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ट्राइबल जेन-जी की बढ़ती ताकत: आधुनिकता और राजनीति के बीच प्रकृति; संस्कृति और रोजगार के संकट में वनवासी

Khulasa First

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संवाददाता

09 अगस्त 2026, 1:02 pm
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ट्राइबल जेन-जी की बढ़ती ताकत

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्य प्रदेश समेत देश के आदिवासी (इस शब्द को संघ ने वनवासी और फिर जनजातीय कर दिया है) बहुल क्षेत्रों में आज एक नई पीढ़ी करवट ले रही है। यह पीढ़ी शिक्षित, मुखर और अपने अधिकारों को लेकर पहले से कहीं ज्यादा सजग है, लेकिन इसी चेतना के समांतर एक गहरी उलझन भी खड़ी है-आदिवासी युवा यह तय नहीं कर पा रहा है कि वह किस दिशा में बढ़े, किस पर भरोसा करे और अपनी अस्मिता को किस रूप में जीवित रखे।

प्रकृति ही उसका सब कुछ है। ईश्वर से लेकर संस्कृति, विचार और जीवन दर्शन के साथ आजीविका और अस्तित्व प्रकृति पर निर्भर है। सरकारों द्वारा आधुनिक विकास से वनवासियों के प्राकृतिक संसाधन खत्म किए जा रहे हैं।

इस संकट के बीच उस पर विभिन्न विचारधाराओं को थोपने वाले राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक संगठन उसके लिए भटकाओ पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं और ऐसा आजादी के पहले से होता आ रहा है, जो अब और ज्यादा दबाव-प्रभाव के साथ नजर आ रहा है। इसका कारण सामाजिक, राजनीति, वैचारिक, धार्मिक आदि संगठन हैं, जो पुरानी थ्योरी के साथ भ्रम पैदा करवाते हैं।

यह सब वनवासियों के हितैषी और सबसे बड़े पैरोकार बनाने का दावा करते हैं, लेकिन वनवासियों के आश्रय स्थल प्रकृति और उनके प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए कुछ संगठनों को छोड़ दें तो कोई भी आगे नहीं आता।

इस समय वनवासी समाज को राजनीति, धर्म और संस्कृति के टूल्स के रूप में इस्तेमाल करने के प्रयास हैं और इसके लिए ट्राइबल यूथ को हर कोई अपना टूल बनाना चाहता है। इसके लिए सरकार सामाजिक, धार्मिक संगठन और राजनीतिक दल तरह-तरह के प्रयोग कर रहे हैं।

यह जानते हुए कि युवाओं के समक्ष इस समय रोजगार का मुद्दा और प्राकृतिक संरक्षण का विषय अहम है। सवाल केवल रोजगार या शिक्षा का नहीं रह गया है। यह पहचान, आस्था और अस्तित्व के टकराव का सवाल बन चुका है।

आज का आदिवासी युवा एक साथ दो दिशाओं में खिंच रहा है। एक तरफ शहरी जीवनशैली, सोशल मीडिया और उच्च शिक्षा की चमक है तो दूसरी तरफ अपनी भाषा, प्रकृति पूजा और सामुदायिक परंपराओं से जुड़े रहने का दबाव। यह असमंजस अकेले सांस्कृतिक नहीं, मनोवैज्ञानिक भी है।

अपनी जड़ों से कटने का डर और मुख्यधारा में पूरी तरह स्वीकार न हो पाने की बेचैनी, दोनों एक साथ युवाओं को घेरे हुए हैं। यह मुख्य धारा जो वर्तमान आधुनिक परिवेश की है, क्या यह मुख्य धारा वनवासी समाज के लिए उपयुक्त है, क्योंकि इस मुख्य धारा के कारण ही पूरी पृथ्वी पर क्लाइमेट चेंज, जिसके कारक ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण, अनियंत्रित उपभोग, उपभोक्तावाद, बढ़ती जनसंख्या और इंसान का लालच है, इसकी मुख्य धारा नकार दी गई है। इसलिए वनवासियों को मुख्य धारा तय करने देना चाहिए और वही धारा पूरी दुनिया के लिए अपना अस्तित्व बचाने वाली होगी।

