सड़क चौड़ीकरण को लेकर लोग अधिकारियों व महापौर से नाराज: नगर निगम व राज्य सरकार की नीति-नीयत पर सवाल
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नगर निगम शहर में 23 सड़कें चौड़ीकरण की योजना पर काम कर रहा है। आठ सड़कों का काम चल रहा है और बाकी का शुरू करने की तैयारी है। महापौर पुष्यमित्र भार्गव, जनकार्य समिति के प्रभारी राजेंद्र राठौड़ और क्षेत्रीय विधायक व पार्षद सतत् प्रयासरत हैं।
निगम ने सड़क चौड़ीकरण की जद में आ रहे घर-मकान मालिकों को सड़क की बाधा बने अपने मकान तोड़ने का आदेश दिया जा चुका।
इस पर रहवासियों का कहना है कि हमारे घर-दुकान पूरी तरह से वैध हैं, जो नगर पालिका निगम से स्वीकृत मानचित्र (नक्शे) अनुसार बनाया गए हैं।
अब यदि निगम को हमारे घर-दुकान सड़क चौड़ीकरण के लिए चाहिए तो उन्हें हम से इसकी जद में आ रही जगह रिक्त करने की गुजारिश करना व सहमति लेना चाहिए।
बजाय इसके हमारे घरों को बाधा बताते हुए तोड़ने के आदेश दिए जा रहे हैं। रहवासी नगर निगम अधिकारियों व महापौर की कार्य पद्धति से नाराज हैं, फिर वह सेंट्रल लाइन तय करने की प्रक्रिया हो या मुआवजा व विस्थापन की बात।
अधिकांश रहवासियों ने नगर निगम अधिकारियों, महापौर व मुख्यमंत्री के रुख पर रोष जताते हुए नीति व नीयत पर सवाल उठाए हैं।
निगम मध्य शहरी क्षेत्र के जिंसी, शंकरगंज, कंडीलपूरा, मल्हारगंज,सुभाष मार्ग व छावनी की करीब आधा दर्जन सड़कों के चौड़ीकरण की तैयारी कर चुका।
जिंसी शंकरगंज में विधायक व महापौर के साथ 80 के बजाय 60 फीट पर सहमति होने के बाद रहवासियों ने खुद ही अपने मकान तोड़ लिए हैं।
4/6 घरों में बच्चों की एग्जाम के चलते 12 मई के बाद अपने निर्माण हटाए जाएंगे। हालांकि, बावजूद इसके पूरी तरह से वैध घर दुकान खुद अपने हाथ से तोड़ने का दर्द उनकी जुबां पर आ ही गया।
प्रभावित अधिकांश लोगों ने निगम, शासन-प्रशासन की नीति और नीयत पर सवाल उठाए हैं।
अडानी, अंबानी, रामदेव को हां और हमें ना
प्रभावितों का कहना है कि सरकार अडानी, अंबानी, रामदेव व अन्य तमाम उद्योगपतियों को मुफ्त व कौड़ियों के दाम जमीनें दे रही तो हमें क्यों नहीं दी जा सकतीं।
इधर, 23 सड़कों के लिए जिन पांच हजार घरों को तोड़ा जा रहा है, उनमें आठ हजार दुकानें भी हैं, जिनमें कम से कम 20 हजार लोग रोजगार पाते हैं।
ऐसे में 50 हजार लोग बेघर ओर बेरोजगार होंगे। प्रभावितों ने इसे सरकार की दमनकारी नीति और अन्यायपूर्ण व्यवस्था बताया है।
टीडीआर पांच गुना मिले
प्रभावितों ने निगम द्वारा मुआवजे के रूप में एफएआर, टीडीआर देने की नीति पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जिसे कोई बाजार मूल्य तो दूर सरकारी गाइडलाइंस की दर पर भी खरीदने को तैयार नहीं।
यह जो योजना है उसके माध्यम से 15/20 प्रतिशत नुकसान की भरपाई भी नहीं होगी ऐसे में हम कैसे सर्वाइव करेंगे।
वैसे भी प्रत्येक घर मकान दो से तीन मंजिला है और हर घर में 4/5 परिवार रहते हैं अतः इसी अनुपात में एफएआर, टीडीआर ही यदि देना है तो पांच गुना तक दिया जाना चाहिए।
वह भी तोड़फोड़ से पहले, ताकि आधा बेचकर उस पैसे से मकान की रिपेयरिंग व रिनोवेशन कर सके।
सुधार तक संघर्ष
जिंसी सुभाष मार्ग निवासी गोविंद शर्मा ने बताया उनका घर, दुकान कार्नर की है 12 दुकान व 12 कमरे तोड़फोड़ की जद में है, जो सबसे बड़ा नुकसान है।
