सुप्रीम कोर्ट की दो टूक अफसर कानून से ऊपर नहीं: पर्यावरण संरक्षण जनस्वास्थ्य और भविष्य की अनिवार्य शर्त
KHULASA FIRST
संवाददाता

मंजूरी बिना शुरू हुई परियोजनाओं पर सख्त फैसला
विकास के नाम पर पर्यावरण से खिलवाड़ मंजूर नहीं
डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सरकार में बैठे अधिकारियों द्वारा विकास के नाम पर पर्यावरण कानून की अनदेखी अब नहीं की जा सकेगी, देश को ऐसी उम्मीद सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बंधी है। अफसर विकास परियोजनाओं का काम बिना पर्यावरण स्वीकृति कर रहे हैं और इसके लिए उन्होंने मनमाना आदेश भी जारी कर पर्यावरण कानून को ताक में रखवा दिया था। इससे देश में लगातार प्राकृतिक संकट गहराते जा रहे हैं। सरकार की इस मनमानी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की शरण ली गई। कोर्ट ने महत्वपूर्ण दूरगामी फैसला दिया।
2021 का आदेश रद्द...कोर्ट ने उस व्यवस्था को खारिज कर दिया है, जिसमें बिना मंजूरी शुरू परियोजनाओं को बाद में कागजी प्रक्रिया पूरी करके वैध बना दिया जाता था। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि पर्यावरणीय मंजूरी कानून द्वारा निर्धारित पूर्व शर्त है, तो उसे केवल प्रशासनिक आदेशों के जरिए बदला नहीं जा सकता। सरकार के पास विकास की नीति बनाने की शक्ति है, लेकिन विकास का रास्ता हमेशा कानून के दायरे से होकर ही गुजरना चाहिए।
निष्कर्ष : विकास विरोध नहीं, विकास की सही परिभाषा जरूरी...यह बहस ‘विकास बनाम पर्यावरण' की नहीं होनी चाहिए। देश और प्रदेश को आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता है, लेकिन ऐसा बुनियादी ढांचा नहीं, जिसकी भारी कीमत जंगल, नदियां, भूजल और आने वाली पीढ़ियां चुकाएं।
इस फैसले का संदेश साफ है कि विकास जरूरी है, लेकिन कानून से ऊपर नहीं। किसी परियोजना में भारी निवेश के बाद उसे रोकना कठिन बताना गलत मिसाल है। यदि नियम तोड़कर निर्माण और बाद में मंजूरी सामान्य हो गई, तो कानून का पालन करने वाली परियोजनाएं नुकसान में होंगी, इसलिए पर्यावरणीय मंजूरी बाधा नहीं, बल्कि विकास की सुरक्षा व्यवस्था है।
जंगल बचेंगे तो पानी बचेगा, और पानी बचेगा तो जीवन व अर्थव्यवस्था सुरक्षित रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट का फैसला यही चेतावनी देता है कि प्रकृति को नुकसान पहुंचाकर किया गया विकास असल में भविष्य पर बोझ है।
पर्यावरण का संकट मानव जीवन के लिए खतरा... भारत में चुनाव और फिर सरकार बनने के बाद भारी-भरकम टेंडर और ठेकों वाले तथा कथित आधुनिक विकास की सबसे चमकदार तस्वीर अक्सर नई सड़क, एक्सप्रेस-वे, बांध, उद्योग, बिजलीघर और बड़े निर्माण प्रोजेक्ट के रूप में दिखाई देती है।
