आरटीओ और टेक्निकल मैनेजर की सरपरस्ती में नियुक्तियों का खेल: बस स्टैंडों पर उम्रदराजों का कब्जा; युवाओं के हक पर डाका या सिस्टम की मिलीभगत?
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर के प्रमुख बस स्टैंडों की व्यवस्था अब नियमों से नहीं, बल्कि रसूख और सौदेबाजी से संचालित हो रही है। कलेक्टर की अध्यक्षता वाली बस स्टैंड निगरानी समिति और आरटीओ की सचिव भूमिका के बावजूद सरवटे और आईएसबीटी बस स्टैंड पर भ्रष्टाचार का ऐसा जाल बुना गया है, जहां सरकारी नियमों की धज्जियां खुलेआम उड़ाई जा रही हैं।
नगर निगम में मास्टर कर्मी के नाम पर उन लोगों को मासिक वेतन बांटा जा रहा है, जिनकी उम्र काम करने की नहीं बल्कि आराम करने की है। तकनीकी प्रबंधक राहुल श्रोती जैसे अधिकारियों की देखरेख में इन नियुक्तियों को न केवल संरक्षण मिल रहा है, बल्कि शिकायतों के उठते ही टेबल के नीचे होने वाली सौदेबाजी से मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है।
प्रशासन की यह अनदेखी सीधे तौर पर योग्य युवाओं के रोजगार के अवसर छीन रही है।
2028 के आगामी सिंहस्थ मेले को लेकर यातायात व्यवस्था मजबूत करने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि व्यवस्था की कमान उन बुजुर्गों के हाथ में है जो शारीरिक रूप से इस भार को उठाने में सक्षम नहीं हैं।
रोडवेज के ये भूतपूर्व कर्मचारी पिछले डेढ़ दशक से व्यवस्था पर कुंडली मारकर बैठे हैं और नगर निगम की तिजोरी से वेतन वसूल रहे हैं। यह महज एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित वित्तीय अनियमितता है, जिसमें निगरानी समिति के रसूखदार नाम भी संदेह के घेरे में हैं।
जब तक इन अपात्र कर्मचारियों को हटाकर नई पौध को मौका नहीं दिया जाता, तब तक इंदौर के बस स्टैंडों की हालत सुधरना नामुमकिन है।
व्यवस्था पर काबिज उम्रदराज कर्मचारियों का ब्योरा
सरवटे बस स्टैंड पर लंबे समय से तैनात इन कर्मियों में दिनेश पटेल (मैनेजर) 68 वर्ष और महेश सातोड़िया (मैनेजर-2) 70 वर्ष के अलावा अन्य सभी बुकिंग कर्मचारी हैं, जिनमें गजानंद पवार 82 वर्ष, देवीलाल शर्मा 75 वर्ष, पहलद शर्मा 73 वर्ष, बसंत बिरथरे 72 वर्ष, राजेंद्र शर्मा 72 वर्ष, विजय वर्मा 72 वर्ष, जयनाथ गिरी 70 वर्ष, नरेंद्र यादव 70 वर्ष, राघवेंद्र सिंह 70 वर्ष, दिलीप कदम 69 वर्ष, प्रेम मंडलोई 68 वर्ष और महेंद्र चौहान 67 वर्ष शामिल हैं। इन सभी की उम्र सेवा निवृत्ति की सीमा को बहुत पहले लांघ चुकी है, फिर भी सिस्टम की मेहरबानी इन पर लगातार बनी हुई है।
सिस्टम की अंधभक्ति का आलम तो यह है कि विगत वर्ष तत्कालीन नगर निगम कमिश्नर शिवम वर्मा और महापौर पुष्पमित्र भार्गव के हाथों महेश सातोड़िया को उत्कृष्ट सेवा के लिए पुरस्कृत तक करवा दिया गया।
जहां एक तरफ इनकी सेवानिवृत्ति और बढ़ती उम्र को लेकर शिकायतें फाइलों में दबी हुई हैं, वहीं दूसरी तरफ जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा इन्हें सम्मानित करवाना प्रशासनिक नैतिकता पर एक बड़ा तमाचा है।
सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन को इन कर्मचारियों की वास्तविक उम्र और अवैध नियुक्तियों की जानकारी नहीं है, या फिर जानबूझकर इस सिंडिकेट को फलने-फूलने का मौका दिया जा रहा है?
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