10 दुकानों के टूटने पर रोजगार खत्म होकर आजीविका चलाना मुश्किल होगा, वहीं कमरे खत्म होने पर रहने की जगह का टोटा होगा।
शर्मा ने बताया कि उनके घर में तीन बेटे-बहू के तीन परिवार में 16 लोग निवास करते हैं। दो परिवार बेघर होंगे। शर्मा ने बताया कि सन् 1976 तक नकद मुआवजा दिया जाता था।
उन्होंने इसके साक्ष्य भी दिखाए। शर्मा का कहना है कि इसके बाद के कुछ वर्षों में यह नीति बदल दी गई। उन्होंने कहा केंद्र के भूमि अधिग्रहण कानून को भी नहीं माना जा रहा, जिसमें शहरी क्षेत्र में दो गुना मुआवजे का प्रावधान है।
यही नहीं सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस को भी दरकिनार किया जा रहा है। भूमि अधिग्रहण की तय प्रक्रिया अपनाएं बगैर और भवन स्वामी की सहमति लिए बगैर जबरिया संपत्ति छीनी तोड़ी जा रही है, जो अराजक स्थिति का निर्माण करने जैसा है।
शर्मा ने बताया कि उनके ही मामले में हाई कोर्ट ने अधिग्रहण की आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने व मकान मालिक की सहमति नहीं होने पर नकद (मौद्रिक) मुआवजे के अधिकार को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है लेकिन निगम न्यायालय के निर्देश मानने को भी तैयार नहीं है।
बता दें कि शर्मा विगत 10 वर्षों से मप्र सरकार व नगर पालिका निगम की नीतियों में सुधार की अपील कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने पार्षद से प्रधानमंत्री और बिल्डिंग ऑफिसर से निगम कमिश्नर, कलेक्टर, महापौर तक अपनी बात पहुंचाई और नीति में सुधार की अपील की है। शर्मा ने कहा कि उनका संघर्ष नीति व नीयत में सुधार तक जारी रहेगा।
पीएम आवास मंजूर नहीं
प्रभावितों का कहना है कि हमारे शहर मध्य के बेशकीमती घर, दुकान तोड़कर हमें प्रधानमंत्री आवास योजना के शहर से दूर सुविधा विहीन फ्लैट में रहने को कहा जा रहा है।
ऐसी जगह जहां असामाजिक तत्वों का डेरा लगा रहता है व तरह-तरह की अनैतिक गतिविधियां होने की जानकारी आए दिन मीडिया के माध्यम से मिलती रहती है, हम भला वहां कैसे रह सकते हैं।
प्रभावितों का कहना है कि शहर की सभी विधानसभा ओर लगभग हर वार्ड में नजूल, नगर निगम, आईडीए या शिक्षा विभाग की जमीनें रिक्त पड़ी हैं।
नगर निगम व सरकार चाहें तो प्रभावितों को वहीं उनकी ही विधानसभा वार्ड में ही बसाया जा सकता है। फिर शहर के मध्य में ही बंद पड़ी कपड़ा मिलों की जमीनें भी हैं, जहां प्लॉट या फ्लैट देने की व्यवस्था की जा सकती है।
हमारे नुकसान की भरपाई क्यों नहीं
प्रभावितों का कहना है कि जब 65 लाख करोड़ उद्योगपतियों के माफ किए जा सकते हैं और खरबों रुपए लेकर नीरव, माल्या, ललित जैसे दर्जनभर चोर भाग जाते हैं।
सरकार मुफ्त की स्कीम में अरबों, खरबों रुपए बांट सकती है तो हमें हमारे घर-मकान-दुकान की कीमत क्यों नहीं चुकाती, जबकि इंदौर नगर निगम में ही 23 से 27 प्रतिशत रिश्वत बंटती है और हर साल करोड़ों के भ्रष्टाचार के मामले उजागर होते हैं।
हमारे नुकसान की भरपाई क्यों नहीं करते। सरकार एक और तो बेघरों को घर दे रही, वहीं दूसरी ओर जिनके पास हैं उनके घर छीनकर उन्हें बेघर कर रही।
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