इंदौर मेट्रो विकास की रफ्तार या जल्दबाजी का महंगा प्रयोग?: 12 हजार करोड़ की लागत वाली परियोजना पर उठे सवाल
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट…इंदौर।
शहर में बन रही मेट्रो परियोजना को लेकर बहस तेज हो गई है। करीब 12 हजार करोड़ रुपए की लागत वाली यह परियोजना जहां एक ओर आधुनिक शहर और भविष्य के ट्रांसपोर्ट सिस्टम का प्रतीक बताई जा रही है, वहीं दूसरी ओर इसे बिना पर्याप्त तैयारी और ट्रैफिक प्लानिंग के शुरू किया गया ‘महंगा प्रयोग’ भी कहा जा रहा है।
विशेषज्ञों और शहरी योजनाकारों का तर्क है कि इंदौर में मेट्रो शुरू करने से पहले शहर की मूलभूत यातायात समस्याओं का समाधान किया जाना चाहिए था। मास्टर प्लान के मुख्य मार्गों का निर्माण, फ्लाईओवर, सर्विस रोड, ट्रैफिक मैनेजमेंट, रिंग रोड और बीआरटीएस सुधार जैसे काम अधूरे रहते हुए सीधे मेट्रो परियोजना शुरू कर दी गई। उनका कहना है कि यदि इन्हीं पैसों का आधा हिस्सा भी सड़क नेटवर्क और सार्वजनिक परिवहन सुधार पर खर्च किया जाता तो आने वाले 30-40 वर्षों तक शहर की ट्रैफिक समस्या काफी हद तक नियंत्रित की जा सकती थी।
यह भी दावा किया गया है कि मेट्रो की सफलता के लिए शहर का जनसंख्या घनत्व, यात्रियों की संख्या और कमर्शियल गतिविधियां बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। दिल्ली जैसे महानगरों में मेट्रो तब शुरू हुई, जब वहां की आबादी एक करोड़ के आसपास पहुंच चुकी थी, जबकि इंदौर की आबादी अभी लगभग 20 लाख के करीब बताई जा रही है। आलोचकों के अनुसार इंदौर में अभी इतनी कमर्शियल डिमांड और यात्री दबाव नहीं है कि मेट्रो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सके।
लगभग 400 करोड़ रुपए प्रति किमी लागत
मेट्रो परियोजना की लागत को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार इंदौर मेट्रो की लंबाई लगभग 31.5 से 33.5 किलोमीटर है और प्रति किलोमीटर लागत 360 से 400 करोड़ रुपए तक पहुंच रही है। साथ ही संचालन में बिजली, स्टाफ, रखरखाव और सुरक्षा पर भारी खर्च आने की आशंका जताई गई है। नागपुर, लखनऊ और कोच्चिं जैसे शहरों का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि कई मेट्रो परियोजनाएं टिकट आय से अपना खर्च तक नहीं निकाल पा रहीं। निर्माण कार्य के दौरान शहरवासियों को ट्रैफिक जाम, धूल, शोर और व्यापारिक नुकसान जैसी समस्याओं का भी सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा भूमि अधिग्रहण, बिजली खपत और शहर की सुंदरता पर असर जैसे मुद्दों पर भी गंभीर चिंता जताई गई।
समाधान का सुझाव भी...
रिपोर्ट में केवल मेट्रो की आलोचना ही नहीं की गई, बल्कि यह सुझाव भी दिया गया है कि यूरोपीय शहरों की तर्ज पर मेट्रो और ट्रॉम के मिश्रित मॉडल को इंदौर जैसे मध्यम आकार के शहरों के लिए अधिक उपयुक्त है। ट्रॉम प्रणाली को कम लागत, कम बिजली खपत और कम भूमि अधिग्रहण वाला विकल्प बताते हुए एबी रोड, एमजी रोड, राजवाड़ा, एयरपोर्ट रोड और कैट रोड जैसे क्षेत्रों में ट्रॉम संचालन की संभावनाएं सुझाई गई हैं। दूसरी ओर, यह भी स्वीकार किया गया है कि भविष्य में बढ़ती आबादी, सुपर कॉरिडोर और आईटी सेक्टर के विस्तार को देखते हुए इंदौर को आधुनिक सार्वजनिक परिवहन की आवश्यकता पड़ेगी। ऐसे में मेट्रो को पूरी तरह नकारने के बजाय दीर्घकालीन शहरी विकास, ट्रैफिक दबाव और आर्थिक व्यवहार्यता को ध्यान में रखकर संतुलित मॉडल अपनाना चाहिए।
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