पर्यटन की भेंट चढ़ा शास्त्रों का महा-मार्ग: एक क्षेत्रीय यात्रा बन गई असली चार धाम
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
ज्येष्ठ की तपती दोपहरी में जब उत्तराखंड के ऊंचे शिखरों पर बसे केदारनाथ और बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं, तो पूरा देश ‘चार धाम’ की रट लगाने लगता है।
सरकारी विज्ञापनों से लेकर ट्रवल एजेंटों के ब्रोशर तक, यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ को ‘चार धाम’ के रूप में स्थापित कर चुके हैं, लेकिन, यदि हम अपनी सनातनी जड़ों और प्राचीन पांडुलिपियों की ओर लौटें, तो एक बड़ा विरोधाभास सामने आता है।
जिसे आज हम ‘चार धाम’ मानकर पूज रहे हैं, वह वास्तव में आदि गुरु शंकराचार्य और स्कंद पुराण द्वारा रचित उस महान आध्यात्मिक परिक्रमा का केवल एक चौथाई हिस्सा है, जिसे ‘छोटा चार धाम’ कहा गया था।
भ्रम और आस्था के बीच ‘चार धाम’, क्या हम सदियों पुराने आध्यात्मिक मानचित्र को भूल गए, शंकराचार्य का वह ‘अधूरा’ स्वप्न, भूगोल की सुगमता के लिए बदल दिया धर्म का मानचित्र, हिमालय की ऊंचाइयां बनाम सात समंदर की सीमाएं, दो ‘चार धाम’ यात्राओं के बीच उलझी नई पीढ़ी की आस्था, स्कंद पुराण के पन्नों से गायब हैं यमुनोत्री-गंगोत्री, उन चार दिशाओं का सच जहां आज भी बसते हैं ‘ आदि देव’।
स्कंद पुराण की गवाही- दिशाओं का गठबंधन... हिंदू धर्म के सबसे विस्तृत ग्रंथ ‘स्कंद पुराण’ में स्पष्ट उल्लेख है कि भारतवर्ष की आध्यात्मिक सुरक्षा और एकता के लिए चार दिशाओं में चार धाम स्थापित हैं।
यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सुविचारित खगोलीय और भौगोलिक योजना थी। उत्तर में बद्रीनाथ: जहां विष्णु तपस्यारत हैं। दक्षिण में रामेश्वरम: जहां मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने महादेव की स्थापना की।
पूर्व में जगन्नाथ पुरी: जहां भगवान कृष्ण अपने भाई-बहन के साथ विराजते हैं और पश्चिम में द्वारका: जो योगेश्वर कृष्ण की कर्मभूमि और समुद्र के आगोश में समाई नगरी है।
इन चारों धामों की यात्रा का अर्थ केवल पुण्य कमाना नहीं था, बल्कि यह पूरे भारत को एक सूत्र मं पिरोने की ‘सांस्कृतिक पदयात्रा’ थी। एक सनातनी जब इन चार कोनों को छूता था, तो वह देश की भाषाई और क्षेत्रीय विविधता को आत्मसात करता था।
शंकराचार्य का ‘अदृश्य भारत’ और राष्ट्र-चेतना... आठवीं शताब्दी में जब आदि गुरु शंकराचार्य ने केरल से पदयात्रा शुरू की, तब देश राजनीतिक रूप से टुकड़ों में बंटा था। शंकराचार्य ने धर्म को राजनीति से बड़ा बनाया।
उन्होंने इन चार धामों को एक अनिवार्य तीर्थ यात्रा के रूप में पुनर्जीवित किया। उनकी दृष्टि यह थी कि एक तमिल भाषी रामेश्वरम से चलकर जब बद्रीनाथ पहुंचेगा, तो वह रास्ते में पड़ने वाले हर राज्य की संस्कृति को समझेगा। यह धर्म के माध्यम से ‘अखंड भारत’ की परिकल्पना थी।
उत्तराखंड के ‘छोटा चार धाम’ का उदय...अब प्रश्न उठता है कि फिर उत्तराखंड के चार तीर्थों को ‘चार धाम’ क्यों कहा जाने लगा? ऐतिहासिक रूप से, हिमालय की गोद में बसे ये चार स्थान यमुनोत्री (यमुना का उद्गम), गंगोत्री (गंगा का उद्गम), केदारनाथ (ज्योतिर्लिंग) और बद्रीनाथ (विष्णु धाम) हमेशा से अत्यंत पवित्र रहे हैं।
लेकिन मूलतः इन्हें ‘छोटा चार धाम’ या ‘हिमालय के चार धाम’ कहा जाता था। 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, विशेषकर उत्तराखंड राज्य बनने के बाद, पर्यटन और सुगमता ने इस परिभाषा को बदल दिया।
पूरे भारत की परिक्रमा करने में महीनों लगते थे, जबकि उत्तराखंड के इन चारों स्थानों की यात्रा 10-12 दिनों में संभव हो गई। धीरे-धीरे ‘छोटा’ शब्द विज्ञापन की चकाचौंध में खो गया और ‘चार धाम’ शब्द इन चार हिमालयी तीर्थों के लिए रूढ़ हो गया।
आधा सत्य, पूरी आस्था... यह सच है कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में पूरे देश की परिक्रमा कठिन है, इसलिए हिमालय की यात्रा एक सुलभ विकल्प बन गई, लेकिन एक जागरूक सनातनी के लिए यह जानना आवश्यक है कि भारत के चार कोनों पर स्थित वे मूल धाम आज भी हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।
अगली बार जब आप चार धाम का नाम लें, तो याद रखिएगा कि रामेश्वरम की रेत, पुरी का भात और द्वारका की लहरें भी उसी श्रद्धा का हिस्सा हैं, जो बद्रीनाथ की बर्फ में छिपी है।
पुराणों का मत... स्कंद पुराण के अनुसार, चार धाम चार युगों का प्रतिनिधित्व करते हैं (सतयुग-बद्रीनाथ, त्रेता-रामेश्वरम, द्वापर-द्वारका और कलयुग-पुरी)। शंकराचार्य ने देश के चार कोनों पर चार मठों (ज्योतिर्मठ, श्रृंगेरी, गोवर्धन और शारदा मठ) की स्थापना की, जो चार धामों से जुड़े हैं।
आधुनिक पर्यटन ने ‘छोटा चार धाम’ को मुख्यधारा में ला दिया है, जिससे मूल चार धामों का भौगोलिक महत्व नई पीढ़ी की स्मृति से धुंधला पड़ता जा रहा है।
बद्रीनाथ- जो दोनों का साक्षी है
शास्त्रों की बारीकियों को समझने वाले जानते हैं कि बद्रीनाथ ही वह एकमात्र सेतु है, जो दोनों सूचियों में समान रूप से विद्यमान है। केदारनाथ, जो आज इस यात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण है, वह मूल चार धामों में नहीं बल्कि 12 ज्योतिर्लिंगों में श्रेष्ठ है। गंगोत्री और यमुनोत्री नदियों के प्रति हमारी कृतज्ञता के प्रतीक हैं।
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