बंगाल पहुंचा भारतीय जनता पार्टी के अश्वमेध का घोड़ा
KHULASA FIRST
संवाददाता

रमण रावल वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
1999 में अटलजी लौटे और 2004 तक ससम्मान राज किया। 2004 से 2014 तक के कालखंड को भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेतृत्व ने सबक के तौर पर लिया और अपने को कुशल योद्धा के रूप में ऐसा तैयार किया कि 2014 से सतत अभी तक दिल्ली के तख्त पर तो कब्जा बरकरार है ही, एक-एक कर देश के 19 राज्यों में प्रत्यक्ष-परोक्ष सरकारें बना लीं।
या द कीजिये उस दिन को जब लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार (बेईमानी से) महज एक वोट से अविश्वास प्रस्ताव पर हार गई थी। तब गिरधर गोमांग ने उड़ीसा का मुख्यमंत्री रहते अटलजी के खिलाफ इसलिये वोट कर दिया था कि उन्हें लोकसभा से इस्तीफा दिये छह महीने नहीं हुए थे।
तब अटलजी का सदन में ऐतिहासिक संबोधन हुआ था। जिसमें उन्होंने पूरे आत्म विश्वास और दावे के साथ कहा था-हम एक दिन फिर लौटकर आएंगे और सरकार बनायेंगे। उसके बाद का इतिहास तो भारतीय राजनीति की पुस्तक में स्वर्णाक्षरों में दर्ज हो चुका है।
1999 में अटलजी लौटे और 2004 तक ससम्मान राज किया । 2004 से 2014 तक के कालखंड को भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेतृत्व ने सबक के तौर पर लिया और अपने को कुशल योद्धा के रूप में ऐसा तैयार किया कि 2014 से सतत अभी तक दिल्ली के तख्त पर तो कब्जा बरकरार है ही,एक-एक कर देश के 19 राज्यों में प्रत्यक्ष-परोक्ष सरकारें बना लीं।
ऐसा लगता है, जैसे भाजपा ने अश्वमेघ यज्ञ प्रारंभ किया हो, जिसका घोड़ा अब बंगाल में केसरिया पताका लहराते हुए हिनहिना कर खुशी जाहिर कर रहा है।
यूं तो भाजपा का सफर 1984 में मात्र दो लोकसभा सीट से प्रारंभ हुआ था, जब राजीव गांधी ने व्यंग्य करते हुए कहा था-हम दो हमारे दो। लेकिन,ध्येय की पक्की भाजपा और समर्पित कार्यकर्ता तैयार कर मैदानी मजबूती प्रदान करने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने किंचित भी विचलित हुए बिना सफर जारी रखा, जिसे 2014 में अपने बूते केंद्र में सरकार बनाने में भारी सफलता प्राप्त हुई।
इसके बाद भाजपा नेतृत्व ने हर लड़ाई विजयी भाव से लड़ी, जैसे वह राजनीतिक अश्वमेघ यज्ञ कर रही हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जुगलबंदी जाकिर हुसैन-शिव शर्मा की सुरीली तान की तरह निरंतर लयबद्ध और पूरे भारत में गुंजायमान हो रही है।
इस जोड़ी ने अश्वमेघ यज्ञ की तरह ही राज्यों में फतह का सिलसिला शुरू किया। या तो आत्म समर्पण कर शरण में आ जाओ या मैदान में शिकस्त के लिये तैयार रहो। इस अश्वमेघ में उन्होंने विरोधी दलों की सरकारों को तो चलता किया ही, राज्यों में उनके सहयोगी दल के क्षेत्रीय क्षत्रप भी अड़ंगा बन रहे थे, उन्हें भी हाशिये पर करने से परहेज नहीं किया।
उत्तर प्रदेश,बिहार,मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोवा, असम, ओड़िसा,अरुणाचल, दिल्ली, मणिपुर, उत्तराखंड में जहां अपनी सरकारें बनाईं, वहीं आंध्र, नगालैंड, सिक्किम, पुड्डुचेरी में सहयोगी की भूमिका निभा रही है। देखिये कि कैसे भाजपा ने विरोधी क्षेत्रीय क्षत्रपों को हाशिये पर धकेला।
