‘नारायणकोटी’ पत्थरों की प्राचीन जुगलबंदी में खड़े हैं 27 अद्भुत मंदिर
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
चार धाम यात्रा के दौरान केदारनाथ मार्ग पर उमड़ने वाला लाखों श्रद्धालुओं का रैला अमूमन गुप्तकाशी की मुख्य चहल-पहल को देखकर सीधे सोनप्रयाग की ओर बढ़ जाता है, लेकिन इसी व्यस्त हाईवे की बायपास सड़कों के पीछे मुख्यधारा की नजरों से ओझल एक ऐसा ऐतिहासिक और आध्यात्मिक रहस्य छुपा है, जिसकी भव्यता देखकर आधुनिक आर्किटेक्ट भी दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं।
रुद्रप्रयाग जिले का एक शांत और छोटा सा कस्बा ‘नारायणकोटी’ एक ऐसे ही अनूठे और जाग्रत मंदिर समूह का केंद्र है। यहां एक ही परिसर के भीतर, एक कतार में छोटे-बड़े मिलाकर कुल 27 प्राचीन मंदिरों का एक कारवां खड़ा है।
कत्यूर और नागर शैली के बेजोड़ स्थापत्य को समेटे यह प्राचीन धरोहर न केवल द्वापर युग के कुरुवंश की अनकही कहानियों को बयां करती है, बल्कि इस साल की यात्रा में भीड़भाड़ से दूर वास्तविक अध्यात्म की खोज करने वाले कद्रदानों के लिए एक अभूतपूर्व पड़ाव बनकर उभरी है।
उत्तराखंड का वो अनदेखा स्थापत्य, जिसे ‘धरोहर गोद लो’ योजना ने दी नई जिंदगी... नारायणकोटी का यह मंदिर समूह लंबे समय तक प्रशासनिक उपेक्षा, स्थानीय बेरुखी और समय के थपेड़ों के कारण इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दफन होने की कगार पर पहुंच चुका था।
कई मंदिरों के शिखर ढह रहे थे और प्राचीन शिलाओं पर काई जम चुकी थी। पहाड़ों की इस अनमोल और अनूठी विरासत को विलुप्त होने से बचाने के लिए हाल ही में केंद्र सरकार की ‘एडॉप्ट ए हेरिटेज’ (धरोहर गोद लो) योजना के तहत इस पूरे क्षेत्र को शामिल किया गया, जिसके बाद इसका जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण का काम युद्धस्तर पर शुरू हुआ।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की देखरेख में अब इन खंडित हो रहे पत्थरों के ढांचों को बिना उनके मूल स्वरूप से छेड़छाड़ किए, प्राचीन वैज्ञानिक पद्धति से संवारा जा रहा है। पत्थरों को आपस में जोड़ने के लिए इस्तेमाल की गई प्राचीन इंटरलॉकिंग तकनीक को दोबारा जीवित किया गया है।
यही वजह है कि इस साल की चार धाम यात्रा में यह परिसर एक नए और चमकते हुए सांस्कृतिक पर्यटन केंद्र के रूप में देश के नक्शे पर उभर रहा है। नागर शैली में बने इन 27 मंदिरों के पत्थरों की नक्काशी इतनी बारीक और सघन है कि यहाँ आकर दक्षिण भारत के पल्लव कालीन स्थापत्य और उत्तर भारत की कत्यूर वास्तुकला का एक दुर्लभ संगम साफ नजर आता है।
नौ ग्रहों के कुंड का विस्मय-जहां ग्रहों की शांति के लिए जुटे थे कुरुवंश के राजा...इस पूरे परिसर का सबसे बड़ा रहस्य, आकर्षण और इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना यहां स्थित प्राचीन ‘वीरभद्र कुंड’ है।
इस आयताकार कुंड के चारों तरफ सौरमंडल के नौ ग्रहों की पाषाण मूर्तियां इस तरह से कोण बनाकर स्थापित की गई हैं, जो इस बात का पुख्ता प्रमाण हैं कि हमारे पूर्वज आधुनिक टेलिस्कोप के आने से सदियों पहले ही खगोल विज्ञान के गूढ़ रहस्यों से वाकिफ थे। इन मूर्तियों पर सूर्य की किरणें साल के विशेष दिनों में सीधे पड़ती हैं।
पौराणिक ग्रंथों और स्थानीय लोक-कथाओं के अनुसार, महाभारत के भीषण नरसंहार और गोत्र-वध के महापाप के बाद जब पांचों पांडव गहरे मानसिक संताप, अवसाद और आत्मग्लानि से जूझ रहे थे, तब महर्षि वेदव्यास ने उन्हें इसी स्थान पर जाने का मार्ग बताया था।
कुरुवंश के राजा युधिष्ठिर ने अपने भाइयों के साथ इसी स्थान पर बैठकर नौ ग्रहों की क्रूर दशा को शांत करने के लिए एक विशेष और बेहद गुप्त महायज्ञ का अनुष्ठान किया था।
विज्ञान और आस्था के बीच खड़ा पानी का वो अनसुलझा स्रोत... इस कुंड की एक और सबसे बड़ी पहेली इसका जल स्रोत है। पहाड़ों के शुष्क हो चुके मुहाने के बीच बने इस कुंड में पानी की दो निरंतर धाराएं प्राचीन सिंहमुखों (शेर के आकार के पत्थरों के नल) से लगातार गिरती रहती हैं।
स्थानीय भू-गर्भ वैज्ञानिकों के लिए भी यह आज तक कौतूहल का विषय है कि बिना किसी आधुनिक पाइपलाइन या ऊपरी ग्लेशियर के सीधा जुड़ाव न होने के बावजूद, इस कुंड का जल स्तर सदियों से एक समान कैसे बना हुआ है और सूखा पड़ने पर भी यह पानी कभी कम क्यों नहीं होता।
स्थानीय निवासियों की मान्यता है कि इस कुंड के औषधीय और पवित्र जल में स्नान करने के बाद नौ ग्रहों के सम्मुख शुद्ध घी के दीपक प्रज्वलित करने से इंसानी कुंडली के बड़े से बड़े ग्रह दोष, पितृ दोष और मानसिक अशांति पल भर में दूर हो जाते हैं।
केदारनाथ पैदल मार्ग की अंतहीन भागदौड़, वीआईपी दर्शन की कतारों और सोशल मीडिया के कैमरों के शोर से दूर, नारायणकोटी का यह शांत और गंभीर परिसर इस बार यात्रियों को केवल एक तीर्थयात्री के रूप में नहीं, बल्कि इतिहास और ब्रह्मांड के रहस्यों के एक जिज्ञासु खोजी के रूप में खुद से जुड़ने का मौका दे रहा है।
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