त्रेतायुग की अग्नि हिमालय के ‘गुप्त’ रहस्य-जहां भगवान शिव ने रचाया था विवाह और जहां आज भी जल रही है
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संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
उत्तराखंड की देवभूमि में चारधाम यात्रा के मुख्य पड़ाव तो जगजगत प्रसिद्ध हैं, लेकिन केदारनाथ मार्ग पर दो ऐसे स्थान स्थित हैं जिनके बिना महादेव की कथा अधूरी है। एक ओर गुप्तकाशी है, जहां भूतभावन भगवान महादेव ने स्वयं को पांडवों की नजरों से छिपा लिया था, तो दूसरी ओर त्रियुगीनारायण है, जो ब्रह्मांड के सबसे दिव्य विवाह का साक्षी बना। ये स्थान केवल धार्मिक पड़ाव नहीं, बल्कि उस युग के जीवंत प्रमाण हैं जब धरती पर देवताओं का साक्षात वास था।
त्रियुगीनारायण- वह मंडप जहां भगवान शिव और माता पार्वती ने लिए थे सात फेरे। त्रियुगीनारायण मंदिर को विवाह का तीर्थ कहा जाता है। मान्यता है कि सत्ययुग में भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह इसी स्थान पर संपन्न हुआ था। मंदिर की वास्तुकला बद्रीनाथ मंदिर से मिलती-जुलती है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी विशेषता यहाँ की अखंड धुनी है।
इस मंदिर के भीतर एक अग्निकुंड है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसमें जलने वाली अग्नि त्रेतायुग और द्वापर से लेकर आज तक अनवरत प्रज्ज्वलित है। इसी पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर शिव-पार्वती ने फेरे लिए थे। इस विवाह में भगवान विष्णु ने माता पार्वती के भाई की भूमिका निभाई थी और ब्रह्मा जी पुरोहित बने थे।
आज भी श्रद्धालु यहां से भभूत (राख) ले जाते हैं, जिसे वैवाहिक जीवन की सुख-शांति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। मंदिर परिसर में स्थित तीन कुंड-ब्रह्म कुंड, विष्णु कुंड और रुद्र कुंड उन देवताओं के स्नान के प्रतीक हैं जो इस महाविवाह में सम्मिलित हुए थे।
इन पुराणों में मिलता है उल्लेख... स्कंद पुराण के केदारखंड के अनुसार गुप्तकाशी की महत्ता काशी (वाराणसी) के ही समान है। इसे ‘उत्तर काशी’ के समतुल्य माना गया है। केदारखंड में उल्लेख है कि जब भगवान शिव पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, तब वे इसी स्थान पर ‘गुप्त’ रूप से निवास करने आए थे, जिसके कारण इस क्षेत्र का नाम गुप्तकाशी पड़ा।
यहां स्थित मणिकर्णिका कुंड के विषय में पुराणों में कहा गया है कि इसमें गंगा और यमुना की अदृश्य धाराओं का वास है, जिसमें स्नान मात्र से ही मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं।
शिव पुराण और स्कंद पुराण दोनों में ही त्रियुगीनारायण का विस्तृत वर्णन मिलता है, जहां इसे हिमवत (हिमालय) की राजधानी बताया गया है। शिव पुराण के अनुसार, माता पार्वती की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने इसी स्थान पर उनसे विवाह करना स्वीकार किया था, जिसे ‘त्रि-युगी’ इसलिए कहा गया क्योंकि यहां की पवित्र अग्नि तीन युगों (सत्ययुग, त्रेता और द्वापर) से निरंतर प्रज्ज्वलित है।
इन पुराणों में उल्लेख है कि इस दिव्य विवाह के साक्षी के रूप में भगवान विष्णु ने स्तंभ बनकर और ब्रह्मा जी ने पुरोहित बनकर विवाह संपन्न कराया था, जिससे यह स्थान वैवाहिक निष्ठा और अखंड सौभाग्य का प्रतीक बन गया।
यात्रा का आध्यात्मिक महत्व
त्रियुगीनारायण और गुप्तकाशी केवल ऐतिहासिक स्थल नहीं हैं, बल्कि ये श्रद्धालु को मुख्य यात्रा की थकान के बीच एक मानसिक स्थिरता प्रदान करते हैं। जहां त्रियुगीनारायण का अग्निकुंड हमें श्रद्धा की निरंतरता सिखाता है, वहीं गुप्तकाशी की चुप्पी ईश्वर और भक्त के बीच के उस संवाद को दर्शाती है जहां शब्द कम और भावनाएं अधिक प्रभावी होती हैं। चारधाम की यात्रा पर निकलने वाले हर यात्री के लिए इन दो स्थलों का दर्शन एक मुकम्मल आध्यात्मिक अनुभव की तरह है।
गुप्तकाशी- जहां पांडवों से छिपने के लिए महादेव बने थे ‘नंदी
केदारनाथ से लगभग 47 किलोमीटर पहले मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित है गुप्तकाशी। इसका नाम दो शब्दों से बना है: ‘गुप्त’ यानी छिपा हुआ और ‘काशी’ यानी वाराणसी के समान पवित्र। पौराणिक कथा के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद गोत्र वध के पाप से मुक्ति पाने के लिए जब पांडव भगवान शिव को खोज रहे थे, तब महादेव उनसे नाराज होकर यहां ‘गुप्त’ (अंतर्ध्यान) हो गए थे।
उन्होंने नंदी का रूप धारण कर लिया था, ताकि पांडव उन्हें पहचान न सकें। गुप्तकाशी का धार्मिक महत्व वाराणसी (काशी) के ही समान माना जाता है। यहां का ‘विश्वनाथ मंदिर’ और ‘अर्धनारीश्वर मंदिर’ वास्तुकला और आध्यात्मिकता का बेजोड़ संगम है।
मंदिर के प्रांगण में स्थित ‘मणिकर्णिका कुंड’ आस्था का मुख्य केंद्र है, जहां दो धाराओं के रूप में गंगा और यमुना का मिलन होता है। मान्यता है कि यहां के दर्शन के बिना केदारनाथ की यात्रा का फल अधूरा रहता है। यहां की शांत वादियां और प्राचीन पत्थरों से बने मंदिर आज भी उस कालखंड की शांति को महसूस कराते हैं।
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