लाड़ली बहना पर बढ़ता खर्च: शिक्षा बजट का इतना और स्वास्थ्य बजट के करीब बराबर रकम
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
मध्यप्रदेश की लाड़ली बहना योजना महिलाओं को हर महीने सीधे आर्थिक सहायता देने वाली देश की बड़ी योजनाओं में शामिल है। लेकिन योजना के बढ़ते बजट ने राज्य की वित्तीय प्राथमिकताओं को लेकर बहस तेज कर दी है।
2026-27 के बजट में लाड़ली बहना के लिए 23,882 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। 2025-26 में यह राशि 18,669 करोड़ रुपए थी। यानी एक साल में योजना के बजट में करीब 28% की बढ़ोतरी हुई है।
वहीं, उपलब्ध बजट आंकड़ों के मुताबिक 2025-26 में लाड़ली बहना पर होने वाला खर्च राज्य के शिक्षा बजट के करीब 42% और स्वास्थ्य बजट के करीब 99% के बराबर था।
इससे सवाल उठ रहा है कि महिलाओं को आर्थिक सहायता देने वाली इस योजना का बढ़ता खर्च शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरे विकास कार्यों के बजट पर कितना असर डाल रहा है।
देश के 12 राज्यों में महिलाओं को सीधे कैश ट्रांसफर
महिलाओं को सीधे बैंक खाते में आर्थिक सहायता देने वाली योजनाओं का चलन कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। करीब तीन साल पहले जहां इस तरह की योजनाएं सीमित राज्यों तक थीं, वहीं अब देश के 12 राज्य महिलाओं को प्रत्यक्ष नकद सहायता दे रहे हैं।
2025-26 में इन राज्यों की ऐसी योजनाओं पर कुल मिलाकर करीब 1.68 लाख करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान था। झारखंड में तो महिला कैश ट्रांसफर योजना का खर्च राज्य के कुल बजट के करीब 10% तक पहुंचने की बात सामने आई है। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों के बाद दिल्ली ने भी महिलाओं के लिए मासिक कैश ट्रांसफर योजना शुरू की है।
मध्यप्रदेश में लाड़ली बहना का बजट लगातार बढ़ा
मध्यप्रदेश में लाड़ली बहना योजना जून 2023 में 1,000 रुपए प्रतिमाह की सहायता से शुरू हुई थी। बाद में राशि बढ़ाकर 1,250 रुपए और फिर 1,500 रुपए प्रतिमाह की गई।
2025-26 में योजना के लिए 18,669 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था, जबकि 2026-27 में यह बढ़कर 23,882 करोड़ रुपए हो गया।
राज्य का 2026-27 का कुल बजट 4.38 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा है। इस हिसाब से लाड़ली बहना पर होने वाला आवंटन राज्य के कुल बजट का करीब साढ़े पांच फीसदी बैठता है।
शिक्षा और स्वास्थ्य के मुकाबले कितना खर्च?
योजना के खर्च को अगर दूसरे बड़े क्षेत्रों से तुलना करके देखें तो तस्वीर और स्पष्ट होती है।
लाड़ली बहना: 23,882 करोड़ रुपए का प्रावधान
2025-26 में शिक्षा बजट के मुकाबले: करीब 42%
2025-26 में स्वास्थ्य बजट के मुकाबले: करीब 99%
एक महिला-केंद्रित नकद सहायता योजना पर खर्च की जाने वाली राशि स्वास्थ्य क्षेत्र के कुल बजट के लगभग बराबर पहुंच रही है। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि शिक्षा या स्वास्थ्य के बजट से सीधे पैसा काटकर लाड़ली बहना में लगाया जा रहा है। तुलना केवल यह बताती है कि योजना का आकार राज्य के इन महत्वपूर्ण क्षेत्रों के बजट की तुलना में कितना बड़ा हो चुका है।
बजट बढ़ा, लेकिन लाभार्थियों की संख्या में कमी
योजना के खर्च में बढ़ोतरी के साथ लाभार्थियों की संख्या में कमी का आंकड़ा भी सामने आया है। पिछले ढाई वर्षों में साढ़े पांच लाख से ज्यादा महिलाओं के नाम योजना से हटाए गए हैं।
इसके पीछे अलग-अलग कारण बताए गए हैं। कुछ महिलाएं निर्धारित उम्र सीमा पार कर गईं, कुछ की ई-केवाईसी पूरी नहीं हुई और कुछ ने स्वयं योजना का लाभ छोड़ दिया। इंदौर जिले में ही 19 हजार से ज्यादा नाम हटाए जाने की जानकारी सामने आई है।
इसके बावजूद योजना में नए पंजीयन लंबे समय से बंद हैं। ऐसे में उन महिलाओं को लेकर भी सवाल उठता है जो योजना शुरू होने के समय पात्रता पूरी नहीं कर पाई थीं और बाद में पात्र हुईं।
छत्तीसगढ़ में भी बढ़ा महिला योजनाओं का दायरा
छत्तीसगढ़ में महतारी वंदन योजना मार्च 2024 में शुरू हुई। इसके तहत पात्र महिलाओं को हर महीने 1,000 रुपए दिए जाते हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस योजना पर होने वाला खर्च राज्य के कुल बजट का करीब 3.34%, शिक्षा बजट का 21.40% और स्वास्थ्य बजट का करीब 60.40% है।
