रंगनाथ कर्णिक ने शुरू की रंगपंचमी गिरी ने घेरकर रंग डाले तो बन गई गेर
KHULASA FIRST
संवाददाता

राजेंद्र खंडेलवाल 98931-90781 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
8 मार्च रंगपंचमी पर इंदौर में रंगारंग गेरें निकलेंगी और आसमान में रंगों का इंद्रधनुष बन जाएगा। विश्व धरोहर में शामिल होने के लिए प्रयासरत इंदौर की गेरों की शुरुआत कब और कैसे हुई, ये जानना दिलचस्प होगा।
गेरों का इंतजार लोगों को वर्षभर रहता है, जिसमें उनका तन और मन रंगों से भर जाता है। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक गेरों में शामिल होते हैं।
इंदौर में रंगपंचमी मनाने की शुरुआत 1960 के पूर्व मल्हारगंज क्षेत्र के पहलवान रंगनाथ कर्णिक ने की थी। वरिष्ठ भाजपा नेता सत्यनारायण सत्तन बताते हैं कि रंगनाथ कर्णिक ने जब देखा कि होली के बाद पंचमी पर भी रंग डाले जाते हैं तो उन्होंने इसे व्यवस्थित रूप देकर रंगपंचमी मनाने की शुरुआत की।
ये त्योहार उनके नाम से भी मेल खाता था। शुरुआत में इस दिन सिर्फ रंग लगाए जाते थे और होली जैसा उल्लास ही रहता था। 1965 के आसपास टोरी कॉर्नर क्षेत्र के नेता बाबूलाल गिरी ने इसे और अधिक व्यवस्थित रूप देने के लिए एक बड़ा कड़ाव रखा, जिसमें रंगों से लोगों को भिगोया जाने लगा।
कुछ वर्षों बाद गिरी और उनके कुछ साथियों ने लोगों को घेरकर यहां लाकर रंग डालना शुरू किया। ये परंपरा कई वर्षों तक चली। लोगों को होली के बाद रंगपंचमी का भी इंतजार रहने लगा। ये इंदौर के उत्सवी होने की प्रमुख पहचान थी। उत्सवप्रिय शहर को रंगपंचमी का ये आयोजन भाने लगा और फिर इसे और व्यवस्थित किया गया।
कुछ लोग इस दिन रंग लेकर निकलने लगे और लोगों को घेरकर रंग लगाने लगे। बाद में इसने विस्तृत रूप ले लिया। बैलगाड़ी में रंगों के डिब्बे रखकर निकला जाने लगा और लोगों को घेरकर उन पर रंग डाला जाने लगा। स्थिति ये हो गई कि होली के बाद की पंचमी पर लोग खुद टोरी कॉर्नर से लेकर राजवाड़ा तक खड़े हो जाते, ताकि इस पारंपरिक रंगों का आनंद ले सकें।
बाद में ये परंपरा और भी आगे बढ़ी, जब जुलूस के रूप में लोगों को रंगों से सराबोर किया जाने लगा। यही ‘घेर’ शब्द ‘गेर’ बन गया और अब इसका विस्तृत रूप पिछले कुछ वर्षों में नजर आने लगा। अब तो शहर के मध्य क्षेत्र से ही चार से पांच गेर हर वर्ष निकलती हैं। अन्य इलाकों से भी गेरें निकलने लगी हैं। कुल मिलाकर ये कि पूरा शहर ही रंगपंचमी पर भी रंगों में सराबोर हो जाने को आतुर रहता है।
यूनेस्को में शामिल करने के प्रयास
इंदौर की गेर को यूनेस्को संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन में अभी शामिल नहीं किया गया है। यूनेस्को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हर साल किसी एक आयोजन को धरोहर के रूप में शामिल करता है। इंदौर की गेर को इसमें शामिल करने के लिए पिछले कई साल से प्रयास हो रहे हैं, लेकिन केंद्र सरकार का कहना है कि इंदौर में 75 सालों से निकल रही गेर अभी तक राष्ट्रीय धरोहर के रूप में ही चिह्नित नहीं की गई है।
यूनेस्को में किसी धरोहर के शामिल होने से उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलती है। इंदौर की गेर में अभी देशभर से हर साल करीब 7 लाख लोग आते हैं। इसका लाइव प्रसारण भी कई जगह देखा जाता है। यूनेस्को में शामिल होने से इंदौर ही नहीं आसपास के पर्यटन में इजाफा होगा।
रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। ऐसा होने पर गेर को और भव्य रूप मिल सकता है। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की अपर सचिव मोनिका राय ने पिछले वर्ष कहा था कि इंदौर की गेर को राष्ट्रीय धरोहर मानने का प्रस्ताव आया नहीं है।
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