यह प्रोजेक्ट जिस तरह से बनाए जाते हैं, उसके कारण पर्यावरण का संकट जो अब मानव जीवन और हमारे बच्चों का संकट बन चुका है, बढ़ जाते हैं। क्योंकि इस चमक के पीछे विकास की एक दूसरी तस्वीर भी है, जंगलों पर दबाव, भूमि,जल, वायु सब तरह का अनियंत्रित प्रदूषण नदियों में बहाया जा रहा या उड़ेला जा रहा मल-मूत्र, घातक रसायन आदि का जहर, नदियों के रास्ते बदलना, भूजल पर असर, कृषि भूमि का नुकसान, जैव विविधता का संकट और स्थानीय समुदायों की आजीविका पर पड़ने वाला प्रभाव और इन सबसे पैदा हो गया जलवायु संकट इंदौर ही नहीं पूरे मालवा निमाड़ से लेकर यूरोप एशिया यानी पूरी दुनिया के लिए अस्तित्व का सवाल हो गया है यह संकट इसी विकास प्रक्रिया का नतीजा है, जो मानव निर्मित है। अनाज, हवा, पानी सबकुछ जहरीला बना दिया गया है। यह सब विकास के साइड इफेक्ट और डायरेक्ट इफेक्ट है।
जीवन का संकट बनाने वाले इस इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के डॉक्टर यानी बड़े बाबू यानी अफसर और उनमें भी आला अफसर और उनके साथ सरकार में बैठे सत्ता का भरपूर दोहन करने वाले राजनेताओं द्वारा पर्यावरण को मजाक समझना और खुद को कानून से ऊपर समझने का परिणाम है कि सुप्रीम कोर्ट को इन अफसर को कानून का मतलब समझाना पड़ रहा है।
उल्लेखनीय है कि बीते माह सुप्रीम कोर्ट ने एक जबरदस्त फैसला दिया। यह विकास योजनाओं के लिए अनिवार्य पर्यावरण प्रभाव के मूल्यांकन और पर्यावरण की परियोजना के लिए स्वीकृति से जुड़ा हुआ है, जिसका संज्ञान मीडिया ने शायद नहीं लिया, न ही पर्यावरण से जुड़े संगठनों और जानकारों ने इस ओर ध्यान दिया। जैसा कि पर्यावरण के जानकार और स्वतंत्र पत्रकार राजकुमार सिन्हा करते हैं कि
सुप्रीम कोर्ट के पर्यावरणीय मंजूरी से जुड़े हालिया फैसले ने तथाकथित विकास और पर्यावरण विनाश की असली तस्वीर को फिर देश के सामने ला दिया है। अदालत का मूल संदेश यह है कि जिस परियोजना के लिए कानूनन परियोजना कार्य शुरू होने से पहले पर्यावरणीय मंजूरी जरूरी है।
इस पर्यावरण स्वीकृति के बिना मनमाने तरीके से शासन प्रशासन मैं बैठे अफसर ऑन वर्ग की कागजी कार्यवाही के आधार पर किसी भी प्रोजेक्ट का काम शुरू कर देना पूरी तरह गैरकानूनी है। अफसरों के इस तरह के दाव-पेंच को सामान्य गलती मानकर कागज पूरे कर देना, पर्यावरणीय कानून की मूल भावना को कमजोर करता है।
सबसे खतरनाक स्थिति: पैसा लग जाने के बाद कानून का कमजोर पड़ना... मान लीजिए किसी परियोजना में हजारों करोड़ रुपए का निवेश हो चुका है और उसके बाद पता चलता है कि आवश्यक पर्यावरणीय मंजूरी नहीं ली गई थी।
गलत मिसाल: अब परियोजना रोकना राजनीतिक और आर्थिक रूप से कठिन माना जाता है, जिससे यह तर्क जन्म लेता है कि "इतना पैसा लग चुका है, अब परियोजना कैसे बंद करें?’ उल्टा संदेश: यह तर्क कानून के मूल उद्देश्य को कमजोर करता है। कानून का पालन करने वाला वर्षों तक प्रक्रिया पूरी करता है, जबकि नियम तोड़ने वाला काम शुरू करके बाद में नियमितीकरण की उम्मीद रखता है।
प्रदेश की भौगोलिक संवेदनशीलता..प्रदेश का बड़ा हिस्सा जंगल, नदियों, जैव विविधता और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था से जुड़ा है, इसलिए यहां विकास परियोजनाओं का प्रभाव दूरगामी होता है।
खनन: भूजल स्तर और कृषि पर सीधा असर... सड़क एवं एक्सप्रेस-वे: वन्यजीवों के आवागमन (कॉरिडोर) में बाधा।
बांध और नदियां: प्राकृतिक प्रवाह और जलीय जीवन पर संकट।
ताप विद्युत परियोजनाएं: वायु, जल प्रदूषण और राख निपटान की चुनौतियां।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मूल संदेश
