नाले किनारे ‘राघव रेसीडेंसी’ सवालों के घेरे में: डिमार्केशन के नाम पर कार्रवाई टली; निर्माण लगभग पूरा, जांच के दावों पर उठे प्रश्न
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
राऊ तहसील के कस्बा क्षेत्र में प्रस्तावित ‘राघव रेसिडेंसी’ परियोजना विवाद के केंद्र में आ गई है। एक ओर नगर एवं ग्राम निवेश विभाग (टीएनसीपी) से वैधानिक अनुमति का दावा किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर जमीन की प्रकृति, नाले की निकटता और मौके पर किए निर्माण को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप का खुलासा किया जा चुका है। अब प्रशासनिक अधिकारियों के बयान और जमीनी हकीकत के बीच विरोधाभास ने पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला दिया है।
स्वीकृति मिली, लेकिन शर्तों का पालन नहीं
कार्यालय संयुक्त संचालक, नगर तथा ग्राम निवेश, जिला इंदौर द्वारा खसरा क्रमांक 1397/1, रकबा 0.202 हेक्टेयर पर मल्टी ड्वेलिंग यूनिट निर्माण की अनुमति दी गई थी। यह अनुमति एमएस राघव एसोसिएट्स (पार्टनर फर्म) शकुंतलाबाई, अनिल सोनी, मनीष मनोज सोनी एवं धर्मेंद्र बड़े को ‘राघव रेसीडेंसी’ नाम से दी गई। जो निगम शर्तों अनुसार नहीं मिल सकती है।
‘पहले डिमार्केशन, फिर कार्रवाई’
हरसिद्धि जोन के भवन अधिकारी वैभव देओलसे ने कहा कि बिल्डिंग और नाले के डिमार्केशन के लिए पत्र जारी किया गया है, तहसीलदार और पटवारी द्वारा नाप-जोख कराई जाएगी। एमएसओ (मार्जिन सेट ऑफ) के आधार पर कार्रवाई होगी।
अभी तक कोई प्लिंथ लेवल सर्टिफिकेट जारी नहीं किया गया। सरकारी जमीन पर निर्माण के आरोपों की भी जांच की जाएगी। हालांकि, उनका यह भी कहना रहा कि स्ट्रक्चर पहले ही बन चुका है, अब डिमार्केशन के बाद आगे की कार्रवाई होगी।
नामांतरण और स्वीकृति पर भी उठे सवाल
वर्ष 2019 में हक त्याग पत्र के आधार पर नामांतरण किया गया, लेकिन सवाल क्या नाले/नदी से जुड़ी जमीन का नामांतरण वैध था? टीएनसीपी ने किस आधार पर अनुमति दी? क्या वास्तविक स्थिति छुपाकर नक्शा पास कराया गया?
बुकिंग चालू, खरीदारों के लिए खतरा
खुलासा फर्स्ट ने जनवरी माह में प्रकाशित खबर में खुलासा कर दिया था कि फ्लैटों की बुकिंग शुरू कर दी गई है, जिसमें 2 बीएचके (1020 वर्गफीट) लगभग 55 लाख रुपये और 3 बीएचके फ्लैट्स भी उपलब्ध है, जो प्रति वर्गफीट दर करीब 5500 रुपए है, जिसमें कई फ्लैट्स की बुकिंग हो चुकी है। चिंता की बात यह है कि सभी विभागों से मंजूरी और बैंक लोन उपलब्ध जैसे दावे किए जा रहे हैं। यदि निर्माण विवादित निकला, तो सबसे बड़ा नुकसान आम खरीदारों को होगा।
भविष्य में बड़े हादसे होने की आशंका
नाले के पास निर्माण के कारण बारिश में जलभराव और नींव कमजोर होने का खतरा है। सपास की कॉलोनियों के रास्ते बाधित होंगे। संभावित संरचनात्मक से दुर्घटना का जोखिम बढ़ा है।
राजनीतिक संरक्षण की भी चर्चा- मामले में यह भी खुलासा हुआ है कि संबंधित फर्म से जुड़ी एक सदस्य पूर्व में कांग्रेस पार्षद रह चुकी हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या राजनीतिक प्रभाव के कारण कार्रवाई टल रही है? क्या प्रशासनिक चुप्पी इसके पीछे की वजह है?
नियमों के तहत दी गई अनुमति
निर्माण के लिए नियमों के तहत दी गई अनुमति के अनुसार भूमि इंदौर विकास योजना 2021 में रेसिडेंशियल यूज में शामिल है। 28 जुलाई 2022 को आवेदन, 27 अगस्त 2022 को निरीक्षण किया। मध्य प्रदेश नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम 1973 की धारा 30(1)(ख) के तहत स्वीकृति दी गई। अधिकतम ऊंचाई 12.50 मीटर निर्धारित है। पार्किंग, हरित क्षेत्र, रेन वॉटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य है। नाले/जल स्रोत से निर्धारित दूरी का पालन जरूरी है। ऐसे में स्पष्ट है कि अनुमति सशर्त दी गई थी, यानी नियमों का पालन अनिवार्य था, लेकिन मौके पर नियमों को ताक पर रख कार्य किया जा रहा है।
मौके की हकीकत: नियमों से परे खड़ा निर्माण
शिकायतों और निरीक्षण में खुलासा हुआ है कि भवन का स्ट्रक्चर लगभग आठ महीने पहले ही खड़ा हो चुका है। वर्तमान में रंगाई-पुताई और फिनिशिंग कार्य जारी है। इस दौरान सेटबैक, ऊंचाई और कवर्ड एरिया में संभावित उल्लंघन किया गया। निर्माण स्थल नाले से सटा हुआ, जिससे नियमों के उल्लंघन की आशंका है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब शर्तों का पालन अनिवार्य था, तो यह निर्माण बिना पूर्ण जांच के कैसे आगे बढ़ता गया?
सरकारी जमीन और नाले पर कब्जे का संदेह
मामले में यह भी आरोप है कि भूमि का कुछ हिस्सा सरकारी श्रेणी में हो सकता है। नाले के किनारे की जमीन को मलबा डालकर समतल किया गया। एनजीटी नियमों के अनुसार नाले से 30 मीटर के दायरे में निर्माण प्रतिबंधित है। यदि यह सही है, तो यह सिर्फ नियम उल्लंघन नहीं, बल्कि गंभीर पर्यावरणीय और कानूनी अपराध हो सकता है।
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