सरदार सरोवर समझौता: ऐसे भी सुलझता है राज्यों के बीच टकराव; राजनीति की जगह सहमति का मॉडल
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
स रदार सरोवर परियोजना से जुड़े चार राज्यों के बीच लगभग तीन दशक से लंबित विवाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के प्रयास से सुलझ गए हैं। सरदार सरोवर से सबसे ज्यादा प्रभावित मप्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने समाधान में मुख्य भूमिका निभाई।
केंद्र सरकार की इस पहल से अन्य राज्यों में अपने-अपने हितों को लेकर बने विवाद और राजनीतिक टकराव भी दूर हो सकते हैं। यह केवल एक परियोजना का समझौता नहीं, बल्कि भारतीय संघीय व्यवस्था मैं आपसी सहमति का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आया है।
यदि केंद्र सरकार निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाए और राज्य राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर बातचीत करें, तो दशकों पुराने जटिल विवाद भी सहमति से सुलझाए जा सकते हैं।
इस समझौते में मप्र, गुजरात, महाराष्ट्र व राजस्थान में वित्तीय दायित्वों और परियोजना से जुड़े लंबित मुद्दों पर सहमति बनी। इससे न केवल मप्र को आर्थिक राहत मिली, बल्कि चारों राज्यों में विश्वास व सहयोग का वातावरण भी बना। यह मॉडल आगे भी अपनाया जाता है, तो आने वाले वर्षों में जल, सीमा और संसाधनों से जुड़े कई पुराने विवादों का समाधान तेज़ी से हो सकता है।
इससे न केवल राज्यों के बीच विश्वास बढ़ेगा, बल्कि देश की विकास परियोजनाओं को भी नई गति मिलेगी। सरदार सरोवर बांध परियोजना के समझौते में मप्र, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच वित्तीय दायित्वों और परियोजना से जुड़े लंबित मुद्दों पर सहमति बनी है।
राजनीति से ऊपर राज्य आगे आए... विश्लेषकों का मानना है देश में अक्सर अंतरराज्यीय विवाद अपने-अपने फायदे और नुकसान के साथ राजनीतिक रंग भी ले लेते हैं, जिससे समाधान वर्षों तक टलता रहता है।
सरदार सरोवर समझौते ने दिखाया सभी पक्ष विकास और जनहित को प्राथमिकता दें, तो राजनीतिक टकराव की बजाय संवाद से स्थायी समाधान निकाला जा सकता है।
इससे न्यायालयों पर बोझ कम होगा, विकास परियोजनाओं में तेजी आएगी और राज्यों के बीच विश्वास भी मजबूत होगा।
आपसी सहमति की प्रतीक्षा में राज्यों के झगडे...सरदार सरोवर मॉडल को देखते हुए विशेषज्ञ मानते हैं केंद्र सरकार इसी प्रकार की पहल अन्य अंतरराज्यीय विवादों में भी कर सकती है। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक के राज्यों में वर्षों से जल-जमीन सहित आर्थिक और प्राकृतिक संसाधनों के बंटवारो को लेकर टकराव की स्थिति है। कुछ राज्य में राजनीतिक कारण भी विवाद को लंबा खींच रहे हैं। ऐसे चुनिंदा विवाद भी है जिनका समाधान अब जरूरी है।
आपसी टकराव वाले राज्य
कावेरी जल विवाद (कर्नाटक–तमिलनाडु)
कृष्णा नदी जल बंटवारा (आंध्र प्रदेश–तेलंगाना)
महादयी (मांडवी) नदी विवाद (गोवा–कर्नाटक–महाराष्ट्र)
रावी-ब्यास जल विवाद (पंजाब–हरियाणा–राजस्थान)
यमुना जल बंटवारा (दिल्ली–हरियाणा–उप्र–हिमाचल प्रदेश)
महानदी जल विवाद (छत्तीसगढ़–ओडिशा)
बेलगावी (बेलगाम) सीमा विवाद (महाराष्ट्र–कर्नाटक)
असम और पूर्वोत्तर राज्यों के सीमा विवाद, जिनमें हाल के वर्षों में बातचीत से कुछ प्रगति भी हुई है।
फायदे का गणित... सरदार सरोवर जैसी सहमति आधारित प्रक्रिया उपरोक्त विवादों में भी अपनाई जाती है, तो इसके कई लाभ हो सकते हैं। जैसे वर्षों से लंबित विकास परियोजनाओं को गति मिलेगी। राज्यों के बीच राजनीतिक तनाव कम होगा। सिंचाई, पेयजल और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं का बेहतर प्रबंधन संभव होगा।
न्यायालयों में लंबित अंतरराज्यीय मामलों की संख्या घट सकती है। केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग मजबूत होगी। सरदार सरोवर समझौता यह संकेत भी देता है कि भारत में अंतरराज्यीय विवादों का समाधान केवल कानूनी लड़ाई से नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, संवाद और साझा हितों के आधार पर भी संभव है।
ऐसे बनी बात...
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, नर्मदा परियोजनाओं से जुड़े अरबो रुपए के लेन-देन या कहें हिस्से- बंटवारे को लेकर चारों राज्यों के बीच लंबे समय से मतभेद थे। फरवरी 2026 में भारत के अटॉर्नी जनरल ने इस संबंध में अभिमत दिया था, जिसके आधार पर मप्र पर लगभग 1,500 करोड़ रुपये गुजरात को भुगतान करने की स्थिति बन रही थी।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में चारों राज्यों के बीच हुई बैठकों और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल के मार्गदर्शन में सहमति बनी परियोजना के व्यय में गुजरात की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 75 प्रतिशत की जाएगी क्योंकि गुजरात ही इस परियोजना से सबसे ज्यादा फायदे में है।
इस निर्णय के बाद मध्य प्रदेश की संभावित देनदारी घटकर 231 करोड़ रुपये रह गई। बताया गया है इस समझौते के बाद सरदार सरोवर परियोजना से जुड़ा लंबा विवाद लगभग समाप्त हो गया है। साथ ही मप्र को परियोजना से करीब 31 लाख हेक्टेयर सिंचाई का लाभ तथा 85 पैसे प्रति यूनिट की दर से बिजली मिलती रहेगी।
इस विवाद को सुलझाने में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा प्रदेश के हितों की लगातार पैरवी महत्वपूर्ण साबित हुई। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के प्रति आभार व्यक्त कर कहा उनके प्रयासों से वर्षों पुराने विवाद का ऐसा समाधान निकला, जिससे सभी संबंधित राज्यों को लाभ हुआ।
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