सरकार को घेरने के लिए अब संगठन का दांव: सॉफ्टवेयर वही, वर्जन नया
KHULASA FIRST
संवाददाता

मोहन सरकार के खिलाफ फिर री-लांच हुआ विरोध का 'डाटा', हाईकमान के 'फायरवॉल' के आगे सब फेल!
सरकार vs संगठन: मध्य प्रदेश भाजपा में पुरानी स्क्रिप्ट पर नया ड्रामा, कुर्सी के दावेदारों की सिफारिशें दरकिनार, नियुक्तियों की खींचतान और सत्ता का असंतोष: क्या डॉ. मोहन यादव की रफ्तार रोकने में नाकाम हो रहा है असंतुष्टों का खेमा?
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के खिलाफ राजनीतिक हलकों में असंतोष की खबरें एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार फिर से खिलाफत के सॉफ्टवेयर में संगठन के नाम से इनपुट डाटा को डाला जा रहा है। ऐसा वातावरण निर्मित किया जा रहा है मानों किसी सॉफ्टवेयर का नया वर्जन लांच हुआ हो।
इसके लिए इस बार असंतुष्टों के बजाय सीधे संगठन को बीच में लाया जा रहा है। वैसे सरकार और संगठन का मुख्य होना दोनों ही चुनौतीपूर्ण है, लेकिन सरकार का मुख्य होना कुछ ज्यादा ही चुनौतीभरा होता है।
सरकार को गरियाने के लिए कभी नियुक्तियों में देरी, कभी दिल्ली में नेताओं की सक्रियता तो कभी प्रशासनिक फैसलों पर सवाल अपडेट लगातार आ रहे हैं। बस, समस्या यह है कि सरकार गरियाने में नहीं आ पाती। यानी सारे प्रयत्नों के बाद भी नेतृत्व परिवर्तन की हलचल तक नहीं खड़ी हो पाती, यही दर्द बार-बार उभरकर आ रहा है।
दिलचस्प यह है कि हर कुछ महीनों में यही सॉफ्टवेयर रीलांच होता है, लेकिन सरकार के डाटा को क्रैश कभी नहीं करता। सवाल यह उठता है क्या विरोध सच में इतना कमजोर है या हाईकमान का ‘फायरवॉल’ इतना मजबूत?
पार्टी सूत्रों की मानें तो यह असंतोष व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का नतीजा ज्यादा लगता है। साथ में संगठन की चुनौतियां भी कारण हो सकती हैं और बाकी काम ऐसे मौके पर असंतुष्ट खेमा आग में घी डालने का काम करता है। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि सरकार से संगठन की सामूहिक नाराजगी बढ़ती जा रही है, क्योंकि कई नेता लाभ या लालच के पद पाना चाह रहे हैं।
ऐसे नेता जो करें वह कम है। इस समय भी नीतिगत मामलों को व्यक्तिगत टकराव के रूप में प्रचारित करने की कोशिश प्रतीत होती है। आलोचकों का कहना है कि लंबित नियुक्तियां देर-सवेर मीडिया और दिल्ली दरबार तक पहुंचेंगी ही।
फिलहाल मुख्यमंत्री के सामने चुनौती विरोधियों को चुप कराने की नहीं, बल्कि वित्तीय दबाव, प्रशासनिक जवाबदेही और नेताओं की बढ़ती अपेक्षाओं के बीच संतुलन साधने की है। यानी असली परीक्षा राजनीतिक सौदेबाजी की कला में है, न कि सॉफ्टवेयर अपडेट रोकने में।
सरकार और संगठन में मतभेद कोई नई बात नहीं है, हर सरकार और उसके संगठन के बीच नाराजगी का इतिहास भरा पड़ा है। भाजपा में सत्ता और संगठन के बीच यह रस्साकशी कोई पहली बार नहीं दिख रही।
इस सरकार में 2023 में मुख्यमंत्री पद के चयन को लेकर हुई खींचतान से लेकर सिंहस्थ भूमि विवाद और ‘एमपी गान’ प्रकरण तक हर बार संगठन बनाम सरकार का यही टकराव अलग-अलग रूप में सामने आता रहा है।
फर्क सिर्फ इतना है कि किरदार बदल जाते हैं, स्क्रिप्ट वही रहती है। शिवराजसिंह चौहान के कार्यकाल में भी संगठन और सरकार के बीच ऐसी ही तनातनी की खबरें समय-समय पर आती रहीं, लेकिन नेतृत्व परिवर्तन तक नौबत कभी नहीं पहुंची।
अभी यह भी कहा जा रहा है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष से मुलाकात भी मोहन और खंडेलवाल ने अलग-अलग की। यह दूरी प्रतीकात्मक रूप से और स्पष्ट हो गई। हाईकमान ने दोनों से बात तो की, पर ‘मामला लगातार चल रहा है’।
