बाबा रे बाबा अश्विन बाबा: जिद-जुनून-जज्बे से लबरेज अश्विन जोशी का असमय महाप्रयाण दुःखद
KHULASA FIRST
संवाददाता

कांग्रेस ने भी खो दिया एक इंटेलीजेंट व दबंग लीडर, पार्टी की ताकत थे जोशी
सिर्फ राजनीति ही नहीं, कला, संस्कृति, संगीत, साहित्य से भी था गहरा नाता
इंदौर की गलियों में ही फर्श से अर्श तक का सफर, जन-जन से था जुड़ाव
राजनीति का अलहदा था अंदाज, जलसंकट को बना दिया था चुनावी जीत का आधार
जनता के बीच ऐसी सक्रियता कि कांग्रेसी होने के बाद भी आरएसएस के गढ़ से भी बंटोर ले जाते थे वोट
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
रुखसत हो गया वो नेता, जो इंदौर व इंदौरियत के लिए लड़ने-भिड़ने के लिए जाना जाता था। विदा हो गया वो नेता, जो जिद, जुनून, जज्बे से लबरेज था, असीम संभावनाओं से लैस था। असमय काल के गाल में समा गया एक ऐसा कार्यकर्ता, जो अपने राजनीतिक दल की ताकत था।
सत्ता-व्यवस्था के खिलाफ जब वह बांह चढ़ाता था, तो समूची पार्टी में जोश भर देता था। असमय सबको हतप्रभ कर, सबको छोड़ चला वह नेता, जो सिर्फ राजनीति ही नहीं करता था, गीत-संगीत की जाजम भी बिछाता था, शेरो-शायरी की महफिल भी सजाता था।
कला, साहित्य जगत से भी जिसका गहरा नाता था, वह नेता चिरनिद्रा में लीन हो गया। अब पीछे रह गया है वह अलमस्त मिजाज, जो एक युवा को ‘बाबा’ बना देता है। अब पीछे छूट गई है वह बाल सुलभ हंसी व खिलखिलाहट, जो हर माहौल को उल्लास में बदल देती थी।
सूने छोड़ गया वह नेता शहर के वे ठिये-ठिकाने, ओटले, चौराहे, जहां जब तब वह जाकर बैठता था, बिना इस गुमान के कि वह बड़ा नेता है। नेता ही नहीं, पक्का यारबाज था वह, जिसके बस अब किस्से ही इंदौर के हिस्से में आएंगे।
बाबा रे बाबा, अश्विन बाबा। जी हां, ये ही नारा गूंजता था, जब अश्विन जोशी चुनावी मैदान में उतरते थे। बाबा का उपनाम कब कैसे चस्पा हुआ, ये तो किसी को भी खबर नहीं, लेकिन ये तय है कि बाबा शब्द शुद्ध इंदौरी मिजाज का शब्द है, जो शुद्ध इंदौरी अश्विन भाई पर एकदम फिट बैठता था।
ये ही बाबा, पानी वाले बाबा हो गए। पानी वाले बाबा की कहानी भी अजब-गजब रही। ऐसी गजब की संकट को अवसर में तब्दील कर दिया।
जी हां, शहर में किसी दौर में गर्मी आते ही पानी को लेकर सड़कों पर मटके फूटते थे, आंदोलन होते थे, जनता त्राहिमाम करती थी, नेता की तरफ देखती थी। उस दौर में टैंकर से जल वितरण की आज जैसी व्यवस्था विकसित नहीं हुई थी।
अश्विन जोशी तब ऐसे पहले नेता थे जिन्होंने टैंकर के जरिए अपने विधानसभा क्षेत्र में जल वितरण शुरू किया। बाद में उनके देखादेखी अन्य नेता भी टैंकरों के जरिये अपने वोटर्स के बीच पहुंचे लेकिन, ‘पानी वाले बाबा’ का तमगा सिर्फ अश्विन जोशी को ही मिला।
जोशी ने जल संकट की बड़ी आपदा को न सिर्फ अवसर में बदल दिया, बल्कि अपनी जीत का एक बड़ा आधार भी बना दिया। जनता को भरचक गर्मी में, जब नल रीते हो जाएं तब ड्रम भर-भरकर पानी मिल जाए तो क्या कहने?