वहीं, पात्रता की जांच के दौरान छत्तीसगढ़ में करीब 1.55 लाख महिलाओं के नाम लाभार्थी सूची से हटाए जाने की जानकारी सरकार की ओर से विधानसभा में दी गई।
देशभर में योजनाओं पर 1.68 लाख करोड़ का बोझ
महिलाओं को सीधे नकद सहायता देने वाली योजनाओं का विस्तार केवल मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है। 2025-26 में 12 राज्यों को मिलाकर इन योजनाओं पर करीब 1.68 लाख करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान था।
राज्यों के सामने चुनौती यह है कि उनके पास राजस्व बढ़ाने के विकल्प सीमित हैं। वहीं वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान जैसे खर्च पहले से ही बजट का बड़ा हिस्सा लेते हैं।
ऐसे में नई बड़ी कल्याणकारी योजनाओं का स्थायी खर्च राज्यों की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ा सकता है।
महाराष्ट्र में अपात्र लाभार्थियों का मामला
महाराष्ट्र की लाड़की बहिन योजना में पात्रता जांच के दौरान बड़ी संख्या में लाभार्थियों के अपात्र पाए जाने का मामला भी सामने आया। जांच में करीब 92 लाख महिलाएं अपात्र पाई गईं और रिपोर्ट के मुताबिक करीब 14 हजार करोड़ रुपए पहले ही उनके खातों में जा चुके थे।
यह मामला ऐसी योजनाओं में पात्रता जांच और सरकारी धन की निगरानी की अहमियत को सामने लाता है। हालांकि, इसका दूसरा पहलू भी है। EAC-PM की एक स्टडी के मुताबिक महाराष्ट्र की योजना से महिलाओं के बैंक बैलेंस में औसतन करीब 84% की वृद्धि हुई। यानी प्रत्यक्ष नकद सहायता का आर्थिक असर लाभार्थियों तक पहुंचने के रूप में भी दिखाई देता है।
समर्थकों का तर्क: महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ी
महिला कैश ट्रांसफर योजनाओं के समर्थकों का कहना है कि पैसा सीधे महिलाओं के खाते में पहुंचने से उनकी आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ती है। महिलाएं इस राशि का इस्तेमाल घरेलू जरूरतों, बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और बचत में कर रही हैं। ऐसी योजनाएं उन महिलाओं के लिए तत्काल आर्थिक सहारा भी बनती हैं जिनके पास नियमित आय का स्रोत नहीं है।
आलोचकों की चिंता: क्या यह स्थायी समाधान है?
आलोचकों का तर्क है कि नियमित नकद सहायता महिलाओं की आर्थिक समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। उनके मुताबिक रोजगार, कौशल विकास, महिला श्रम भागीदारी और स्वरोजगार के अवसर बढ़ाने पर भी उतना ही ध्यान दिया जाना चाहिए।
दूसरी बड़ी चिंता राज्यों की वित्तीय क्षमता को लेकर है। यदि किसी योजना का खर्च लगातार बढ़ता है, तो सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि इसका असर शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और दूसरी जरूरी सेवाओं के आवंटन पर न पड़े।
चुनावी वादे और आर्थिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन
महिला कैश ट्रांसफर योजनाओं को लेकर राजनीतिक बहस भी लगातार तेज हुई है। सरकारें इन्हें महिला सशक्तीकरण और सामाजिक सुरक्षा का माध्यम बताती हैं, जबकि विपक्ष कई बार इन्हें चुनावी लाभ से जोड़कर देखता है।
लेकिन असली सवाल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे का है। क्या राज्य लंबे समय तक ऐसी योजनाओं का वित्तीय बोझ उठाते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास पर पर्याप्त खर्च बनाए रख सकते हैं?
आगे क्या देखना होगा?
आने वाले बजट में तीन आंकड़े खास तौर पर महत्वपूर्ण होंगे। लाड़ली बहना का वास्तविक खर्च कितना बढ़ता है?
शिक्षा और स्वास्थ्य के बजट में कितनी बढ़ोतरी होती है? राज्य इस खर्च को राजस्व से पूरा करता है या कर्ज का सहारा बढ़ता है?
महिला कल्याण योजनाओं का लाभ सीधे परिवारों तक पहुंच रहा है, यह इन योजनाओं का महत्वपूर्ण सकारात्मक पक्ष है। लेकिन लंबे समय में इनकी सफलता सिर्फ लाभार्थियों की संख्या से नहीं, बल्कि महिलाओं की आय, रोजगार, आर्थिक आत्मनिर्भरता और राज्य की वित्तीय स्थिरता से भी मापी जाएगी।
सबसे बड़ा सवाल
लाड़ली बहना जैसी योजनाएं महिलाओं को तत्काल आर्थिक राहत दे रही हैं, लेकिन यदि इनका बजट लगातार बढ़ता रहा तो सरकार के सामने एक कठिन संतुलन कायम रखना होगा। महिला कल्याण पर खर्च बढ़े, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास के लिए जरूरी संसाधन भी कम न हों। यही आने वाले वर्षों में मध्यप्रदेश की बजट नीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी।
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