7000 फीट ऊपर देवदार के जंगलों में छिपा नागलोक: मन्नत पूरी होने पर चढ़ाते हैं त्रिशूल और धातु के सर्प
KHULASA FIRST
संवाददाता

यमुना मर्दन के बाद कहां गया था कालिया नाग, उत्तराखंड की पहाड़ियों में मौजूद है द्वापरयुग के साम्राज्य के साक्ष्य, चार धाम मार्ग का सबसे रोमांचक ‘ऑफ-बीट’ ट्रेक, झुककर कंदराओं में प्रवेश और ‘नागराजा’ के रूप में श्रीकृष्ण के दर्शन
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
उत्तराखंड की चार धाम यात्रा के दौरान गंगोत्री और यमुनोत्री के मुख्य मार्गों पर बहती नदियों और पहाड़ों की खूबसूरती तो हर कोई देखता है, लेकिन इन जाने-पहचाने रास्तों से थोड़ा दूर, प्रकृति के घने आगोश और बादलों को छूती ऊंचाइयों पर एक ऐसा संसार भी बसता है, जिसके रहस्य आज भी विज्ञान और आधुनिकता को चुनौती देते हैं।
उत्तरकाशी और टिहरी गढ़वाल की सीमा पर, प्रतापनगर ब्लॉक की दुर्गम पहाड़ियों में समुद्र तल से लगभग 7,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित ‘सेम मुखेम’ एक ऐसा ही चमत्कारी स्थान है।
घने बांज, बुरांश और देवदार के जंगलों के बीच छिपे इस मंदिर को यदि देवभूमि का ‘पाताल लोक’ कहा जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह साक्षात भगवान श्रीकृष्ण और पौराणिक कालिया नाग के ऐतिहासिक मिलन और उनके साम्राज्य की जीवित गवाही है।
कालिया नाग का गढ़- यमुना से भागकर यहां बनाया था आशियाना... श्रीमद्भागवत पुराण और स्थानीय लोककथाओं में इस स्थान का संबंध द्वापरयुग से सीधे जुड़ता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब बालकृष्ण ने मथुरा में यमुना नदी के भीतर कालिया नाग का मर्दन किया था, तब उन्होंने कालिया नाग को ब्रजभूमि छोड़कर चले जाने का आदेश दिया था।
यमुना से विदा होकर कालिया नाग ने रहने के लिए संसार के सबसे सुरक्षित और दुर्गम कोने की तलाश शुरू की। उसकी यह खोज उत्तराखंड के इस सुदूर पहाड़ी क्षेत्र में आकर समाप्त हुई।
यहां की पर्वत श्रृंखलाओं के एकांत और अलौकिक वातावरण को कालिया नाग ने अपना नया साम्राज्य बनाया। यही कारण है कि सदियों से इस पूरे क्षेत्र को नागों की भूमि या ‘नागलोक’ के रूप में जाना जाता है।
जहां ‘नागराजा’ के रूप में पूजे जाते हैं द्वारकाधीश... इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां भगवान विष्णु या कृष्ण की पारंपरिक चतुर्भुज मूर्ति नहीं है। यहां स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ‘नागराजा’ (नागों के राजा) के रूप में विराजमान हैं।
मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार बेहद संकरा, नीचा और रहस्यमयी है। इसमें प्रवेश करते समय श्रद्धालु को झुककर रेंगते हुए जाना पड़ता है, जिससे बिल्कुल ऐसा अहसास होता है मानो कोई पाताल लोक की किसी गुप्त नाग-गुफा के भीतर जा रहा हो। गर्भगृह के भीतर शिलाखंड पर नाग की अद्भुत आकृति उभरी हुई है।
घने, मखमली जंगलों के बीच से होकर गुजरते हैं लोग... यहां सदियों से चली आ रही एक अनूठी परंपरा है। जब श्रद्धालुओं की मन्नतें पूरी होती हैं, तो वे मंदिर में तांबे या लोहे के बने त्रिशूल और धातु के बने नाग के प्रतीक चढ़ाते हैं।
मंदिर परिसर और उसके आस-पास हजारों की संख्या में मौजूद ये त्रिशूल यहां आने वाले किसी भी नए यात्री के रोंगटे खड़े करने के लिए काफी हैं। मंदिर तक पहुंचने के लिए यात्रियों को घने, मखमली जंगलों के बीच से होकर गुजरना पड़ता है, जहां सूरज की किरणें भी बमुश्किल जमीन को छू पाती हैं।
रास्ते में मिलने वाले बुग्याल (घास के मैदान), पहाड़ों की ठंडी हवा और दूर-दूर तक फैली हिमालय की चोटियां इस आध्यात्मिक यात्रा को एक कड़े एडवेंचर ट्रेक में बदल देती हैं।
गंगोत्री और यमुनोत्री धाम की यात्रा पर निकले जो श्रद्धालु धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ प्रकृति के अनछुए और शांत रूपों को देखना चाहते हैं, उनके लिए यह ट्रेक किसी जीवन बदलने वाले अनुभव से कम नहीं है।
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