पारंपरिक आजीविका के सिकुड़ने, ग्रामीण लघु उद्योग और सतत या सस्टेनेबल औद्योगिक विकल्पों की अनुपस्थिति में यह भटकाव और गहरा हो जाता है। बिना ठोस कौशल के शॉर्ट कट सफलता की तलाश और असफल होने पर हताशा यह चक्र मंडला, डिंडोरी, झाबुआ, बड़वानी और शहडोल जैसे जिलों में बार-बार दोहराया जा रहा प्रतीत होता है।

डिग्री हाथ में, दिशा गायब... राज्य के विश्वविद्यालयों में जनजातीय अध्ययन जैसे पाठ्यक्रम अकादमिक दृष्टि से समृद्ध जरूर हैं, लेकिन इनका रोजगार बाजार से कोई ठोस जुड़ाव नहीं दिखता।

नतीजा यह है कि माता-पिता कर्ज लेकर या जमीन-मवेशी बेचकर बच्चों को पढ़ाते हैं और युवा डिग्री लेकर भी नौकरी के बाजार में खाली हाथ खड़े रह जाते हैं। सरकारी नौकरियों पर अत्यधिक निर्भरता और स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक आजीविका केंद्रों की कमी इस संकट को और बढ़ा देती है।

राजनीतिक-सामाजिक संगठनों की होड़ सेवा या स्वार्थ?
इसी खालीपन में विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठन आदिवासी युवाओं तक पहुंच बना रहे हैं। कोई अधिकारों और अस्मिता की भाषा में, कोई सांस्कृतिक-धार्मिक समन्वय की भाषा में। इनमें सबसे चर्चित उदाहरण है आरएसएस से जुड़े वनवासी कल्याण आश्रम और जनजाति सुरक्षा मंच का कार्य, जो सेवा (शिक्षा, स्वास्थ्य, छात्रावास) के माध्यम से आदिवासी समाज को ‘वनवासी’ पहचान और व्यापक सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी ढांचे से जोड़ने का प्रयास करता रहा है।

इसके समर्थक इसे दुर्गम क्षेत्रों तक शिक्षा और स्वास्थ्य पहुंचाने वाला मॉडल बताते हैं, जबकि आलोचक इसे आदिवासी समाज के स्वतंत्र, प्रकृति केंद्रित दर्शन के क्षरण और सामाजिक ध्रुवीकरण के खतरे के रूप में देखते हैं।

दूसरी ओर जयस जैसे युवा केंद्रित संगठनों के उभार ने आदिवासी राजनीतिक सक्रियता को नई भाषा दी है, जिसने मुख्यधारा की पार्टियों को भी आदिवासी मतदाता को गंभीरता से लेने पर मजबूर किया है।

यहीं असली खतरा छिपा है: जब यह राजनीतिक-सामाजिक सक्रियता समाज के दीर्घकालिक हित से ज्यादा केवल चुनावी गोलबंदी या सत्ता-साझेदारी का औजार बनकर रह जाती है तो युवा पीढ़ी की ऊर्जा भटक जाती है। संगठन उन्हें विचारक या नेता के रूप में गढ़ने के बजाय केवल भीड़ के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

आगे की राह: भटकाव नहीं, संतुलन
आदिवासी युवाओं के सामने चुनौती स्पष्ट है आधुनिकता को अपनाना, पर अपनी भाषा, इतिहास और प्रकृति केंद्रित जीवन-दर्शन को त्यागे बिना। अधिकारों की लड़ाई भावना से नहीं, बल्कि पांचवीं-छठी अनुसूची, पेसा और वन अधिकार अधिनियम जैसे संवैधानिक औजारों की गहरी समझ से लड़ना होगी।

पाठ्यक्रमों को उद्यमिता, वनोपज प्रबंधन और डिजिटल कौशल से जोड़कर रोजगार योग्य बनाना होगा, ताकि डिग्री केवल कागज न रहकर आजीविका का जरिया बने। सबसे जरूरी यह है कि युवा पीढ़ी किसी भी संगठन चाहे वह सांस्कृतिक हो, धार्मिक या राजनीतिक, का औजार बनने से बचे और अपने फैसले अपनी समझ, इतिहास और अपने समुदाय के दीर्घकालिक हित को केंद्र में रखकर ले।

तभी यह पीढ़ी भटकाव से बचकर एक सशक्त, आत्मनिर्भर और सांस्कृतिक रूप से जड़ों से जुड़ी अगुआ पीढ़ी के रूप में उभर सकेगी।

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