नरम हुए नरोत्तम: दतिया में दिए इस्तीफे स्वीकार नहीं होंगे
KHULASA FIRST
संवाददाता

सीएम, प्रदेश अध्यक्ष व संगठन मंत्री से मुलाकात के बाद सहज हुए मिश्रा
पार्टी गलियारों में बस एक ही चर्चा- नरोत्तम का भी हो गया शिकार, प्रतिपक्ष बोला-सीएम ने कटवाया टिकट
भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को सब जगह से मिल रहे ताने- अब अगली बारी आपकी, मार्गदर्शक मंडल कर रहा इंतजार
पार्टी में आम राय- मिश्रा का टिकट काटकर ठीक नहीं किया गया, बदलाव करना था तो पहले भरोसे में लेना था
भाजपा में हुई भितरघात के बाद दतिया उपचुनाव में कांग्रेस ने भी बदली रणनीति, तयशुदा टिकट बदला, राजघराने को आगे किया
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भाजपाई ‘नरों’ में जो ‘उत्तम’ थे, वे महज दो-ढाई बरस में पार्टी के लिए ‘उत्तम’ नहीं रहे। जो कभी पार्टी की बिगड़ी तस्वीर में रंग भरने के लिए जाने जाते थे, वे बेरंग लौटाए जा रहे हैं। बुरे दौर में जिनसे पार्टी का ‘नूर’ था, वे अब बेनूर हो गए।
वह भी महज एक उपचुनाव के लिए। अब उनमें अकस्मात अनेक खामियां नजर आने लगीं, वह भी ऐन मौके पर। वह भी सब तैयारियों के बाद। अब ‘नर’ के कुनबे में आक्रोश पसरा हुआ है। प्रदेश ही नहीं, देश कमलदल से जुड़े लोगों की करतूत देख रहा है।
जो सूबा, भाजपा के लिए संगठन की दृष्टि से सबसे ज्यादा आदर्श था, वहां सीएम-प्रदेश अध्यक्ष मुर्दाबाद के नारे गूंज रहे हैं। पार्टी दफ्तर पर ताले जड़ दिए गए, दर्जनों इस्तीफे आगे कर दिए गए, सड़कें रोक दी गईं। नेशनल हाईवे पर घंटों का जाम लगा दिया।
पुलिस प्रशासन के आला अफसरों तक पर गुस्सा उतारा गया। बाजार, शहर बंद हो गया। बावजूद इसके सब कुछ ‘कुशलमंगल’ का राग गुंजायमान है। अब ये कुशलता स्थायी है या अल्प?, यह कमलदल के लिए बड़ा सवाल हो गया है। फिलहाल तो पार्टी गलियारों में एक ही गूंज है- सत्ता वाली भाजपा का एक और नींव का पत्थर शिकार हो गया।
न रोत्तम मिश्रा का टिकट काटना भाजपा के लिए बड़े बवाल का कारण बन गया है। हालांकि मिश्रा की सत्ता व संगठन के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात के बाद फिलहाल तूफान शांत हो गया है, लेकिन यह सन्नाटा आगामी तूफान से पहले की शांति ही बताया जा रहा है। पार्टी का दिल्ली व भोपाल का नेतृत्व भले ही इसे एक रणनीतिक जीत मान रहा हो, लेकिन ये हकीकत है कि मिश्रा के टिकट काटने की प्रक्रिया ने पार्टी के अंदर एक बड़े आक्रोश को जन्म दे दिया है।
एक सीनियर लीडर के साथ पार्टी नेतृत्व के हुए व्यवहार से दल का एक बड़ा धड़ा स्वयं को भी आहत मान रहा है। भले ही स्वयं नरोत्तम अपने को सहज प्रकट करने की कोशिशें कर रहे हैं, लेकिन यह तय है कि इस प्रकरण से पार्टी के तमाम सीनियर लीड़र स्वयं को असहज महसूस कर रहे हैं और औसत कार्यकर्ता भी।
प्रदेश संगठन ने भले ही ये कहकर दतिया के नेताओं व कार्यकर्ताओं के गुस्से को शांत करने की कोशिश की है कि किसी का भी इस्तीफा स्वीकार नहीं होगा, लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट है। पार्टी गलियारों में बस एक ही चर्चा है कि नरोत्तम का शिकार हो गया।
प्रदेश के प्रतिपक्ष नेता ने ये कहकर पूरे मामले को लेकर आग में घी का काम किया कि नरोत्तम का टिकट सीएम ने कटवाया। हालांकि सीएम के साथ नरोत्तम की बैठक में इस बात का खुलासा भी हुआ कि दतिया में ऐन मौके पर बदलाव क्यों और कैसे हुआ। अब इस सफाई से नरोत्तम कितने सहमत हुए ये तो वे स्वयं जानें, लेकिन पार्टी में एक अविश्वास की गहरी लकीरों ने अब स्थायी जगह बना ली है।
सर्वे बना आधार
बीते दो दिन में पाट में ये आम राय निकलकर सामने आई है कि नरोत्तम जैसे नेता का अगर टिकट काटना भी था तो उन्हें भरोसे में लेना था। जब वे पूर्ण तैयारी कर चुके थे और अपने समर्थकों के साथ रणनीतिक रूप से मैदान में उतर आए थे तब उनके साथ इस तरह का जो व्यवहार किया गया है वह भाजपा की कभी परिपाटी नहीं रहा है।
जिस सर्वे को आधार बनाकर टिकट काटा गया वह कब हुआ और उसका रिजल्ट कब आया… ये भी पहेली बन गया है। सवाल ये भी खड़ा हुआ है कि नरोत्तम की जगह जिन्हें टिकट दिया गया उनका नाम किस सर्वे में आगे था? कुल मिलाकर दतिया उपचुनाव में भाजपा में चल रही लड़ाई को और हवा दे दी है और कोई नहीं जानता ये संघर्ष कब और कहां जाकर खत्म होगा।
नींव के पत्थरों के साथ व्यवहार पर जनता की भी अब नजरें
कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल, राकेश सिंह, गोपाल भार्गव, नरेंद्र सिंह तोमर ही नहीं, बल्कि शिवराज सिंह चौहान के साथ भी हो रहा व्यवहार अब पार्टी के औसत कार्यकर्ता को खटकने लगा है। पूरे मामले में पार्टी के अंदर ही अंदर एक बड़ा गुस्सा पनप रहा है।
पार्टी वर्कर्स की ये असहजता शीर्ष नेतृत्व भाप नहीं पा रहा या जानबूझकर अनजान बन रहा है, ये समझ से परे है। पार्टी के ये तमाम बड़े नेता प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में अपनी मजबूत पकड़ ही नहीं रखते, बल्कि पार्टी के बुरे दिनों में यही नेता दल की मजबूती के शिल्पकार भी रहे हैं।
नरोत्तम भी उनमें से एक थे। जब ग्वालियर-डबरा-दतिया जैसे चंबल बेल्ट पर कांग्रेस का दबदबा था, तब नरोत्तम जैसे नेताओं ने ही कमलदल की जड़ें पार्टी में अनथक संघर्ष के बाद इलाके में जमाईं। अब जब इस इलाके में पार्टी के लिए बेहद अनुकूल हालात हैं, तब ऐसे नींव के पत्थरों को यूं अलग-थलग करने के फैसले भाजपा में ही नहीं, जनता की नजरों में भी सवालिया निशान खड़े कर रहे हैं।
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