नाड़ा खींचना और ब्रेस्ट पकड़ना रेप की कोशिश: किस शीर्ष अदालत ने इस कोर्ट का फैसला बदल दिया
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, प्रयागराज।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी लड़की के पायजामे का नाड़ा खींचना और ब्रेस्ट पकड़ना ‘रेप की कोशिश’ के अंतर्गत आता है। इसके साथ ही कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें इसे केवल ‘रेप की तैयारी’ बताया गया था।
सुप्रीम कोर्ट का बयान
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट ने आपराधिक कानून के सिद्धांतों का गलत इस्तेमाल किया। कोर्ट ने टिप्पणी की:“हम हाईकोर्ट की इस बात से सहमत नहीं हैं कि आरोप केवल तैयारी तक सीमित हैं। आरोपियों की हरकत साफ तौर पर रेप की कोशिश की ओर इशारा करती है। पहली नजर में शिकायतकर्ता और अभियोजन ने रेप की कोशिश का मामला बनाया है।”
हाईकोर्ट का विवादित फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 17 मार्च, 2025 को आदेश दिया था कि लड़की के निजी अंग को पकड़ना, पायजामे का नाड़ा तोड़ना और उसे जबरन पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश ‘अटेम्प्ट टू रेप’ में नहीं आता।
हुआ था भारी विवाद
कोर्ट ने आरोपी आकाश और पवन पर लगे ‘अटेम्प्ट टू रेप’ के आरोप हटाकर उन्हें यौन उत्पीड़न की अन्य धाराओं के तहत मुकदमा चलाने का निर्देश दिया था। इस फैसले के बाद कानून विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों में भारी विवाद हुआ।
मामला क्या था?
2021 में कासगंज में 14 साल की लड़की के साथ तीन युवकों ने छेड़खानी की। पवन और आकाश ने लड़की को बाइक पर बैठाया और रास्ते में उसके प्राइवेट पार्ट को छुआ। आकाश ने पुलिया के नीचे खींचते हुए पायजामे की डोरी तोड़ दी।
फरार हो गए थे आरोपी
इस दौरान ट्रैक्टर पर आए कुछ लोगों को धमकाकर आरोपी फरार हो गए। पीड़िता की मां ने मामले की शिकायत की, जिसके आधार पर पवन और आकाश के खिलाफ IPC धारा 376, 354, 354B और POCSO एक्ट की धारा 18 के तहत मामला दर्ज किया गया। आरोपी अशोक पर IPC की धारा 504 और 506 के तहत केस दर्ज हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाई
हाईकोर्ट के फैसले पर 25 मार्च, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया और रोक लगाई। तत्कालीन CJI बी.आर. गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट की टिप्पणियां असंवेदनशील और अमानवीय हैं।
केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा
कोर्ट ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि अदालतों को फैसले लिखते समय और सुनवाई के दौरान ऐसी भाषा से बचना चाहिए जो पीड़िता को डर या दबाव महसूस कराए।
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