ऐसा लगता है कि पार्टी अध्यक्ष सरकार के मुखिया के निजी सचिव के रूप में हैं, इसलिए जहां-जहां मुख्यमंत्री जाएं, वहां उन्हें भी जाना चाहिए। इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है। सीधी भाषा में कहें तो यह टकराव व्यक्तित्वों का कम, सरकार और संगठन के मामलों का ज्यादा है और भाजपा मध्य प्रदेश में यह ढांचागत रस्साकशी लगभग हर सत्ता-चक्र में दोहराई जाती रही है।
सूत्रों के मुताबिक असली मसला सरकार में पद पाने के लिए हर तरह के खेल कर रहे नेता संगठन पर दबाव बनाए हुए हैं। संगठन की सिफारिशों को सरकार के फैसलों में वजन न मिलने का है। पदाधिकारियों की अनुशंसाएं दरकिनार होने की शिकायतें आम हो चली हैं।
पार्टी लाइन से हटकर फैसले संगठन के बजाय सीधे सीएम हाउस से होते दिख रहे हैं। ग्वालियर में भाजपा ग्रामीण युवा मोर्चा अध्यक्ष पद पर कांग्रेस से आए शिवराज यादव की नियुक्ति इसी असंतोष की ताजा मिसाल है। पैनल में नाम था ही नहीं, बाद में जोड़ा गया।
दतिया उपचुनाव में भाजपा के अपने ही वोट खिसकने के बाद टिकट बंटवारे और उम्मीदवार चयन पर उठे सवाल इस खींचतान की एक परत हैं। संगठन का एक हिस्सा मानता है कि हार का ठीकरा सिर्फ स्थानीय कारकों पर नहीं फोड़ा जा सकता।
सरकार और संगठन के मतभेद पार्टी हाईकमान के लिए कोई नई बात नहीं, बल्कि एक सामान्य हलचल है। हाईकमान की भी कोशिश रहती है कि सरकार पर अंकुश बनाए रखने के साथ ही संगठन को भी अपने नियंत्रण में पूरी तरह से रखने के लिए चेक और बैलेंस की राजनीति चलती रहे।
यही कारण है कि मुख्यमंत्री अपनी सरकार को चला नहीं, दौड़ा रहे हैं और वह भी अपने तरीके से। इसीलिए कहा जा रहा है कि अगला चुनाव भी मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। शायद यही कारण है कि भाजपा में मुख्यमंत्री के विरोधी लगातार चुनौती पेश करने के प्रयास कर रहे होंगे।
छड़ी पूजा के बाद भोजन की मेजबानी पर बवाल, पुलिस ने दर्ज किए केस
मल्हारगंज थाना क्षेत्र के राजमोहल्ला स्थित कॉलोनी में गोगा नवमी पर छड़ी पूजा के बाद मेजबानी को लेकर विवाद ने तूल पकड़ लिया। भाजयुमो प्रदेश अध्यक्ष श्याम टेलर शामिल हुए थे। पूजा के बाद उन्हें भोजन के लिए घर ले जाने की बात को लेकर दो पक्ष आमने-सामने आ गए। श्याम टेलर के रवाना होने के बाद विवाद और बढ़ गया। हेमंत भैरवे व हर्षल के बीच मारपीट हो गई।
बताया जा रहा है पूजा के बाद हेमंत ने श्याम टेलर को घर ले जाकर भोजन कराने की बात कही थी। इसका दूसरे पक्ष ने विरोध किया। इसी बात पर दोनों पक्षों में पहले कहासुनी फिर गाली-गलौज हुई। देखते ही देखते विवाद मारपीट में बदल गया।
पुलिस पहुंची तो थमा विवाद, थाने में फिर आमना-सामना
सूचना मिलते ही मल्हारगंज पुलिस पहुंची। दोनों पक्षों को अलग किया गया। इसके बाद हेमंत भैरवे और हर्षल पक्ष थाने पहुंचे और एक-दूसरे के खिलाफ मारपीट व गाली-गलौज की शिकायत की। पुलिस ने दोनों पक्षों की शिकायतों पर क्रॉस केस दर्ज कर लिया है।
दोनों पक्षों से जुड़े लोगों को मेडिकल परीक्षण के लिए भेजा गया। थाने के सामने भी दोनों पक्षों के बीच बहस की स्थिति बनी, जिस पर पुलिस ने वहां से हटाया। मल्हारगंज थाना प्रभारी नीरज बिरथरे ने मारपीट की पुष्टि कर बताया दोनों पक्षों की शिकायत पर प्रकरण दर्ज कर जांच की जा रही है।
श्याम टेलर के जाने तक नहीं था विवाद
भाजयुमो पदाधिकारी रजत शर्मा ने बताया वे कार्यक्रम में मौजूद थे। उनके मुताबिक श्याम टेलर के रवाना होने तक किसी तरह का विवाद नहीं हुआ था। वहीं, युवा मोर्चा शहर अध्यक्ष सौगात मिश्रा से प्रतिक्रिया के लिए संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया।
सूत्रों के मुताबिक दोनों पक्षों के बीच रंजिश चली आ रही है। ऐसे में छड़ी पूजा के बाद श्याम टेलर की मेजबानी को लेकर हुआ विवाद पुराने विवाद के भड़कने की वजह बन गया। पुलिस दोनों पक्षों के आरोपों और मौके पर मौजूद लोगों के बयान के आधार पर घटनाक्रम की जांच कर रही है।
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