इस ऐतिहासिक फैसले को केवल एक ‘ऑफिस मेमोरेंडम' के निरस्त होने के रूप में देखना इसकी व्यापकता को कम करना है।
विकास बनाम पर्यावरण
विकास और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर देश की जरूरत हैं, लेकिन उनकी कीमत जंगल, नदियां, भूजल और आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व को दाव पर लगाकर नहीं चुकानी चाहिए। विकास परियोजनाओं के नाम पर एक सुनियोजित साजिश से हमारे देश में बीते चार दशक से पर्यावरण, प्रकृति और जीवन को बचाने की बात करने वाले पर्यावरण वीडियो देशभक्ति को राष्ट्रद्रोही कहा जाने लगा है।
विदेशी एजेंट कहा जाने लगा है। विदेश को भारत की प्रगति पसंद नहीं है, इसलिए पर्यावरण के नाम पर विकास का विरोध करवाया जाता है, ऐसे शर्मनाक आधारहीन पर्यावरण विरोधी आरोप सरकार में बैठे लोग और उनके संगठनों द्वारा थोपे जाते हैं। बहरहाल, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट की असली हकीकत यह है कि पहले निर्माण, फिर पर्यावरण की मंजूरी की औपचारिकता पूरी की जाती है। इस कारण डेवलपमेंट टिकाऊ या सस्टेनेबल नहीं बन पाता।
मध्य प्रदेश के लिए यह फैसला महत्वपूर्ण
विकास परियोजना ऑन के नाम पर पर्यावरण मंजरी के उलझन या अनदेखी के मामले में मध्य प्रदेश पीछे नहीं है। यहां बने विशालकाय बांध हो या निर्माणाधीन बांध, सिंचाई परियोजनाएं और नदी जोड़ो परियोजना, एक्सप्रेस हाईवे, शहरीकरण, मेट्रोपॉलिटन, औद्योगिकीकरण, एयरपोर्ट आदि जैसे प्रोजेक्ट पर्यावरण नियमों के खिलाफ बने और बनाए जा रहे हैं।
मध्यप्रदेश उन राज्यों में है, जहां विकास परियोजनाओं का दायरा बहुत बड़ा है। यहां सड़क और एक्सप्रेस-वे से लेकर खनन, ताप जल और अब परमाणु विद्युत, औद्योगिक क्षेत्र, बांध और नदी आधारित परियोजनाओं तक लगातार गतिविधियां चलती रहती हैं।
अधिकारियों द्वारा अक्सर पर्यावरण स्वीकृति को दरकिनार किया जाता है और इस तरह के हैरत अंगेज मामले प्रदेश की स्टेट एनवायरमेंटल इंपैक्ट एसेसमेंट अथॉरिटी ने कुछ महीना पहले उजागर किए थे। इसमें आईएएस अफसर जिम्मेदार बताए गए थे, जिन्होंने सैकड़ों प्रोजेक्ट में पर्यावरण मंजूरी की अनदेखी की थी।
लाख टके का सवाल
सुप्रीम कोर्ट का आदेश बताता है कि परियोजना शुरू करने से पहले पर्यावरणीय मंजूरी अनिवार्य है, तो परियोजना बिना मंजूरी के निर्माण तक कैसे पहुंच जाती है? यदि पहुंच जाती है तो इसके लिए परियोजना संचालक जिम्मेदार है या सरकारी मशीनरी भी, जिसने निर्माण देखा?
सिर्फ कंपनी दोषी है या पूरा सिस्टम?...सी निजी कंपनी द्वारा नियम तोड़ना एक पक्ष है, लेकिन जब किसी सरकारी विभाग, एजेंसी या सार्वजनिक धन से बनने वाली परियोजना में पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी होती है, तो मामला कहीं अधिक गंभीर हो जाता है। जमीन कौन उपलब्ध कराता है? प्रशासन।
निर्माण की अनुमति कौन देता है? सरकारी तंत्र। ठेका और कार्यादेश कौन जारी करता है? यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सिस्टम में किस स्तर पर कानून की अनदेखी हुई और क्या विकास की जल्दी पर्यावरण कानून से बड़ी हो गई?
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