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अवैध गर्भपात कांड के 6 दिन बाद भी टीआई को न कार दिखी, न आरोपी: महू पुलिस की सुस्त मेहरबानी

KHULASA FIRST

संवाददाता

03 मार्च 2026, 2:34 pm
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अवैध गर्भपात कांड के 6 दिन बाद भी टीआई को न कार दिखी, न आरोपी

क्या सिस्टम ही बना रहा बचाव का रास्ता?

अमीषा को अस्पताल से छुट्टी, पर पुलिस पुख्ता सुरागों के बाद भी बेबस

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
महू शहर के बीचोबीच स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर चल रहे अवैध गर्भपात के काले कारोबार को सील हुए 6 दिन हो चुके हैं, लेकिन पुलिसिया कार्रवाई अब तक फाइलों और कागजी खानापूर्ति से बाहर नहीं निकल पाई है। इस जघन्य अपराध से जुड़े मामले में जिस तरह की सुस्ती बरती जा रही है, वह सीधे तौर पर महू पुलिस की पुलिसिंग को कलंकित कर रही है।

प्रशासन ने 26 फरवरी को काली माता मंदिर के पीछे जिस मकान में दबिश देकर मिनी ऑपरेशन थिएटर और प्रतिबंधित दवाओं का जखीरा पकड़ा था, उसमें सबसे बड़ा सुराग वह संदिग्ध कार है, जिसका रजिस्ट्रेशन खरगोन का मिला है।

हैरानी की बात यह कि घटना के दिन इसी संदिग्ध कार से युवती को लाने-ले जाने और जागरूक लोगों की पूछताछ के दौरान कार से शातिर तरीके से आरोपियों के फरार होने के पुख्ता इनपुट पुलिस के पास हैं, फिर भी मुख्य चेहरे अब तक महू पुलिस की पहुंच से दूर हैं।

मामले में मुख्य आरोपी महिला अमीषा को सोमवार को अस्पताल से छुट्टी मिल गई। अब तक वह बीमारी का बहाना बनाकर पूछताछ से बच रही थी, लेकिन अब पुलिस पर सबकी नजरें टिकी हैं। टीआई राहुल शर्मा और उनकी टीम के पास इस गोरखधंधे में शामिल गाड़ी के नंबर से लेकर तमाम पुख्ता साक्ष्य मौजूद हैं,

इसके बावजूद जिस तरह से अमीषा के मोबाइल की कॉल डिटेल (सीडीआर) खंगालने और इस घिनौने खेल में शामिल अन्य मुख्य आरोपियों को नामजद करने में ढिलाई बरती जा रही है, वह सीधे तौर पर पुलिस की संदिग्ध भूमिका पर सवाल खड़े करती है। आखिर पुलिस उस कार मालिक और फरार चेहरों तक पहुंचने में इतनी सुस्ती क्यों दिखा रही है?

एसडीएम राकेश परमार और बीएमओ डॉ. योगेश सिंगारे की छापेमारी में जिस तरह का साजो-सामान मिला, उसने साफ कर दिया था कि यहां बड़े पैमाने पर गर्भपात करने का खेल चल रहा था। इस बड़ी कार्रवाई के बाद उम्मीद जताई जा रही थी कि महिलाओं के गर्भपात से जुड़े एक बड़े नेटवर्क का खुलासा होगा, लेकिन टीआई राहुल शर्मा के नेतृत्व में चल रही पुलिस की कार्यप्रणाली ने इस पूरे मामले का खुलासा करने के बजाय उसे संरक्षण देने जैसी स्थिति पैदा कर दी है।

जांच को जिस तरह से दबाने की कोशिश की जा रही है, उससे स्पष्ट है कि कहीं न कहीं आरोपियों को बचाने का खेल पर्दे के पीछे जारी है।

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