अफसर, नेता का पानी उतरा, सेट किया जा रहा नैरेटिव: मैं क्या कहता हूं
KHULASA FIRST
संवाददाता

गोविंद शर्मा वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
गर्मी के इन दिनों में पानी की किल्लत से शहर में हंगामा मचा हुआ है। नगर निगम 600 से अधिक टैंकरों से पानी उपलब्ध कराने का प्रयास कर रहा है, हालांकि यह प्रयास भी कमतर साबित हो रहे हैं।
विचारणीय है कि ऐसा क्यों। यदि समझने की कोशिश करें तो साजिश की बू आती है और षड्यंत्र सा दिखाई देता है। गौरतलब है कि कुल 85 वार्ड, जिनमें से आधे से अधिक यानी लगभग 50 वार्डों में पानी की समस्या लगभग न के बराबर है।
शेष 35 वार्ड, जिनमें कहीं थोड़ी तो कोई 5-7 वार्डों में अधिक किल्लत दिखाई दे रही। अब इसे इस तरह भी जानें की एक वार्ड में लगभग 12 से 22 मोहल्ले, कॉलोनी हैं और करीब 25 से 50 हजार की आबादी।
यह भी सच है कि हर गली-मोहल्ले, कॉलोनी में पानी की किल्लत नहीं है यानी कुछ-कुछ इलाके जलसंकट ग्रस्त हैं। इसके लिए प्रत्येक वार्ड में 3 टैंकर लगाए जाएं, जिनके जरिए 5 ट्रिप पानी प्रत्येक से भेजा जाए तो 15 टैंकर पानी से सहजता से जल अभाव ग्रस्त इन क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति की जा सकती है।
यानी 35 गुणा 3 = 105 टैंकर और यदि अन्य 50 वार्ड में भी 2/2 टैंकर भेजे जाएं तो 50 गुणा 2 =100 टैंकर यानी कुल 205 टैंकर काफी होंगे और 50 एक्स्ट्रा भी लगाए जाएं तो अधिकतम 255 टैंकर से निगरानी रख काम लिया जाए तो सहजता से जल आपूर्ति की जा सकती है।
अब सवाल यह उठता है कि नगर निगम द्वारा 600 से अधिक टैंकर लगाए जाने पर भी यदि जल आपूर्ति नहीं हो पा रही है तो यह साफ हो जाता है कि जल आपूर्ति व्यवस्था भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी है। नेता, अफसर गठजोड़ का लगता है पानी उतर गया।
कमीशन के खेल के साथ निजीकरण की राह आसान करने का षड्यंत्र करते नजर आ रहे हैं। ऐसा लगता है जानबूझकर एक नैरेटिव सेट किया जा रहा है।
क्या सब इस्तेमाल हो रहे - वाटर व सीवर सिस्टम को कहीं प्राइवेट सेक्टर को सौंपने की साजिश तो नहीं हो रही। इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई 30 से अधिक लोगों की मौत और उसके बाद जो कुछ माहौल खड़ा किया गया और अब जो हल्ला पानी की कमी व वितरण व्यवस्था को लेकर मचाया जा रहा है, ऐसा तो नहीं की एक नैरेटिव सेट किया जा रहा है।
मीडिया हाउस सहित आप-हम जैसे कथित बुद्धिजीवियों को सोची-समझी रणनीति से इस्तेमाल किया जा रहा है। इसे समझने की कोशिश इस तरह से भी की जा सकती है कि सरकार का निजीकरण पर जोर है ओर वह भेल, तेल, रेल बेचकर तेजी के साथ इस दिशा में बढ़ती ही जा रही है, हालांकि यह कोई हल नहीं।
अगर प्रबंधन सही नहीं है तो सही करे। भागने से तो काम नहीं चलेगा। यह घातक कदम है, जो देश को फिर से 1947 से पहले के दौर की ओर ले जा सकता है।
निजीकरण की साजिश?
देश की आजादी के महज 75 साल बाद ही ऐसा लगने लगा है कि जैसे बाजी पलट गई। जहां से चले थे कहीं उसी जगह तो नहीं पहुंच रहे हैं हम। अतीत में देखें तो 1947 में जब देश आजाद हुआ था तो सरकार और उनके मंत्री देश की रियासतों को आजाद भारत का हिस्सा बनाने के लिए परेशान थे।
इसके लिए साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपनाई गई, क्योंकि देश की सारी संपत्ति इन्हीं रियासतों के पास थी, फिर दे सरकार के अधीन आ गई। धीरे-धीरे रेल, बैंक, कारखानों आदि का राष्ट्रीयकरण किया गया और एक शक्तिशाली भारत का निर्माण हुआ।
अफसोस की आधी सदी भी न गुजरी थी की इन्हें अब पुनः निजी हाथों में सौंपा जा रहा है। तेल, भेल, रेल के अलावा भी कई सरकारी उपक्रम बेचे जा चुके हैं। यहां तक की पंच तत्व अग्नि (बिजली) हवा, धरती,आकाश व पानी भी पूरी तरह से बेचने की तैयारी दिख रही है।
कई राज्यों में कुछ-कुछ तरह तरह से लगभग बेचा ही जा चुका है। फासीवादी ताकतें पूंजीवादी व्यवस्था के कंधे पर सवार हो राजनीतिक परिवर्तन पर उतारू हैं।
मुनाफे की विशुद्ध वैचारिक सोच पर आधारित ये राजनीतिक देश को फिर से 1947 के पीछे ले जाना चाहती है। निजीकरण की आड़ में कहीं पुनः देश की सारी संपत्ति देश के चंद पूंजीपति घरानों को सौंप देने की साजिश तो नहीं चल रही है।
…फिर लोकतंत्र खत्म
देश जब पूंजीपतियों के अधीन होगा तो वे हर कदम पर पैसा उगाही करने वाले अंग्रेज साबित होंगे। कुछ समय बाद ये कहेंगे कि देश के सरकारी अस्पतालों, स्कूलों, कॉलेजों से कोई लाभ नहीं है अत: इन्हें भी निजी हाथों में दे दिया जाए तो जनता का क्या होगा?
निजीकरण एक व्यवस्था नहीं, बल्कि पुनः गुलामी की ओर जाना है। हमने बेहतर व्यवस्था बनाने के लिए सरकार बनाई है न कि सरकारी संपत्ति मुनाफाखोरों को बेचने के लिए। निश्चित ही इससे लोकतंत्र का वजूद खत्म हो जाएगा।
घाटे के बहाने भागना
सरकार घाटे का बहाना बनाकर सरकारी संस्थानों को बेच क्यों रही है? अगर प्रबंधन सही नहीं तो सही करे, भागने से तो काम नहीं चलेगा। यह एक साजिश के तहत सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है।
पहले सरकारी संस्थानों को ठीक से काम न करने दो, फिर बदनाम करो, जिससे निजीकरण करने पर कोई बोले नहीं, फिर धीरे से अपने आकाओं को बेच दो। इंदौर भागीरथपुरा की घटना और उसके बाद प्रदेश के कई जिलों का माहौल फिर गर्मी के इन दिनों में पानी की किल्लत को लेकर मचा हंगामा।
कहीं इंदौर व प्रदेश के वाटर व सीवर सिस्टम को बेचना निजीकरण की दिशा में बढ़ने का कोई उपक्रम तो नहीं।
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