गुप्तकाशी का मणिकर्णिका कुंड: केदारनाथ मार्ग का अनसुलझा रहस्य
KHULASA FIRST
संवाददाता

जहां भूगर्भ से प्रकट होती हैं गंगा-यमुना, पहाड़ों के सीने से बहती दो रहस्यमयी धाराएं
हाईवे से महज चंद कदम दूर, जहां महादेव की ‘लुका-छिपी’ की गवाह बनी गुप्तकाशी
काशी जैसा पुण्य, मणिकर्णिका कुंड के आचमन के बिना अधूरी है बाबा
केदार की यात्रा गोमुख से गिरती ‘गंगा-यमुना’ की अदृश्य धारा, उस कुंड की कहानी, जहां पांडवों के भय से छिपे थे शिव
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
हिमालय की कंदराओं में आस्था और अध्यात्म के कई ऐसे रहस्य छिपे हैं, जो विज्ञान की कसौटियों को भी हैरान कर देते हैं। केदारनाथ धाम की यात्रा पर जाने वाले लाखों श्रद्धालु हर साल एक ऐसे चमत्कारिक स्थान के बेहद करीब से गुजरते हैं, जिसके पौराणिक और भूगर्भीय रहस्य से अधिकांश लोग आज भी अनजान हैं।
रुद्रप्रयाग जिले में समुद्र तल से 1,319 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ‘गुप्तकाशी’ का ऐतिहासिक मणिकर्णिका कुंड महज एक जलस्रोत नहीं, बल्कि सनातन आस्था का वह अनूठा केंद्र है, जहां सदियों से दो अज्ञात जलधाराएं ‘गंगा’ और ‘यमुना’ के रूप में अनवरत बह रही हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह वही स्थल है जहां महादेव ने पांडवों से छिपने के लिए शरण ली थी और यहां का जल साक्षात मोक्षदायिनी नदियों का गुप्त मिलन कराता है।
रफ्तार की धुन में छूट जाता है महातीर्थ, तीर्थयात्रियों के लिए विशेष संदेश
आज के दौर में जब चार धाम यात्रा सुगम ऑल-वेदर रोड की बदौलत बेहद तेज हो चुकी है, तब अधिकांश तीर्थयात्री रुद्रप्रयाग और अगस्त्य मुनि को पार कर सीधे सोनप्रयाग या केदारनाथ बेस कैंप पहुंचने की जल्दी में रहते हैं। मुख्य हाईवे से चंद मीटर की दूरी पर स्थित यह पौराणिक धरोहर इस आपाधापी के कारण अक्सर उपेक्षित रह जाती है।
इतिहासकारों और स्थानीय तीर्थ पुरोहितों का मानना है कि केदारनाथ की चढ़ाई शुरू करने से पहले गुप्तकाशी के इस मणिकर्णिका कुंड का जल ग्रहण करना और विश्वनाथ से आज्ञा लेना यात्रा का अनिवार्य और प्राचीन नियम रहा है।
महादेव के अंतर्ध्यान होने की भूमि, क्यों पड़ा गुप्तकाशी नाम
महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद पांडव अपने ही भाइयों (कौरवों) की हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव की खोज में हिमालय निकले थे। पांडवों को गोत्र वध के पाप से दुखी देखकर महादेव उनसे मिलना नहीं चाहते थे।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब शिव पांडवों को आते देख काशी से भागे, तो वे इसी सुरम्य पहाड़ी क्षेत्र में आकर छिप गए। शिव के यहां ‘गुप्त’ होने के कारण ही इस पूरे क्षेत्र का नाम ‘गुप्तकाशी’ पड़ा।
बाद में जब पांडव यहां भी पहुंच गए, तो महादेव ने बैल (नंदी) का रूप धारण कर लिया और अंततः केदारनाथ में अंतर्ध्यान हो गए। बाबा केदार की यात्रा का यह अहम पड़ाव आज भी उस पौराणिक लुका-छिपी का जीवंत गवाह है।
मणिकर्णिका कुंड, जहां भूगर्भ से टकराती हैं दो दिव्य धाराएं
गुप्तकाशी के प्राचीन विश्वनाथ मंदिर परिसर में स्थित ‘मणिकर्णिका कुंड’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें दो अलग-अलग दिशाओं से पत्थरों को तराशकर बनाए गए ‘गौमुखों’ (गाय के मुख) से जल की धाराएं लगातार गिरती हैं।
इनमें से एक धारा को ‘गंगा’ और दूसरी को ‘यमुना’ का प्रतीक माना जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि इस पहाड़ी इलाके में इन दोनों धाराओं का मुख्य स्रोत क्या है, यह आज तक कोई स्पष्ट नहीं कर पाया है। भीषण गर्मी हो या कड़ाके की ठंड, इन धाराओं का प्रवाह और इनका औषधीय जल कभी नहीं सूखता।
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