नीलधारा के पास गुप्त पहाड़ी, जहां माता सीता ने त्यागे थे राजसी वैभव
KHULASA FIRST
संवाददाता

अयोध्या से जाने के बाद कहां रुकी थीं सिया, हरिद्वार की गुप्त कंदरा बनी तपोभूमि, विल्व पर्वत के पीछे स्वयंभू महादेव, जहां लक्ष्मण जी को मिली थी पाप से मुक्ति
रामायण काल का अनसुना कोना, वैराग्य की सिद्ध भूमि, चार धाम यात्रा की शुरुआत से पहले मन को असीम शांति देने वाला गुप्त तीर्थ
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
चारधाम यात्रा का शंखनाद होते ही देवभूमि उत्तराखंड का कण-कण ‘बम-बम भोले’ और ‘जय बद्रीविशाल’ के जयकारों से गूंज उठता है। देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालु ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट की आरती, लक्ष्मण झूला की ऊंचाई या हरिद्वार के हर-की-पौड़ी की भीड़ का हिस्सा बनते हैं, लेकिन इन विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक केंद्रों की चकाचौंध और भारी भीड़ से महज कुछ ही दूरी पर इतिहास, पुराण और अध्यात्म का एक ऐसा शांत कोना भी है, जिसके बारे में आम तीर्थयात्री अनभिज्ञ रह जाते हैं।
गंगा की कलकल बहती नीलधारा के समीप, विल्व पर्वत की तलहटी में छिपा ‘विल्केश्वर महादेव’ और माता सीता की तपोभूमि का यह क्षेत्र आज भी उस त्रेतायुगीन वैराग्य और इतिहास को समेटे हुए है, जो सीधे रामायण काल से जुड़ता है।
माता सीता का एकांतवास... पौराणिक आख्यानों और स्थानीय श्रुतियों के अनुसार, लंका विजय के बाद जब भगवान श्री राम अयोध्या के राजा बने, तो लोक-निंदा के कारण माता सीता को पुनः वनवास झेलना पड़ा।
राजमहल के ऐश्वर्य को पीछे छोड़ जब माता सीता इस दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में पहुंचीं, तो उन्होंने विल्व पर्वत की इस शांत कंदरा (गुफा) को अपनी तपस्थली बनाया। मान्यता है कि लोक-निंदा से व्यथित और मानसिक शांति की खोज में माता सीता ने इसी स्थान पर घोर तपस्या की थी।
यहां के प्राचीन पेड़ों और पत्थरों के बीच आज भी एक ऐसी रहस्यमयी शांति महसूस की जा सकती है, जो मन को भीतर तक झकझोर देती है। मुख्यधारा के पर्यटन से दूर होने के कारण यह स्थान आज भी अपने उसी प्राचीन, एकांत और नैसर्गिक स्वरूप में जीवित है, जैसा शायद सदियों पहले रहा होगा।
‘लक्ष्मण सिद्ध’-भाई की आज्ञा और ब्रह्महत्या के पश्चाताप की भूमि... इस गुप्त तीर्थ का महत्व केवल माता सीता के एकांतवास तक ही सीमित नहीं है। विल्केश्वर महादेव के समीप ही ‘लक्ष्मण सिद्ध’ स्थान भी मौजूद है, जिसका अपना एक गंभीर इतिहास है।
रावण का वध करने के बाद, माता सीता को वन छोड़ने की भारी जिम्मेदारी लक्ष्मण जी को ही निभानी पड़ी थी। एक तरफ भाई और राजा की आज्ञा का पालन, तो दूसरी तरफ एक निर्दोष माता को वन में छोड़ने का भारी आत्मग्लानि भाव।
इसके अलावा, रावण एक प्रकांड विद्वान ब्राह्मण था, जिसके वध के कारण श्रीराम और लक्ष्मण पर ‘ब्रह्महत्या’ का दोष लगा था। शास्त्रों के अनुसार, लक्ष्मण जी ने अपनी इसी आत्मग्लानि और ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति के लिए इस पहाड़ी के गुप्त कोनों में बैठकर वर्षों तक कठोर तपस्या और पश्चाताप किया था। यही कारण है कि इस पूरे परिक्षेत्र को एक परम सिद्ध भूमि माना जाता है, जहां ध्यान लगाने मात्र से मानसिक संताप दूर हो जाते हैं।
बिल्व पत्र का अनोखा जंगल और गुफानुमा महादेव...बिल्केश्वर महादेव मंदिर का स्थापत्य बेहद प्राचीन और विस्मयकारी है। यह मंदिर विल्व (बेलपत्र) के पेड़ों के घने झुरमुट के बीच एक छोटी गुफा के रूप में स्थित है।
स्थानीय पुजारियों के अनुसार, यहां स्थापित शिवलिंग स्वयंभू है। ऐसा माना जाता है कि माता सीता स्वयं यहां बिल्व पत्र की टहनियों से घिरे इस शिवलिंग की पूजा-अर्चना किया करती थीं। आज भी यहां आने वाले साधक इस स्थान की ऊर्जा को अद्भुत बताते हैं।
चार धाम यात्रियों के लिए क्यों है यह ‘मस्ट विजिट’ स्पॉट?...ज्यादातर चार धाम तीर्थयात्री अपनी पहाड़ी यात्रा शुरू करने से पहले हरिद्वार या ऋषिकेश में एक दिन का विश्राम करते हैं, ताकि वे पहाड़ों के मौसम और वातावरण के अनुकूल हो सकें।
इस एक दिन के ठहराव के दौरान, वे अक्सर उन्हीं चुनिंदा जगहों पर जाते हैं जहां भारी भीड़ और ट्रैफिक जाम का सामना करना पड़ता है। ऐसे में ऋषिकेश-हरिद्वार मार्ग पर चंडी घाट के समीप स्थित यह गुप्त पहाड़ी स्थल यात्रियों के लिए एक वरदान की तरह है।
यहां न केवल पार्किंग और पहुंच की सुगमता है, बल्कि यात्रा शुरू करने से पहले मानसिक शांति और आत्मिक शक्ति संचय करने के लिए इससे बेहतर कोई और आध्यात्मिक स्थल नहीं हो सकता।
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