पाताल भुवनेश्वर, वह रहस्यमय गुफा जहां आज भी थमा है ‘कलियुग का अंत’: धरती के भीतर बसा देवलोक; जहां शिला बनकर विराजमान हैं 33 कोटि देवी-देवता
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संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
कल्पना कीजिए, आप जमीन से लगभग 90 फीट नीचे एक भूलभुलैया जैसी रहस्यमयी कंदरा में उतर रहे हैं, जहां की दीवारों से रिसता पानी और ठंडी हवाएं किसी प्राचीन गाथा की फुसफुसाहट जैसी लगती हैं। अचानक आपकी नजर एक ऐसी शिला पर पड़ती है, जिसके बारे में स्कंद पुराण कहता है कि यह भगवान गणेश का वह मस्तक है, जिसे स्वयं शिव ने काटा था। यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पिथौरागढ़ की पहाड़ियों में छिपा ‘पाताल भुवनेश्वर’ है।
आदि गणेश का दिव्य मस्तक और दिव्य कमल... अक्सर हम चार धाम की यात्रा की बात करते हैं, लेकिन हिमालय के आगोश में बसा यह पाताल लोक आज भी कई अनसुलझे रहस्यों को समेटे हुए है। यहां केवल मूर्तियां नहीं हैं, बल्कि पत्थर गवाही देते हैं।
सतयुग से लेकर कलियुग तक के सफर की। यहां एक ऐसा रहस्यमयी पत्थर है, जो हर साल कुछ मिलीमीटर ऊपर बढ़ता है। मान्यता है कि जिस दिन यह पत्थर गुफा की छत को छू लेगा, उसी क्षण इस सृष्टि से कलियुग का अंत हो जाएगा।
आइए। पाताल की इस गहराई में विज्ञान की सीमाएं खत्म होती हैं और अटूट श्रद्धा का साम्राज्य शुरू होता है। गुफा के भीतर कदम रखते ही जो पहला दृश्य कौतूहल जगाता है, वह है भगवान गणेश का ‹शिशु रूप› मस्तक। पत्थर की इस प्राकृतिक आकृति के ठीक ऊपर चट्टान से बना एक 108 पंखुड़ियों वाला ‘ब्रह्मकमल’ दिखाई देता है।
आश्चर्य की बात यह है कि इस ब्रह्मकमल से अमृत रूपी जल की बूंदें लगातार भगवान गणेश के मुख में गिरती हैं। पुराणों के अनुसार, शिव ने जब गजानन का मस्तक काटा था, तो उसे इसी गुफा में स्थापित किया था।
पाताल लोक में है देवताओं का वास
जैसे-जैसे आप इस गुफा की गहराई में आगे बढ़ते हैं चूना पत्थर की चट्टानों पर प्राकृतिक रूप से उत्कीर्ण आकृतियां मन मोह लेती हैं। स्कंद पुराण के मानस खंड में वर्णन है कि इस गुफा में साक्षात 33 करोड़ देवी-देवताओं का निवास है।
यहां पत्थरों पर ही केदारनाथ, बद्रीनाथ और अमरनाथ की प्रतिकृतियां बनी हुई हैं। यहां तक कि कालभैरव की जीभ और शेषनाग का विशाल फन भी शिलाखंडों के रूप में स्पष्ट दिखाई देता है, जिसे देखकर श्रद्धा और विस्मय का अद्भुत संगम होता है।
इस गुफा का सबसे रहस्यमयी हिस्सा वह स्थान है जहां चार पत्थर के स्तंभ मौजूद हैं, जिन्हें चार युगों का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यहां प्रवेश के भी चार द्वार थे। ये थे- रणद्वार, पापद्वार, धर्मद्वार और मोक्षद्वार।
कहा जाता है कि रावण की मृत्यु के बाद पापद्वार और महाभारत युद्ध के बाद रणद्वार बंद हो गए थे। वर्तमान में यहां मौजूद ‘कलियुग का स्तंभ’ धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ रहा है। स्थानीय लोग और पुजारी बताते हैं कि यह पत्थर हर कुछ वर्षों में थोड़ा ऊपर सरक जाता है। जिस दिन यह स्तंभ गुफा की छत को स्पर्श कर लेगा, उसे ही कलियुग की समाप्ति का संकेत माना जाएगा।
मानस खंड के 103वें अध्याय में इस गुफा का विस्तार से उल्लेख है। विशेष रूप से श्लोक संख्या 273 से 288 के बीच उन सभी प्रतीकों (जैसे शेषनाग, गणेश जी का मस्तक और 33 करोड़ देवता) का वर्णन है जिन्हें आज भी यात्री वहां प्रत्यक्ष देखते हैं। स्कंद पुराण में यहां तक कहा गया है कि जो पुण्य काशी में दस गुना, कुरुक्षेत्र में सौ गुना और गया में हजार गुना मिलता है, वह पाताल भुवनेश्वर के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है।
पाताल भुवनेश्वर की खोज का इतिहास भी उतना ही प्राचीन है जितना इसका अस्तित्व। कहा जाता है कि त्रेता युग में अयोध्या के राजा ऋतुपर्ण ने सबसे पहले इस गुफा को खोजा था। इसके बाद द्वापर युग में पांडवों ने यहां आकर भगवान शिव की आराधना की थी।
कलयुग में यह गुफा लंबे समय तक गुमनाम रही, जिसे 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने अपने दिव्य ज्ञान से पुनर्जीवित किया। तभी से यहां की पूजा का दायित्व एक विशिष्ट पुजारी परिवार द्वारा निभाया जा रहा है।
वैज्ञानिकों के लिए यह गुफा ‘स्टेलेक्टाइट’ और ‘स्टेलेग्माइट’ का एक उत्कृष्ट उदाहरण हो सकती है, लेकिन एक भक्त के लिए यह साक्षात ईश्वर की उपस्थिति का प्रमाण है।
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