बस पानी वाले बाबा पानी से ही चुनावी बाधा पार कर एक नहीं, तीन बार विधायक बने, वह भी बीच शहर से। शहर का वह हिस्सा, जो मूल इंदौर है।
अहिल्या नगरी की असल पहचान राजवाड़ा भी उन्हीं के हिस्से में आया। तभी तो उन्होंने शहर के ह्रदय स्थल राजवाड़ा को लेकर की गई ‘भाजपाई इंजीनियरिंग’ का ह्रदय से पुरजोर न सिर्फ विरोध किया, बल्कि उस आंदोलन में वे विजेता भी बनकर उभरे।
उनके कारण ही इंदौर का वास्तु बिगड़ते-बिगड़ते बचा और समूचा इंदौर आज एक बार फिर अपनी आराध्या, लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर की प्रतिमा की परिक्रमा कर रहा है।
राजवाड़ा का कबाड़ा करने का मामला हो या फिर शहर से लोक परिवहन के सबसे पुराने साधन टेंपो की विदाई, अश्विन जमकर सत्ता से लड़े। शहर की दूषित होती आबोहवा के मद्देनजर उन्होंने टेंपो की विदाई का तो विरोध नहीं किया, लेकिन 400-500 गरीब टेंपो वालों की लड़ाई लड़ विकल्प के रूप में उन्हें मारुति वैन जैसी व्यवस्था दिलवाई।
रवींद्र नाट्यगृह में जब वैकल्पिक वाहन का वितरण समारोह हुआ तो तब की भाजपा सरकार ने जोशी के हाथों ही वाहन की चाबी का वितरण करवाया था।
जनता के बीच उनकी सक्रियता ही उनकी चुनावी जीत का आधार बनती थी। उनका राजनीतिक इलाका मतदाता की दृष्टि और भूगोल के लिहाज से भी छोटा था, लेकिन यहां से चुनाव जीतना टेड़ी खीर से कम न था।
अल्पसंख्यक वोट हार-जीत में निर्णायक भूमिका निभाते थे और जोशी को इस वर्ग का ही पक्षधर प्रचारित किया जाता था। बावजूद इसके वे रामबाग, पंतवेद्य नगर, जती कॉलोनी, तिलक पथ जैसे आरएसएस के गढ़ से भी वोट बंटोर ले जाते थे।
रामबाग में आरएसएस मुख्यालय की मौजूदगी के बावजूद मराठी समाज उन्हें अपना आशीर्वाद देता था। ये उनकी राजनीति के जरिये बिना भेदभाव के जनसेवा का विरला उदाहरण था।
कांग्रेस जोशी को असल हक नहीं दे पाई..क्या कांग्रेस अपने सबसे कद्दावर नेता को उनका असल हक नहीं दे पाई? ये सवाल अश्विन जोशी के असमय अवसान के बाद इंदौर में सबसे ज्यादा चर्चा में है और राजनीतिक ठिये-ठिकानों पर इसी बात की चर्चा हो रही है कि ‘बाबा’ को उनकी पार्टी कांग्रेस वो हक नहीं दे पाई, जिसके वे असल हकदार थे।
वे 90 के दशक के हिंदुत्व उभार के दौर के बावजूद तीन-तीन बार उस सीट से विधायक रहे, जो राजनीतिक लिहाज से संवदेनशील मानी जाती थी, लेकिन एक चुनावी हार के बाद वे पार्टी की राजनीति में नैपथ्य में धकेल दिए गए।
उनके रहते हुए गांधी भवन की ‘सरदारी’ को लेकर कांग्रेस के हुए ‘प्रयोग’ इसी बात का इशारा करते हैं कि जोशी को लेकर उनका ही दल असहज व असुरक्षित महसूस करता था। जबकि वे ऐसे नेता थे जो एकछत्र भाजपाई राज के दौर में सत्ता से दो-दो हाथ जमकर कर सकते थे।
खैर अब क्या होना है। जोशी तो फिर से लौटकर आऊंगा का वादा कर हमेशा के लिए चले गए। उनके असमय अवसान से शहर ने शहरहित के लिए लड़ने-भिड़ने वाला नेता ही नहीं खोया, बल्कि कांग्रेस ने भी एक मजबूत, दमदार, इंटेलीजेंट व दबंग लीडर खो दिया।
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