अब इस मॉडल पर विकसित होगा आस्था का यह स्थल: हाईकोर्ट के फैसले के बाद किसने किया ये बड़ा ऐलान; माहौल बिगाड़ने पर किस बात के संकेत
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, धार।
ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के बहुचर्चित फैसले के बाद शनिवार को परिसर में पूजा-अर्चना शुरू हो गई। फैसले के बाद प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने स्पष्ट किया कि भोजशाला क्षेत्र को राम जन्मभूमि की तर्ज पर विकसित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट का निर्णय भी कई मायनों में अयोध्या के राम मंदिर मामले जैसा है, जिसमें विभिन्न साक्ष्यों और ऐतिहासिक पहलुओं को आधार बनाया गया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि अदालत ने अपने आदेश में अयोध्या प्रकरण का हवाला देते हुए विकास कार्यों पर कोई रोक नहीं लगाई है, भले ही यह स्थल संरक्षित श्रेणी में आता हो। उन्होंने भरोसा दिलाया कि शासन सभी आवश्यक सुविधाएं विकसित करेगा और धार्मिक आस्था के अनुरूप व्यवस्थाएं सुनिश्चित की जाएंगी। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि धर्म की आड़ में माहौल बिगाड़ने की कोशिश करने वालों को चिन्हित किया जा चुका है और ऐसे तत्वों से सख्ती से निपटा जाएगा।
सीएम मोहन यादव ने यह भी कहा कि राज्य सरकार सभी पक्षों के साथ संवाद के जरिए समाधान की दिशा में आगे बढ़ेगी। उन्होंने संकेत दिए कि मां वाग्देवी (सरस्वती) की प्रतिमा, जो वर्तमान में लंदन में होने की बात कही जाती है, उसे वापस लाने के लिए केंद्र सरकार से आग्रह किया जाएगा और इस दिशा में प्रयास किए जाएंगे। वहीं मुस्लिम पक्ष द्वारा मस्जिद के लिए वैकल्पिक भूमि की मांग किए जाने पर उन्होंने कहा कि यदि औपचारिक आवेदन आता है तो सरकार इस पर विचार करेगी।
इधर, फैसले के बाद कानूनी हलचल भी तेज हो गई है। मुस्लिम पक्ष द्वारा सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारियों के बीच हिंदू पक्ष ने अग्रिम तौर पर कैविएट दायर कर दी है, ताकि किसी भी एकतरफा आदेश से पहले उनका पक्ष सुना जा सके।
अयोध्या और भोजशाला फैसले में समानताएं
हाईकोर्ट की खंडपीठ न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी ने अपने निर्णय में अयोध्या मामले के कई बिंदुओं का उल्लेख किया है। दोनों मामलों में पुरातात्विक सर्वेक्षण की रिपोर्ट को अहम आधार माना गया, जिसमें पूर्व हिंदू संरचना के अवशेषों का जिक्र है। साथ ही लगातार पूजा और आस्था के प्रमाणों को भी महत्वपूर्ण माना गया।
फैसले में यह भी रेखांकित किया गया कि किसी स्थल पर मूर्ति का अभाव उसके धार्मिक स्वरूप को समाप्त नहीं करता। अयोध्या प्रकरण की तरह ही यहां भी ऐतिहासिक अभिलेखों और परंपराओं को महत्व दिया गया। इसके अलावा यह सिद्धांत भी दोहराया गया कि लंबे समय तक किसी एक पक्ष द्वारा उपयोग किए जाने मात्र से स्वामित्व का अधिकार स्वतः स्थापित नहीं हो जाता।
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