फर्जी जाति प्रमाण पत्र पर किस राज्य में सियासत गरम: कैसे बन रहे अधिकारी; इन शीर्ष पदों पर भी अब उठ रहे सवाल
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
मध्यप्रदेश में फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी नौकरी पाने का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। विधानसभा में मनावर विधायक डॉ. हीरालाल अलावा ने इस मामले को उठाते हुए एसडीएम, एसडीओपी और जेल अधीक्षक स्तर के अधिकारियों के जाति प्रमाण पत्रों की जांच की मांग की है। विधायक ने आरोप लगाया कि कुछ अधिकारियों ने 1950 के निर्धारित मापदंडों का पालन किए बिना अनुसूचित जाति और जनजाति (SC/ST) के प्रमाण पत्र बनवाकर नौकरी हासिल की है। उन्होंने इन मामलों की जांच छानबीन समिति से कराने की मांग की है।
इन अधिकारियों के प्रमाण पत्र पर सवाल
विधानसभा में उठाए गए सवाल में इंदौर में एसडीएम रह चुके और वर्तमान में झाबुआ में पदस्थ संयुक्त कलेक्टर अक्षय मरकाम, भोपाल सेंट्रल जेल के अधीक्षक राकेश कुमार मांगरे और धार जिले के धामनोद में एसपी कार्यालय में पदस्थ एसडीओपी मोनिका सिंह के जाति प्रमाण पत्रों को लेकर जानकारी मांगी गई है।
सीएम ने दिया जवाब
विधायक के सवाल पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जवाब देते हुए कहा कि जाति प्रमाण पत्रों की जांच संबंधित विभागों की छानबीन समितियों द्वारा की जाती है। इसके लिए एसटी विभाग, एससी कल्याण विभाग और ओबीसी व अल्पसंख्यक कल्याण विभाग की अलग-अलग समितियां बनी हुई हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि संबंधित अधिकारियों के प्रमाण पत्रों की जानकारी एकत्र की जा रही है।
हाईकोर्ट में भी उठा मामला
फर्जी जाति प्रमाण पत्र का मुद्दा ग्वालियर हाईकोर्ट में भी पहुंच चुका है। एक सामाजिक कार्यकर्ता और आरटीआई एक्टिविस्ट ने याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि 11 आरक्षकों ने अनुसूचित जाति/जनजाति के फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी हासिल की है। इस मामले में हाईकोर्ट ने जांच के आदेश दिए हैं।
STF की जांच में भी खुलासा
साल 2025 में एसटीएफ की जांच में भी 25 अधिकारियों और कर्मचारियों के फर्जी एससी-एसटी प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी पाने का मामला सामने आया था। ये प्रमाण पत्र ग्वालियर, भिंड और मुरैना जिलों से बनाए गए बताए गए थे। जांच में सामने आया कि ऐसे अधिकारी राजस्व, पुलिस, मेडिकल और पीडब्ल्यूडी जैसे विभागों में पदस्थ हैं और इंदौर, शाजापुर, ग्वालियर, विदिशा तथा नर्मदापुरम सहित कई जिलों में कार्यरत हैं।
एसडीएम मरकाम का मामला चर्चित
इन मामलों में संयुक्त कलेक्टर अक्षय मरकाम का नाम पहले भी चर्चा में रहा है। आरोप है कि उनके पिता नागेश्वर गुप्ता को इंदौर के राऊ क्षेत्र में भुंजिया जनजाति का मानते हुए प्रमाण पत्र जारी किया गया था। बताया जाता है कि अक्षय गुप्ता ने 2 अगस्त 2013 को नाम परिवर्तन की अधिसूचना जारी कराकर अपना नाम अक्षय मरकाम कर लिया था। इसके बाद उनका चयन पहले डीएसपी और फिर 2015 की राज्य सेवा परीक्षा में डिप्टी कलेक्टर पद पर एसटी वर्ग से हुआ था।
क्या है 1950 का क्राइटेरिया
मध्यप्रदेश में अनुसूचित जाति और जनजाति के जाति प्रमाण पत्र के लिए यह जरूरी माना जाता है कि आवेदक या उसके पूर्वज 1950 या उससे पहले से प्रदेश के स्थायी निवासी रहे हों।
यदि उस अवधि के दस्तावेज उपलब्ध नहीं होते, तो राजस्व अधिकारी जांच के आधार पर जाति की पुष्टि कर सकते हैं।
विधायक बोले-आदिवासियों का हक छीना जा रहा
विधायक डॉ. हीरालाल अलावा का कहना है कि फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाकर कुछ लोग आदिवासी समुदाय का हक छीन रहे हैं। कई शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं हो रही है, जबकि यह गंभीर और आपराधिक मामला है। उन्होंने कहा कि जिन अधिकारियों पर संदेह है, उनके प्रमाण पत्रों की छानबीन समिति से जांच कराई जानी चाहिए और यदि गड़बड़ी मिलती है तो नौकरी से हटाकर उनके खिलाफ मामला दर्ज किया जाना चाहिए।
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