सरल नहीं पर प्रभावशाली थे: आदर्शवादी नहीं परंतु निर्णायक थे अजित पवार...
KHULASA FIRST
संवाददाता

नीरज कुमार दुबे स्वतंत्र लेखक खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
अजित पवार ने 1982 में सहकारी क्षेत्र से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की। वह चीनी मिल के बोर्ड में चुने गए और यहीं से बारामती की राजनीति में उनकी जड़ें मजबूत होती गईं। 1991 में वह पुणे जिला केंद्रीय सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने और उसी वर्ष बारामती से लोकसभा सांसद चुने गए।
हाराष्ट्र की राजनीति को आज तब गहरा आघात लगा, जब उपमुख्यमंत्री अजित पवार का बारामती में विमान हादसे में निधन हो गया। लैंडिंग के दौरान विमान में आई तकनीकी खराबी के बाद यह दुर्घटना हुई। हादसे की खबर फैलते ही राज्यभर में शोक की लहर दौड़ गई।
देखा जाए तो अजित पवार महाराष्ट्र के उन नेताओं में थे, जिन्होंने सत्ता के केंद्र में रहते हुए भी जमीन से नाता नहीं तोड़ा। वह भले ही कभी मुख्यमंत्री न बने हों, लेकिन राज्य में सबसे लंबे समय तक उपमुख्यमंत्री रहने का इतिहास उनके नाम दर्ज है।
छह बार उपमुख्यमंत्री के रूप में सेवा देने वाले अजित पवार ने अलग-अलग सरकारों में अपनी प्रशासनिक पकड़ और राजनीतिक प्रभाव बनाए रखा। बारामती में अजित पवार की राजनीति का सबसे बड़ा प्रमाण उनका काम खुद था।
वह उन गिने चुने नेताओं में थे जिनके लिए अपना खुद का चुनाव प्रचार एक औपचारिकता भर था। विधानसभा चुनावों में वह हमेशा समय पर अपना नामांकन दाखिल करते थे, लेकिन उसके बाद बारामती की गलियों में शायद ही कभी उन्हें प्रचार करते देखा गया।
जनता जानती थी कि किसे वोट देना है, इसलिए जनता ही उनका प्रचार करती थी। अजित पवार का भरोसा नारों पर नहीं, काम पर था। इसी आत्मविश्वास के चलते वह बारामती से निश्चिंत रहकर राज्य के दूसरे इलाकों में पार्टी उम्मीदवारों के प्रचार में जुट जाते थे।
बारामती उनके लिए सिर्फ एक निर्वाचन क्षेत्र नहीं था, वह उनका कर्मक्षेत्र था, जहां उन्होंने यह साबित किया कि जब विकास बोलता है तो नेता को खुद बोलने की जरूरत नहीं पड़ती।
अजित पवार ने 1982 में सहकारी क्षेत्र से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की। वह चीनी मिल के बोर्ड में चुने गए और यहीं से बारामती की राजनीति में उनकी जड़ें मजबूत होती गईं। 1991 में वह पुणे जिला केंद्रीय सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने और उसी वर्ष बारामती से लोकसभा सांसद चुने गए।
बाद में उन्होंने यह सीट शरद पवार के लिए खाली की। इसके बाद वह बारामती से सात बार विधायक बने। उनके परिवार में पत्नी सुनेत्रा पवार और दो पुत्र जय और पार्थ हैं। सहकार से सत्ता तक का उनका सफर बारामती से शुरू हुआ और वहीं समाप्त हुआ।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में विभाजन के बाद अजित पवार के नेतृत्व वाले गुट को चुनाव आयोग ने पार्टी का मूल नाम और चुनाव चिन्ह सौंपा था। यह गुट भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति के साथ जुड़ा। वहीं उनके चाचा और वरिष्ठ नेता शरद पवार ने अलग रह कर एनसीपी-एससीपी का नेतृत्व संभाला।
यह विभाजन महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे भावनात्मक और निर्णायक मोड़ माना गया। दोनों पक्षों का विवाद अदालत के दरवाजे तक पहुँचा लेकिन हाल के दिनों में पवार परिवार एकजुट नजर आ रहा था। हम आपको याद दिला दें कि 2024 के लोकसभा चुनावों में अजित पवार ने अपनी पत्नी सुनेत्रा पवार को अपनी चचेरी बहन सुप्रिया सुले के खिलाफ उतार कर पारिवारिक और राजनीतिक रिश्तों में तीखापन ला दिया था, लेकिन समय के साथ उन्होंने यह स्वीकार किया था कि वह फैसला एक भूल था।
