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महामंडलेश्वर के आध्यात्मिक साम्राज्य पर ‘कब्जे’ की जंग

KHULASA FIRST

संवाददाता

24 फ़रवरी 2026, 4:41 pm
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महामंडलेश्वर के आध्यात्मिक साम्राज्य पर ‘कब्जे’ की जंग

महेश दीक्षित 98935-66422 खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
दुष्कर्म के आरोपों के बाद प्रदेश के चर्चित महामंडलेश्वर (स्वामी) का भविष्य क्या होगा? वे निष्कलंक रहते हैं या फिर जेल जाते हैं, यह तो आगे कानून ही तय करेगा। लेकिन उसके पहले उनके अरबों के आध्यात्मिक साम्राज्य पर कथित ‘कब्जे की जंग’ शुरू हो गई है। जिन शिष्यों को कभी महामंडलेश्वर की छाया माना जाता था, उन्होंने आरोप सामने आते ही सार्वजनिक रूप से तो उनसे दूरी बना ही ली है।

अंदरखाने उनके आश्रमों और उनसे जुड़ी संपत्तियों के समीकरण साधने की कोशिशों में जुटे होने की चर्चा है। आश्रमों से लेकर जमीन-जायदाद तक, हर स्तर पर खींचतान शुरू हो चुकी है। बताया जाता है कि महामंडलेश्वर का आध्यात्मिक साम्राज्य मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और हरिद्वार (उत्तराखंड) तक फैला हुआ है।

ऐसे में मामला किसी एक आश्रम तक सीमित नहीं, बल्कि अरबों की परिसंपत्तियों से जुड़ा माना जा रहा है। अब देखना यह है कि महामंडलेश्वर के इस ‘आध्यात्मिक साम्राज्य’ पर छिड़ी कथित ‘कब्जे की जंग’ कहां जाकर थमती है?

‘रागात्मक’ बीमारी से परेशान माननीय!
मप्र सरकार के एक वरिष्ठ ‘माननीय’ इन दिनों दोहरी मुश्किलों से जूझ रहे हैं। एक तरफ उनके विवादित बयान उनकी कुर्सी को डगमगा रहे हैं, तो दूसरी ओर उनका कथित ‘रागात्मक राग’ उनके निजी जीवन में हलचल मचाने लगा है। चर्चा है कि ‘माननीय’ को एक ऐसी मानसिक व्याधि ने घेर लिया है, जिसमें जहां भी उन्हें ‘सुंदरता’ नजर आती है, उनका मन नियंत्रण खो बैठता है।

कहते हैं आकर्षण का यह आवेग उन्हें इस कदर बेचैन कर देता है कि वे अपनी संवैधानिक मर्यादा तक भूल जाते हैं। चर्चा है कि ‘रागात्मक राग’ से छुटकारा पाने के लिए माननीय हर महीने दिल्ली का रुख कर रहे हैं। नारदजी बताते हैं कि, इन ‘रागात्मक राग’ की वजह से ‘माननीय’ और सरकार की कई बार खासी किरकिरी भी हो चुकी है। क्या दिल्ली का इलाज ‘माननीय’ के ‘रागात्मक राग’ पर लगाम लगा पाएगा, या यह राग यूं ही बजता रहेगा? यह तो आगे ‘माननीय’ का आचरण ही बताएगा।

