एकाधिकार और देश की उड़ान पर खतरा
Khulasa First
संवाददाता

प्रो. आरके जैन वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
कभी आसमान आम आदमी का सपना था। आज हवाई यात्रा केवल अमीरों का खेल बन गई है। दिल्ली से चेन्नई का 9 हज़ार का टिकट अचानक 60–80 हज़ार तक पहुंच गया। यह केवल किराया नहीं, यह भारतीय एविएशन की नग्न सच्चाई का उद्घोष है। इंडिगो का हालिया मेल्टडाउन कोई आकस्मिक घटना नहीं, यह उस कमजोर ढांचे की चेतावनी है जिस पर वर्षों तक भरोसा किया गया।
जब एक ही कंपनी के पास 63% से अधिक बाज़ार होता है, तो उसकी गड़बड़ी पूरे देश को हिला देती है। सबक साफ है-जब सारा दांव एक घोड़े पर होगा, और वह घोड़ा लंगड़ा हो, तो पूरा देश लंगड़ाएगा।
इंडिगो कभी ‘लो-कॉस्ट किंग’ थी। आज वही किंग बिना ताज और बिना तैयारी के संकट के बीच नंगा खड़ी है। नया एफडीटीएल (फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन) नियम आया-पायलटों को पर्याप्त आराम मिले। यह सही कदम है, लेकिन तैयारी न के बराबर थी। परिणाम भयानक रहा। पायलटों की भारी कमी, क्रू शॉर्टेज और सिस्टम क्रैश ने दिल्ली के मुख्य हब से उड़ानों को रद्द कर दिया।
मुंबई में टिकट 48-93 हज़ार और बेंगलुरु में 80-92 हज़ार तक पहुंच गई। एक मां अपनी बीमार बेटी के साथ दिल्ली नहीं पहुंच पाई। एक स्टार्टअप फाउंडर 2 करोड़ की फंडिंग राउंड चूक गया। यह केवल आंकड़े नहीं; यह टूटते सपनों और जीवन की कहानियां हैं।
सच्चाई यह है कि सस्ती उड़ानों का सपना पूरा करने के चक्कर में हमने हवाई यात्रा की रीढ़ ही तोड़ दी। पिछले दो वर्षों में इंडिगो के चालीस से अधिक विमान जमीन अभी भी प्रैट एंड व्हिटनी इंजन की खराबी के कारण ग्राउंडेड हैं। नए विमानों के आदेश में देरी और वैकल्पिक योजना की कमी ने हालात और गंभीर बना दिए। स्पाइसजेट दिवालिया होने की कगार पर है।
विस्तारा और एयर इंडिया का विलय 2024 में पूरा हो चुका है, लेकिन एकीकरण प्रक्रिया अभी जारी है। अकासा तेजी से नई उड़ानें शुरू कर रही है, लेकिन अभी उसका प्रभाव सीमित है। परिणाम स्पष्ट है-इंडिगो की एक छींक पूरे क्षेत्र को हिला देती है। यह केवल एकाधिकार नहीं है, यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरे की चेतावनी है।
सुधार की शुरुआत तभी होगी जब हम एकाधिकार के खतरे को गंभीरता से समझें। टाटा को अपने विमान बेड़े में तेजी से तीन सौ नए विमान शामिल करने की अनुमति दी जानी चाहिए। अकासा को अपने 222 विमानों के मौजूदा ऑर्डर को तेजी से पूरा करने का अवसर मिलना चाहिए। नए निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए फ्लाइट राइट्स को पूंजी बाजार में लाना अनिवार्य है। इससे न केवल प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, बल्कि यात्रियों के लिए विकल्प और किरायों में स्थिरता भी आएगी।
सिर्फ़ कंपनियों को विस्तार देने से ही काम नहीं चलेगा। हवाई अड्डों के बुनियादी ढांचे पर भी तेज़ी से काम करना अनिवार्य है। जेवर, नवी मुंबई और 2030 तक बनने वाले पचास नए हवाई अड्डे केवल इमारतें नहीं हैं, ये पूरे भारतीय हवाई नेटवर्क की जीवन रेखा हैं। भीड़भाड़ वाले हबों को कम करना, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी बढ़ाना और लॉजिस्टिक सिस्टम को मज़बूत करना अब सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। इससे देशभर में उड़ानों की सुगमता बढ़ेगी और एयरलाइंस के संचालन में स्थिरता सुनिश्चित होगी।
साथ ही, पायलटों की गंभीर और लगातार बढ़ती कमी को तुरंत और प्रभावी ढंग से दूर करना अनिवार्य है। वर्तमान में भारत में लगभग दस-बारह हजार सक्रिय पायलट हैं, जबकि 2030 तक यह संख्या बीस हजार से अधिक होना चाहिए, ताकि देश का घरेलू और अंतरराष्ट्रीय हवाई नेटवर्क सुचारु रूप से संचालित हो सके।
इसके लिए नई उड़ान अकादमियां खोली जानी चाहिए और मौजूदा प्रशिक्षण क्षमता को कई गुना बढ़ाना होगा। साथ ही, लड़कियों को प्रोत्साहित करने और महिला पायलटों की संख्या बढ़ाने के लिए विशेष कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए। यह केवल संख्या का सवाल नहीं है; यह उद्योग की मजबूती और समाज में समान अवसरों की अनिवार्यता का प्रतीक है।
किराया नियंत्रण पर भरोसा करना समाधान नहीं है। आज टिकट साठ-पैंसठ हज़ार इसलिए हैं क्योंकि सप्लाई कम है, मांग नहीं। सप्लाई बढ़ाओ-नए विमान, नई एयरलाइंस, सुचारु संचालन - और किराया अपने आप आठ हज़ार तक नीचे आ जाएगा। यह अर्थशास्त्र का बुनियादी नियम है, जिसे हम भावनाओं और तात्कालिक निर्णयों में भूल चुके हैं।
यह संकट दर्द ज़रूर दे रहा है, लेकिन यह शायद आखिरी ऐसा दर्द हो सकता है। अगर सरकार और उद्योग ने आज साहस दिखाया, तो 2027 तक भारत का घरेलू हवाई नेटवर्क दुनिया का सबसे मजबूत, सबसे सस्ता और सबसे विविध नेटवर्क बन सकता है।
साठ-अस्सी हज़ार का टिकट हमें यह कटु सच याद दिला रहा है कि आसमान किसी एक कंपनी की जागीर नहीं हो सकता। सस्ती उड़ान का सपना तभी साकार होगा जब उसे किसी एकाधिकार की दया, मनमानी और कमजोरी पर निर्भर न रहने दिया जाए।
आकाश किसी एक का नहीं-वह हम सबका अधिकार है, हमारी सामूहिक उम्मीद है। अब फैसला हमारे हाथ में है। या तो हम अपना आसमान वापस छीनकर संतुलित, मजबूत और न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाएं, या फिर हमेशा ज़मीन पर खड़े होकर महंगी उड़ानों के सामने बेबस आंसू बहाते रहें।
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