परीक्षा फीस के नाम पर लिए रुपए लौटाए: बीच सत्र में दो बच्चों को निकाला; समझौते से शिकायत खत्म कराने के आरोप
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
पांचवीं की परीक्षा फीस के नाम पर 1850 रुपए लेने की शिकायत के बाद दो बच्चों को बीच सत्र में स्कूल से निकालने के मामले में अब सिटी पब्लिक स्कूल, नगीन नगर की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। बच्चों के पिता हीरालाल विश्वकर्मा ने कलेक्टर शिवम वर्मा की जनसुनवाई में शिकायत की थी।
आरोप है कि स्कूल संचालक विजय शर्मा के खिलाफ जांच और कार्रवाई करने के बजाय राशि लौटाकर समझौता करा दिया गया और दोनों बच्चों को दूसरे स्कूलों में दाखिला दिलवा दिया गया। अब मांग उठ रही है कि स्कूल की फीस वसूली, मान्यता, प्रवेश प्रक्रिया और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी फाइलें खुलें और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो।
हीरालाल विश्वकर्मा के अनुसार, उनकी बेटी तन्वी कक्षा पांचवीं में पढ़ती थी, जबकि बेटा लव भी इसी स्कूल में अध्ययनरत था। दोनों बच्चे पहले गुरुकुल स्कूल में पढ़ते थे।
जून में स्कूल की शिक्षिका हेमलता विश्वकर्मा, मोहन रजक और अन्य कर्मचारी घर पर सर्वे करने पहुंचे थे। उनके कहने पर बच्चों का स्कूल बदला गया और प्रवेश के दौरान 1100-1100 रुपए जमा कराए गए।
परिवार का आरोप है कि तन्वी की पांचवीं की परीक्षा का फॉर्म भरने के नाम पर 1850 रुपए अतिरिक्त लिए गए। इस राशि पर आपत्ति जताने के बाद 23 सितंबर 2026 को दोनों बच्चों को स्कूल से निकालकर घर भेज दिया गया। इससे बीच सत्र में उनकी पढ़ाई प्रभावित हुई।
पिता ने सीएम हेल्पलाइन 181 पर शिकायत दर्ज कराई। उनका आरोप है कि विपिन नामक कर्मचारी ने उन्हें चाय की टपरी पर बुलाकर 1850 रुपए वापस दिलाने और समझौता करने की बात कही। इसके बाद मामला कलेक्टर शिवम वर्मा की जनसुनवाई तक पहुंचा।
कलेक्टर ने जिला शिक्षा अधिकारी शौर्य मल्होत्रा को कार्रवाई के निर्देश दिए। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसके बाद भी मामले में जिम्मेदारी तय करने के बजाय समझौते का रास्ता अपनाया गया।
स्कूल प्रबंधन की ओर से बच्चों की टीसी जमा नहीं होने का मुद्दा उठाया गया। पिता का कहना था कि जून से सितंबर तक दोनों बच्चे नियमित स्कूल आते रहे, लेकिन इस दौरान टीसी को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई गई। उनका आरोप है कि फीस की शिकायत के बाद टीसी का मुद्दा उठाया गया।
शिकायतकर्ता के मुताबिक, अंततः जमा राशि का चेक देकर समझौता करा दिया गया और दोनों बच्चों को दूसरे स्कूलों में दाखिला दिलवा दिया गया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पैसे लौटाने से स्कूल संचालक की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है? यदि फीस वसूली और बच्चों को बीच सत्र में स्कूल से निकालने के आरोप सही हैं, तो उनकी जांच कर जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की गई?
स्कूल की फाइलें खुलें, इन बिंदुओं पर हो जांच
स्कूल में पांचवीं की परीक्षा फीस के नाम पर ली गई 1850 रुपए की राशि किस नियम के तहत वसूली गई, इसकी जांच होनी चाहिए। स्कूल के फीस रिकॉर्ड और रसीदों की जांच कर यह पता लगाया जाए कि कितने विद्यार्थियों से कितनी राशि ली गई। प्रवेश के समय टीसी संबंधी नियमों का पालन हुआ या नहीं, बच्चों को स्कूल से निकालने का निर्णय किस आधार पर लिया गया और इसकी जिम्मेदारी किसकी थी, यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।
इसके साथ ही स्कूल की मान्यता, संचालन की अनुमति, भवन संबंधी दस्तावेज, अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र और अन्य जरूरी व्यवस्थाओं का भौतिक निरीक्षण कराया जाए। शिकायतकर्ता ने गार्डन, पार्किंग और फायर सेफ्टी की व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए हैं। इन दावों की जांच कर नियमों के पालन की स्थिति सार्वजनिक होना चाहिए।
सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत के निपटारे की प्रक्रिया की भी जांच जरूरी है। यदि शिकायतकर्ता पर समझौते का दबाव बनाने या बिना उचित जांच के शिकायत बंद कराने की पुष्टि होती है, तो संबंधित कर्मचारी की भूमिका और जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए। अब सवाल शिक्षा विभाग की जवाबदेही का है।
क्या पूरे मामले की जांच केवल 1850 रुपए वापस कराने तक सीमित रही, या स्कूल की कार्यप्रणाली की भी पड़ताल की गई? जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग को शिकायत से जुड़ी पूरी फाइल तलब कर जांच की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
आरोप सही पाए जाने पर नियमानुसार स्कूल प्रबंधन और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। बच्चों को दूसरे स्कूल में दाखिला दिलाना राहत जरूर है, लेकिन इससे फीस वसूली और बीच सत्र में स्कूल से निकालने के आरोपों की जांच का सवाल खत्म नहीं होता।
सिटी पब्लिक स्कूल के प्रिंसिपल विजय शर्मा से जब इस मामले में उनका पक्ष जानना चाहा तो उन्होंने बताया कि "हमने बच्चों को स्कूल से नहीं निकाला है, परिजन खुद उन्हें पुराने स्कूल में ले गए और हमने उनकी पूरी फीस वापस कर दी है।
हम गरीब बच्चों को छूट देकर आधी फीस पर पढ़ाते हैं। हमारी तरफ से कोई विवाद नहीं था। हालांकि, कक्षा 5वीं के बच्चों से 1850 रुपए परीक्षा फीस के नाम पर अवैध वसूली और अन्य बच्चों से जुड़े सवाल पर प्राचार्य ने कोई जवाब नहीं दिया और मोबाइल काट दिया।
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