खबर
Top News

बाबा विश्वनाथ के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है चारधाम यात्रा

KHULASA FIRST

संवाददाता

20 मई 2026, 6:48 pm
243 views
शेयर करें:
बाबा विश्वनाथ के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है चारधाम यात्रा

विशाल वर्माचारधाम यात्रा से खुलासा फर्स्ट।
उत्तरकाशी का ऐतिहासिक श्री काशी विश्वनाथ मंदिर भागीरथी (गंगा) नदी के पावन तट पर स्थित एक अत्यंत प्राचीन और सिद्ध शक्तिपीठ है, जिसे स्कंद पुराण के केदारखंड में ‘कलियुग की काशी’ (सौम्य काशी) कहकर संबोधित किया गया है।

धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब कलियुग अपने चरम पर होगा और पापों का घड़ा भर जाएगा, तब वाराणसी की मूल काशी लुप्त हो जाएगी और भगवान शिव अपने पूरे दरबार के साथ इसी हिमालयी क्षेत्र (उत्तरकाशी) में निवास करेंगे।

वर्तमान में जारी चार धाम यात्रा सीज़न के दौरान गंगोत्री धाम जाने वाले लाखों श्रद्धालु इस पावन धाम में आकर बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद ले रहे हैं। यमुनोत्री और गंगोत्री की चारधाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए उत्तरकाशी का विश्वनाथ मंदिर दर्शन करना अनिवार्य माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उत्तर की काशी कहे जाने वाले इस प्राचीन मंदिर में दर्शन किए बिना चारधाम यात्रा अधूरी मानी जाती है।

भगवान परशुराम ने की थी स्थापना
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, इस दिव्य मंदिर की स्थापना स्वयं भगवान परशुराम ने की थी। एक अन्य ऐतिहासिक शिलालेख (जो कि मंदिर प्रांगण में स्थापित शक्ति स्तंभ पर अंकित है) के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण प्राचीन काल में राजा गणेश्वर द्वारा करवाया गया था।

राजा गणेश्वर के पुत्र राजा गुह ने इस स्थान पर गहन तपस्या की थी और मंदिर परिसर में ऐतिहासिक त्रिशूल की स्थापना की थी। कालांतर में इस प्राचीन वेदी का जीर्णोद्धार वर्ष 1857 ईस्वी में टिहरी रियासत के महाराजा सुदर्शन शाह की महारानी खनेती देवी द्वारा करवाया गया।

उन्होंने कत्यूरी वास्तुकला शैली के आधार पर मंदिर को एक भव्य और आकर्षक स्वरूप दिया, जो आज भी इसके पत्थरों और नक्काशीदार लकड़ी की छतों में साफ दिखाई देता है।

दक्षिण की ओर झुका स्वयंभू शिवलिंग
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग स्वयंभू (स्वयं प्रकट) है। इस शिवलिंग की सबसे अनोखी और चमत्कारी विशेषता यह है कि इसका झुकाव दक्षिण दिशा की ओर है।

सनातन परंपरा में दक्षिण दिशा को यमराज (काल) की दिशा माना जाता है। भगवान शिव को ‘महाकाल’ कहा जाता है, जो काल के भी काल हैं। मान्यता है कि दक्षिण मुखी होने के कारण यहाँ पूजा करने वाले भक्तों की अकाल मृत्यु का भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है और उन्हें सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

शक्ति मंदिर और चमत्कारी विशाल त्रिशूल
विश्वनाथ मंदिर के ठीक सामने प्रांगण में शक्ति देवी को समर्पित एक भव्य मंदिर है। इस मंदिर का मुख्य आकर्षण यहाँ स्थापित एक विशाल और रहस्यमयी मिश्रित धातु का त्रिशूल (शक्ति स्तंभ) है, जो लगभग 26 फीट है।

संबंधित समाचार

टिप्पणियाँ

अभी कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी करें!