राजनीति के उस कठोर दौर के बाद हालिया निकाय चुनावों में उन्होंने जिस परिपक्वता का परिचय दिया, वह उनके व्यक्तित्व का दूसरा और अधिक मानवीय पक्ष सामने लाता है। शरद पवार की पार्टी के साथ गठबंधन कर दोनों एनसीपी को एक मंच पर लाने की पहल उन्होंने खुद की थी।
बहन सुप्रिया के साथ संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने साफ कहा था कि परिवार में कोई मतभेद नहीं हैं और जनता चाहती है कि दोनों दल साथ मिलकर काम करें। यह सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं था, बल्कि एक भावनात्मक स्वीकारोक्ति भी थी।
देखा जाये तो अपने निधन से पहले अजित पवार कम से कम इतना तो कर ही गए कि उन्होंने परिवार से सुलह कर ली, टूटे रिश्तों को जोड़ दिया और महाराष्ट्र की राजनीति को यह संकेत दे दिया कि टकराव नहीं, संवाद ही आगे का रास्ता है।
अपने लंबे राजनीतिक जीवन में अजित पवार ने पृथ्वीराज चव्हाण, देवेंद्र फडणवीस, उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे जैसे मुख्यमंत्रियों के साथ काम किया। गठबंधनों के बदलते दौर में भी अपनी उपयोगिता और असर बनाए रखना उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी रही। अजित पवार चूंकि केंद्र और महाराष्ट्र में सत्तारुढ़ एनडीए के प्रमुख घटक थे इसलिए उनका निधन बड़ा राजनीतिक नुकसान भी है।
देखा जाए तो अजित पवार का जाना सिर्फ एक व्यक्ति का जाना नहीं है, यह उस राजनीतिक शैली का अंत है जो चुपचाप काम करने में यकीन रखती थी। उनकी राजनीति प्रशासनिक पकड़, आंकड़ों की समझ और सत्ता की नस पहचानने की कला से बनी थी।
शरद पवार की विशाल छाया में राजनीति शुरू करना आसान था, लेकिन उस छाया से निकलकर अपनी पहचान बनाना बेहद कठिन था। अजित पवार ने यह कठिन रास्ता चुना।
वह हमेशा इस द्वंद्व में रहे कि उन्हें उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाए या एक स्वतंत्र नेता के रूप में। शायद इसी बेचैनी ने उन्हें बार-बार जोखिम लेने के लिए प्रेरित किया।
2023 की वह सुबह भारतीय राजनीति के सबसे नाटकीय क्षणों में गिनी जाती है जब उन्होंने अचानक सत्ता का समीकरण बदल दिया था। उनकी काफी आलोचना हुई, अविश्वास भी पैदा हुआ, लेकिन यह भी सच है कि उसी क्षण ने उन्हें निर्णायक नेता के रूप में स्थापित किया।
बाद में चुनाव आयोग का फैसला उनके पक्ष में जाना इस बात का संकेत था कि राजनीति में साहस कई बार वैधता भी दिला देता है। अजित पवार की राजनीति नैतिकता के आदर्शों की किताब से कम और यथार्थ की जमीन से ज्यादा निकली थी।
यही कारण है कि वह आलोचकों के निशाने पर भी रहे और समर्थकों के भरोसे का केंद्र भी बने। वह जानते थे कि सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन प्रभाव बनाया जा सकता है। उन्होंने वही किया। विभिन्न लोकसभा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के दौरान मैंने खुद देखा कि वह समर्थकों और कार्यकर्ताओं के कितने करीब रहते हैं और सबकी बातें ध्यान से सुनते हैं। यही कारण था कि बारामती में खासतौर पर अजित दादा के नाम का बोलबाला हर जगह देखने को मिलता है।
आज जब उनका जाना अचानक और असमय हुआ है, महाराष्ट्र की राजनीति एक खालीपन महसूस कर रही है। यह खालीपन सिर्फ पद का नहीं, उस अनुभव का है जो दशकों में गढ़ा जाता है। आने वाले समय में यह सवाल और तीखा होगा कि क्या कोई नेता सहकार से सत्ता तक के इस रास्ते को फिर उसी धार और दृढ़ता से तय कर पाएगा।
इसमें कोई दो राय नहीं कि अजित पवार की विरासत विरोधाभासों से भरी रही, लेकिन शायद यही उनकी सच्ची पहचान भी है। वह सरल नहीं थे, पर प्रभावशाली थे। वह आदर्शवादी नहीं थे, पर निर्णायक थे। और इसी वजह से महाराष्ट्र की राजनीति में उनका नाम लंबे समय तक याद रखा जाएगा।
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