आप सिलसिलेवार देखें कि विरोधी नेताओं में लालूप्रसाद यादव,मुलायम सिंह यादव,मायावती, नवीन पटनायक, नितीश कुमार, उद्धव ठाकरे, अशोक गेहलोत, अजीत जोगी, दिग्विजय सिंह, कमलनाथ आदि को राजनीति के परिदृश्य पर धुंधला कर दिया।
स्वतंत्र भारत में कांग्रेस के बाद किसी भी दल का इतना व्यापक प्रभाव नहीं हो पाया, जो भाजपा ने कर दिखाया। बेशक, पश्चिम बंगाल उसके लिये शेष राज्यों से अधिक चुनौतीपूर्ण रहा, लेकिन भाजपा ने एक बार फिर साबित किया कि संगठन की मजबूती, समर्पित कार्यकर्ताओं की विशाल फौज, जनचेतना जगाने का अभियान, आम मतदाता को प्रभावित करने की बाजीगरी, विरोधी को हर दांव से परास्त करने का माद्दा और अनेक बार पिछड़ने या मात खाने के बावजूद अंतिम लक्ष्य तक न पहुंचने से पहले हार स्वीकार न करने का आत्मबल जो उसमें है, उसका राई-रत्ती भर किसी भी राजनीतिक दल में नहीं है।
ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं। बंगाल में ही 2011 में मार्क्सवादी सरकार के मुंह से निवाला छीनकर जब ममता बैनर्जी सत्तारूढ़ हुई या उससे पहले कांग्रेस से जब मार्क्सवादियों ने सत्ता छीनी तो कांग्रेस व वाम दल ने तब से अब तक ऐसा कोई पराक्रम नहीं दिखाया, जो उसे लड़ाई के मैदान में मौजूद दिखाये।
वहीं भाजपा ने पिछले तीन चुनाव के नतीजों से निराश होकर बैठ जाने की बजाय हर बार नये दमखम से खड़े होने का परिचय दिया। अब जबकि बहुप्रतीक्षित बंगाल की सत्ता पर भाजपा का कब्जा हो चुका है,उसकी कोशिशें इसे लंबे समय तक बनाये रखने की होंगी।
यह देखना भी दिलचस्प होगा कि पिछली दो मार्क्सवादी व तृणमुल सरकारों द्वारा अपनाये गये परंपरागत ढांचे पर चलते हुए वह सत्ता संचालन करेगी या अपनी पृथक पहचान बनायेगी। करीब 50 साल से बंगाल में दादा-पहलवानी, धौंस-दपट, वसूली-चंदाखोरी,अराजकता-भ्रष्टाचार परस्त सरकार संचालन से भाजपा कैसे अपने को बचाते हुए सुशासन की स्थापना करती है।
बड़ी चुनौती जनता की विशालकाय अपेक्षाओं को पूरा करना, काम-धंधों की पुनर्स्थापना, कारोबारियों-उद्योगपतियों में विश्वास पैदा करना, रोजगार के अवसर पैदा करना और जनजीवन को सुरक्षित और सहज बनाना रहेगा।
यह ठीक है कि केंद्र में भी भाजपा के सत्तारूढ़ होने से उसे केंद्रीय सहायता में कोई दिक्कत नहीं होगी और वैसे भी वह डबल इंजिन सरकार का नारा लगाती रही है तो अब उसे यह जमीनी हकीकत बनाकर दिखाना होगा।
घुसपैठियों को निकाल बाहर करना,बांग्लादेश सीमा पर बागड़ खड़ी करना, रोहिंग्याओं की पहचान कर उन्हें रवाना करना और मूल बंगाली मुस्लिमों के मन से भय खत्म करना कि एसआईआर के जरिये वे भी भगा दिये जायेंगे, प्रमुख मसले रहेंगे।
बदले की कार्रवाई से बचते हुए पिछले 15 साल में भाजपा कार्यकर्ताओं व आम लोगों के साथ हुई जुल्म-ज्यादतियों का हिसाब करना भी चुनौती रहेगी।
बंगाल बेहद विकट प्रकृति वाला राज्य है,जहां बागी तेवरों को शांत रखते हुए विकास की नई परिभाषा लिखना और पांच दशक के राज्य चरित्र को बदलना रस्सी पर चलने के समान साबित होगा। वैसे भाजपा कहीं ठहर जाने वाली पार्टी नहीं है।
बंगाल फतह करने के बाद वह जश्न में डूब जाने वाली नहीं है। दक्षिण में पताका फहराने के लिये उसे आंध्र में अपने दम पर व तमिलनाडु, तेलंगाना, केरल में सहयोगी दलों के साथ सरकार बनाना बेहद दुर्गम लक्ष्य है। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)
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