जनसरोकारों की अर्थी पर सियासत का 'खूनी' नाच: 'सपनों का शहर' और 'स्वच्छता का सिरमौर' के चेहरे पर लगे हैं ये पत्थर
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, हेमंत उपाध्याय।
क्या इस शहर की तासीर ऐसी ही थी, है और रहेगी। या यह बदलते दौर का इंदौर है। जहां राजनीति की रोटियां सेकने और अपने आकाओं की नजरों में चढ़ने, उन्हें खुश करने के लिए कोई भी कदम उठाने से, एक-दूसरे पर पथराव कर खून बहाने से भी कार्यकर्ता बाज नहीं आते। शनिवार को यही सब तो हुआ जब भारतीय जनता युवा मोर्चा यानी भाजयुमो कार्यकर्ताओं की कांग्रेस कार्यकर्ताओं से भिड़ंत और पत्थरबाजी हुई। केवल पत्थर ही नहीं बोतलें, टमाटर और संतरे भी इस दौरान एक-दूसरे पर फेंके गए और शहर का व्यस्त हिस्सा इस अराजकता का गवाह बना रहा, पुलिस अपने तईं प्रयास करती रही और कई बार लाचार भी रही।
घृणित राजनीति का बदनुमा दाग
यह उस प्रदर्शन का हिस्सा था जब दिल्ली में ‘एआई समिट’ में युवा कांग्रेस के अश्लील बताए जा रहे प्रदर्शन के विरोध में प्रदेश में भाजयुमो ने कांग्रेस कार्यालयों का घेराव करने का आह्वान और घोषणा की थी। एक सामान्य प्रदर्शन हिंसक झड़प में बदल गया और शहर के चेहरे पर घृणित राजनीति का बदनुमा दाग लगा गया। जाहिर है जब भाजयुमो कार्यकर्ता कांग्रेस कार्यालय गांधी भवन की ओर बढ़ रहे थे तो वहां कांग्रेस कार्यकर्ता भी पूरी तैयारी से मुस्तैद थे। मीडियाकर्मियों, पुलिसकर्मी-कार्यकर्ताओं का खून बहना, घायल होना फिर शिकायत, एफआईआर भी हुई, दोषारोपण का दौर भी चला और अभी चलेगा, लेकिन यह वाकया कई सवाल अनुत्तरित भी छोड़ गया।
शहर की उम्मीदों पर लगे पत्थर
सोचिये मालवा का यह जिंदादिल शहर जहां कभी मेल-मिलाप के किस्से हवा में तैरे करते थे, राजनीतिक रूप से मतभेद के बाद भी सहृदयता, सहयोग और आत्मीयता की मिसालें दी जाती थीं अब किस मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है। गांधी भवन के पास पथराव ने केवल इस शहर की साख को ही लहूलुहान नहीं किया, ये पत्थर उस शहर की उन उम्मीदों पर भी जाकर लगे हैं, जो भागीरथपुरा में दूषित पानी कांड में तीन दर्जन से अधिक मौतों से अभी भी नहीं उबरा है, जहां विकास की राह देखते कई प्रोजेक्ट अधूरे पड़े हैं, जहां लोगों को रोजाना बदहाल यातायात से रूबरू होना पड़कर व्यवस्था को कोसना पड़ता है और जहां आम आदमी को अपने हक के लिए धक्के खाने पर मजबूर होना पड़ता है।
ऐसी ऊर्जा कहीं और दिखाई होती
कल की घटना पर शहर के सम्मानित लोगों को कुरेदा गया तो उनका स्पष्ट कहना था कि जिस ऊर्जा के साथ दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता एक-दूसरे का सिर फोड़ने के लिए आमादा थे, काश! वही ऊर्जा शहर के बदहाल यातायात और बिगड़े हालातों को सुधारने के लिए दिखाई होती। जब गंदा और जहरीला पानी भागीरथपुरा में मौत का तांडव मचा रहा था, तब आरोप-प्रत्यारोप की झड़ी लग रही थी, दोषारोपण किए जा रहे थे, यह क्रम आज भी जारी है। इन सबके बीच मौतों के स्वास्थ्यगत कारण बताकर इतिश्री करने का क्रम भी चल ही रहा है।
यातायात के चक्रव्यूह में फंसा आम नागरिक
यातायात के जानकार शख्स का कहना है कि आज प्रदेश के इस शहर का यातायात एक ऐसा 'अभिमन्यु' बन चुका है जो हर चौराहे पर जनता को चक्रव्यूह में फंसाए रखता है। घंटों जाम में फंसा पसीने से तर-बतर आम आदमी जब इन नेताओं की हुल्लड़बाजी देखता है, तो उसका लोकतंत्र से भरोसा काफी हद तक उठ जाता है।
राजनीतिक आकाओं को खुश करने की जद्दोजहद
अफसोस! पार्टियों के इन सूरमाओं को जनता का पसीना नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक आकाओं की 'गुड बुक' में चमकने वाला अपना चेहरा दिखाई देता है। एक बुजुर्ग नेता के अनुसार यह लड़ाई विचारधारा की नहीं, बल्कि भोपाल और दिल्ली में बैठे आकाओं को अपनी 'वफादारी का प्रमाण पत्र' भेजने की एक निकृष्ट होड़ है। मेट्रो, बीआरटीएस, फ्लाईओवर से लेकर तमाम योजनाओं पर पल-पल बदलते पक्ष जगजाहिर हैं। विकास के नाम पर विरोध के स्वर भी बुलंद होते ही रहे हैं, लेकिन ज्वलंत समस्याओं से इतर पत्थरबाजी कौन सी संस्कृति पल्लवित कर रही है।
केवल स्वच्छता का तमगा ही काफी नहीं
फिर स्वच्छ सर्वेक्षण में सब भिड़ जाएंगे, लेकिन क्या हमारे शहर को 'स्वच्छता का तमगा' पहना देने से ही सब हो जाएगा। क्या इसके असली मुद्दे इसके नेपथ्य में नहीं चले जाते हैं। माफ कीजिये शहर की सियासत को कम से कम पहले इस तरह की गंदगी से तो मुक्त कर लीजिये। याद रखिये जागरूक जनता केवल तमाशा ही नहीं देख रही है। यह जनता भविष्य में अपने वोट की ताकत से 'पत्थरबाजों' का हिसाब चुकता करने की सामर्थ्य भी रखती है।
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