पुलिस बिना सीमांकन, हमला हुआ, जिम्मेदार कौन: जमीन की जादूगरी में फंसा प्रशासन
KHULASA FIRST
संवाददाता

अंकित शाह 99264-99912 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मल्हारगंज तहसील के ग्राम टिगरिया बादशाह में सीमांकन के दौरान राजस्व अमले पर हुए जानलेवा हमले ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जिस भूमि पर वर्षों से कब्जे और विवाद की स्थिति बनी हुई थी, वहां न तो इंदौर विकास प्राधिकरण (आईडीए) के अधिकारी मौजूद थे और न ही पर्याप्त पुलिस बल। इसके बावजूद राजस्व टीम को सीमांकन के लिए भेज दिया गया। नतीजा यह हुआ कि सीमांकन शुरू होने से पहले ही विवाद भड़क गया और सरकारी कर्मचारी मारपीट तथा अभद्रता का शिकार हो गए।
सुरक्षा को किया नजरअंदाज?- सूत्रों के अनुसार नायब तहसीलदार ने कथित रूप से ‘जल्दी कार्रवाई’ करने का दबाव था। जबकि अधिकारियों को पहले से पता था कि जमीन विवादित है और उस पर कब्जाधारियों का विरोध है।
इसके बावजूद पुलिस सुरक्षा और आईडीए अधिकारियों की मौजूदगी सुनिश्चित किए बिना सीमांकन दल को मौके पर भेज दिया गया। सवाल यह है कि जब विवाद की जानकारी थी तो राजस्व अमले को जोखिम में क्यों डाला गया?
आईडीए की करोड़ों की जमीन, लेकिन कब्जा छुड़ाने में नाकामी- मामला आईडीए की योजना क्रमांक 151 और 169-बी से जुड़ा है। वर्ष 2022 के दस्तावेजों में स्वयं आईडीए यह स्वीकार कर चुका है कि भूमि पर कब्जा है और विकास कार्यों में बाधा आ रही है।
इसके बावजूद चार साल बाद भी प्राधिकरण जमीन का कब्जा हासिल नहीं कर पाया। विडंबना यह रही कि सीमांकन के दिन आईडीए का कोई जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा, जबकि पूरी कार्रवाई उसी की जमीन को लेकर हो रही थी।
मशीन लगी नहीं, हमला शुरू हो गया
राजस्व अमले के अनुसार सीमांकन की प्रक्रिया शुरू भी नहीं हुई थी कि मौके पर मौजूद लोगों ने विरोध शुरू कर दिया। इसके बाद मोटरसाइकिल से आए युवकों ने नपती मशीन गिरा दी, कर्मचारियों से मारपीट की और महिला आरआई नानबाई रावत के साथ अभद्रता व गाली-गलौज की। सरकारी कर्मचारियों को अपनी जान बचाकर वहां से निकलना पड़ा।
पुलिस बल था तो हमलावर भाग कैसे गए?
एफआईआर में उल्लेख है कि पुलिस को पहले ही सूचना दे दी गई थी और सुरक्षा के लिए पत्राचार भी किया गया था। यदि पुलिस बल उपलब्ध था तो फिर हमलावर आसानी से मौके से फरार कैसे हो गए? क्या उन्हें रोकने या पकड़ने का प्रयास किया गया? इस प्रश्न का जवाब न पुलिस दे पा रही है और न प्रशासन।
पालाखेड़ी से नहीं लिया सबक
करीब एक वर्ष पहले पालाखेड़ी क्षेत्र में आईएएस अधिकारी की भी इसी प्रकार के भूमि विवाद में प्रशासन को भारी पुलिस बल के साथ कार्रवाई करनी पड़ी थी। तब सीमांकन तो हो गया, लेकिन अगले ही दिन कब्जाधारियों ने निशान उखाड़कर दोबारा कब्जा कर लिया। इससे स्पष्ट है कि केवल सीमांकन कर देना समाधान नहीं है। प्रशासन आज तक कब्जा मुक्त कराने की स्थायी व्यवस्था नहीं बना पाया है।
करोड़ों की जमीन को लेकर वर्षों से विवाद
मल्हारगंज तहसील और मेट्रो के पास सर्विस रोड स्थित लगभग 0.202 हेक्टेयर भूमि व्यावसायिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। क्षेत्र में जमीन की कीमत डेढ़ से दो करोड़ रुपये प्रति बीघा से अधिक बताई जा रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर इस बहुमूल्य जमीन को लेकर वर्षों से विवाद क्यों बना हुआ है और इसका लाभ किसे मिल रहा है?
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