नियम सख्त, कार्रवाई गायब: सरकारी अफसरों ने छिपाया संपत्ति का ब्योरा; खाली फॉर्म अपलोड कर निभाई औपचारिकता
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
मध्यप्रदेश में सरकारी अफसरों की संपत्ति का हिसाब-किताब रखने की व्यवस्था सवालों के घेरे में है। सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) के पोर्टल पर 56 से अधिक अधिकारियों ने अपनी अचल संपत्ति का विवरण (आईपीआर) जमा नहीं किया, जबकि कई अफसरों ने सिर्फ खानापूर्ति करते हुए अधूरे या खाली फॉर्म अपलोड कर दिए। हैरानी की बात यह है कि नियमों के बावजूद अब तक किसी पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
हर साल देना होता है संपत्ति का ब्योरा
मध्यप्रदेश सिविल सेवा आचरण नियमों के तहत प्रत्येक सरकारी अधिकारी को हर वर्ष 31 जनवरी तक अपनी अचल संपत्तियों का विवरण ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज करना अनिवार्य है। इसमें प्लॉट, मकान, कृषि भूमि, खरीद मूल्य, वर्तमान बाजार मूल्य, क्षेत्रफल, आय का स्रोत और संपत्ति के स्वामित्व जैसी जानकारियां देनी होती हैं।
56 अफसरों ने नहीं भरा आईपीआर
दिसंबर 2025 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 23 राज्य प्रशासनिक सेवा अधिकारियों, 29 मंत्रालयीन अधिकारियों और 4 आबकारी अधिकारियों ने IPR जमा ही नहीं किया। इनमें डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी, तहसीलदार और अन्य वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं।
तीन तरह से खेल रहे हैं अधिकारी
पोर्टल की पड़ताल में तीन तरह की अनियमितताएं सामने आईं है। पहली कुछ अधिकारियों ने आईपीआर जमा ही नहीं किया। दूसरी कई अधिकारियों ने अधूरी जानकारी भरी। तीसरी कुछ ने सिर्फ हस्ताक्षर कर खाली फॉर्म अपलोड कर दिया। इसके बावजूद किसी के खिलाफ न विभागीय कार्रवाई हुई, न प्रमोशन रोका गया और न ही कोई दंडात्मक कदम उठाया गया।
कीमत और आय की जानकारी सबसे ज्यादा गायब
जो अधिकारी फॉर्म भरते भी हैं, वे अक्सर संपत्ति की खरीद कीमत, मौजूदा बाजार मूल्य, विक्रेता का नाम और उससे होने वाली आय की जानकारी छिपा लेते हैं। ऐसे में संपत्ति की वास्तविक स्थिति का आकलन करना मुश्किल हो जाता है।
नियम सख्त, अमल ढीला
नियमों के मुताबिक आईपीआर जमा नहीं करने पर प्रमोशन रोका जा सकता है, वेतन वृद्धि प्रभावित हो सकती है, विभागीय जांच हो सकती है और विजिलेंस क्लीयरेंस भी रोकी जा सकती है। लेकिन जमीनी स्तर पर अब तक किसी अधिकारी के खिलाफ ऐसी कार्रवाई का उदाहरण सामने नहीं आया है।
विजिलेंस यूनिट की भूमिका पर सवाल
जीएडी की विजिलेंस यूनिट को हर साल यह जांच करनी होती है कि किन अधिकारियों ने IPR जमा नहीं किया। लेकिन न तो नियमित नोटिस जारी किए जा रहे हैं और न ही सार्वजनिक रूप से कोई रिपोर्ट सामने लाई जा रही है। इससे पूरी निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
क्यों जरूरी है आईपीआर?
विशेषज्ञों के अनुसार आईपीआर सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता का महत्वपूर्ण माध्यम है। इससे अधिकारियों की संपत्ति में असामान्य वृद्धि पर नजर रखी जा सकती है और भ्रष्टाचार की संभावनाओं की जांच आसान होती है। यदि संपत्ति का विवरण ही अधूरा या गायब हो, तो निगरानी व्यवस्था का उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।
जीएडी का पक्ष
सामान्य प्रशासन विभाग का कहना है कि IPR जमा करना सभी अधिकारियों के लिए अनिवार्य है। समय पर जानकारी नहीं देने वालों को नोटिस जारी किए जाते हैं और आवश्यक होने पर नियमों के तहत कार्रवाई भी प्रस्तावित की जाती है। हालांकि विभाग का यह दावा जमीनी आंकड़ों से मेल नहीं खाता दिखाई देता।
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