मंत्री पद की आस में कद्दावरों की ‘मुखिया’ साधना
बुंदेलखंड के दो कद्दावर नेता (पूर्व मंत्री) इन दिनों मोहन मंत्रिमंडल में दोबारा जगह पाने के लिए पूरी ताकत झोंके हुए हैं। पूजा-पाठ, अनुष्ठान और राजनीतिक समीकरण, हर मोर्चे पर सक्रिय हैं। सबसे ज्यादा जोर प्रदेश के ‘मुखिया’ से बिगड़े रिश्तों को सुधारने और नजदीकियां बढ़ाने पर है। वजह, दिल्ली दरबार से भले कोई खतरा न हो, लेकिन अगर ‘मुखिया’ की हरी झंडी नहीं मिली, तो मंत्री पद की राह आसान नहीं होगी। बताते हैं कि बीते चार महीनों में दोनों नेता अलग-अलग चार-पांच बार ‘मुखिया’ से गुपचुप मुलाकात कर चुके हैं। इन मुलाकातों का मकसद सिर्फ मंत्री पद की दावेदारी मजबूत करना नहीं, बल्कि ‘श्रीमंत’ खेमे के एक प्रभावशाली मंत्री की काट तलाशना भी बताया जा रहा है। नारदजी कहते हैं, कद्दावरों की यह सियासी साधना कब और कैसे फल देती है, अब यह तो वक्त ही तय करेगा।

मप्र कांग्रेस में ‘इंदौर’ सबसे भारी
मध्यप्रदेश कांग्रेस की सियासत में इन दिनों एक शहर का वजन कुछ ज्यादा ही महसूस किया जा रहा है-और वह है इंदौर। पार्टी के भीतर अब यह चर्चा आम हो चली है कि आखिर ऐसा क्या है ‘इंदौरी भियाओं’ में, जो हाईकमान का दिल बार-बार यहीं आकर ठहर जाता है? दरअसल, हाल के समय में प्रदेश कांग्रेस के लगभग सभी अहम और प्रभावशाली पदों पर इंदौर का दबदबा बढ़ता नजर आ रहा है।

चाहे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी हो, महिला कांग्रेस की कमान हो या आदिवासी कांग्रेस का नेतृत्व-हर ओर ‘इंदौरी भिया’ विराजमान दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि ‘हाईकमान’ इंदौर पर इतना मोहित क्यों है, यह तो वही जाने! लेकिन जिस तरह से इंदौर का वजन बढ़ाया जा रहा है, उससे बाकी जिलों के नेताओं की धड़कनें जरूर तेज हो गई हैं।

पार्टी में अब सवाल गूंज रहा है कि, क्या मप्र कांग्रेस सचमुच पूरे प्रदेश की पार्टी है, या धीरे-धीरे ‘इंदौरी’ पार्टी होती जा रही है? बहरहाल, राजनीति में वजन केवल आंकड़ों से नहीं, धारणा से भी बनता है। फिलहाल, धारणा यही है कि मप्र कांग्रेस में ‘इंदौर’ सबसे भारी है।

क्यों बेचैन हैं ‘शाहरुख खान’?
राज्य मंत्रालय में पदस्थ एक बड़े साहब, जो खुद को ‘शाहरुख खान’ समझते हैं, इन दिनों गहरी बेचैनी में हैं। दरअसल, मोहन सरकार के सत्ता में आते ही ‘शाहरुख खान’ साहब के सितारे अचानक बुलंदियों पर पहुंच गए थे। सत्ता के गलियारों में उनकी सक्रियता और आत्मविश्वास ऐसा था, मानो अगला प्रशासनिक मुखिया बनना अब केवल औपचारिकता भर रह गया हो।

बताया जाता है कि उन्होंने भी अपना अंदाज कुछ ऐसा बना लिया था, जैसे निर्णायक भूमिका अब उन्हीं की होने वाली हो। लेकिन राजनीति और प्रशासन की चालें कब करवट बदल लें, यह कोई नहीं जानता। कुछ ही दिनों में हालात ऐसे बदले कि प्रशासनिक मुखिया बनने का सपना तो दूर, उन्हें सीएम सचिवालय से कुछ इस तरह बाहर का रास्ता दिखा दिया गया, जैसे मानो दूध में गिरी मक्खी को निकालकर अलग कर दिया गया हो। नारदजी कहते हैं अब ‘शाहरुख खान’ साहब नौकरी तो चल रही है, लेकिन बेचैनी में..!

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