ऊपर, हिमालय की दुर्गम गोद में स्थित ‘अलकापुरी’जहां से गंगा का अस्तित्व शुरू होता है और कालिदास की कल्पना समाप्त
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
हर साल जब बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलते हैं, तो अलकनंदा की घाटी ‘जय बद्री विशाल’ के जयघोष से जीवंत हो उठती है। श्रद्धालु तप्त कुंड में आस्था की डुबकी लगाते हैं, माणा गांव में भारत की अंतिम सीमा देखते हैं, वसुधारा के शीतल जल को स्पर्श करते हैं और एक संतुष्ट मन लेकर लौट आते हैं, लेकिन अधिकांश यात्रियों की यात्रा वहीं समाप्त हो जाती है, जहां से असल रहस्य की शुरुआत होती है।
माणा से आगे पक्की सड़कें जवाब दे देती हैं और पगडंडियां ग्लेशियरों की सफेदी में विलीन होने लगती हैं, वहां से 12 किलोमीटर की एक एकाकी और रूहानी चढ़ाई पर स्थित है- अल्कापुरी।
यह केवल एक हिमनद या ग्लेशियर नहीं, बल्कि पुराणों और महाकाव्यों में दर्ज वह ‘स्वर्ण नगरी’ है, जिसे आधुनिक युग ने लगभग विस्मृत कर दिया है।
कालिदास का ‘मेघदूत’ और वह शाश्वत नगरी... संस्कृत साहित्य के महाकवि कालिदास ने जब ‘मेघदूत’ की रचना की, तो उन्होंने अल्कापुरी का ऐसा वर्णन किया जिसे पढ़कर कल्पना और यथार्थ की रेखाएं धुंधली हो जाती हैं।
एक विरही यक्ष अपने संदेशवाहक बादल से कहता है कि उसे कैलाश की गोद में बसी उस नगरी में जाना है, जहां के महलों की चमक तारों को मात देती है। कालिदास के शब्दों में, अलकापुरी वह स्थान है जहां कभी पतझड़ नहीं आता, जहां के कल्पवृक्ष मनचाही मुराद पूरी करते हैं और जहां गंधर्वों का दिव्य संगीत हवाओं में तैरता है।
सवाल यह उठता है कि क्या वह केवल एक कवि की कल्पना थी। भूगोल गवाह है कि उस अलौकिक नगरी का नाम ‘अलका’ था और उसके चरणों को पखारने वाली नदी ‘अलकनंदा’ आज भी साक्षात प्रवाहित हो रही है।
सुमेरु का भूगोल व गंगा का अवतरण... पौराणिक ग्रंथों और आधुनिक भूगोल का मेल यहां अचरज में डाल देता है। स्कंद पुराण के अनुसार, जब मां गंगा शिव की जटाओं से मुक्त होकर धरती पर उतरीं, तो वे नारायण पर्वत (प्राचीन सुमेरु) से टकराकर सात धाराओं में बंट गईं।
उन्हीं में से एक प्रमुख धारा ‘अलकनंदा’ है। पुराणों ने जिस स्थान को गंगा के सात धाराओं में विभक्त होने का केंद्र बताया, वह स्थान कुबेर की राजधानी अल्कापुरी ही थी।
आज भी नारायण पर्वत की विशाल हिमाच्छादित चोटियां उसी स्थान पर खड़ी हैं, जहां हजारों साल पहले ऋषि-मुनियों ने उन्हें अपनी दृष्टि से देखा था।
गंगा का वास्तविक उद्गम...हम बचपन से सुनते आए हैं कि गंगा गंगोत्री (गोमुख) से निकलती हैं। यह धार्मिक रूप से सत्य है, क्योंकि राजा भगीरथ की तपस्या से अवतरित ‘भागीरथी’ का मूल वहीं हैं, लेकिन जल-विज्ञान के ठोस मापदंडों पर गौर करें, तो गंगा की मुख्य धारा अलकनंदा है।
इसकी लंबाई और जलराशि भागीरथी से कहीं अधिक है। इस अलकनंदा का जन्म होता है अल्कापुरी हिमनद से। इसका अर्थ यह है कि हरिद्वार या ऋषिकेश में आप जिस गंगाजल से पूर्वजों का तर्पण करते हैं, उसका एक बड़ा हिस्सा उसी रहस्यमयी नगरी की बर्फीली गुफाओं से छनकर आता है, जहां कभी देवताओं का कोष सुरक्षित था।
अलकापुरी को समझने के लिए उसके अधिपति कुबेर को समझना होगा। वे धन के अधिष्ठाता और देवताओं के वित्त मंत्री हैं। उनके पास ‘पद्म, महापद्म, शंख, मकर’ जैसी नौ अमर निधियां हैं। मान्यता है कि अल्कापुरी का निर्माण स्वयं देव-शिल्पी विश्वकर्मा ने किया था।
यहां रहने वाले ‘यक्ष’ प्रकृति और जल के रक्षक थे। महाभारत में जिस यक्ष ने युधिष्ठिर से धर्म के गूढ़ प्रश्न पूछे थे, वह इसी अल्कापुरी की समृद्ध परंपरा का प्रतिनिधि था।
गंधर्व और अप्सराओं के विहार का यह केंद्र आज भी एक ऐसी ऊर्जा का अनुभव कराता है, जिसे केवल वही महसूस कर सकता है जो शून्य से नीचे के तापमान में भी यहां तक पहुंचने का साहस करे।
बर्फ में सोई एक सभ्यता...आज अलकापुरी बर्फ की चादर ओढ़े सोई हुई है। बद्रीनाथ आने वाले लाखों यात्रियों में से मुश्किल से कुछ सौ लोग ही इस कठिन मार्ग पर साहस जुटा पाते हैं।
अधिकांश लोग इस बात से अनभिज्ञ रह जाते हैं कि जिस अलकनंदा के तट पर वे प्रार्थना कर रहे हैं, उसका उद्गम किसी साधारण पहाड़ से नहीं, बल्कि उस खोई हुई सभ्यता से हुआ है जो कभी स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का सेतु थी।
अलकापुरी आज भी हमें याद दिलाती है कि हिमालय केवल पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि हमारे पुराणों का जीवित दस्तावेज है।
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