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निगम के रिकॉर्ड में बड़ा फर्जीवाड़ा: कूटरचित दस्तावेजों से संपत्ति हड़पने का किया खेल

KHULASA FIRST

संवाददाता

30 मई 2026, 2:17 pm
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निगम के रिकॉर्ड में बड़ा फर्जीवाड़ा

भू-माफिया और अधिकारियों की मिलीभगत से खुला फेक खाता, महीनों बाद भी कार्रवाई ठंडे बस्ते में

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नगर पालिक निगम के राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। भागीरथपुरा क्षेत्र में स्थित मकान नंबर 586 को हड़पने के लिए भू-माफियाओं और निगम के अधिकारियों की मिलीभगत से हुए बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा महीनों पहले हो चुका है, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती के कारण अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।

मुख्य सूत्रधार भू-माफिया चंद्रप्रकाश- शिकायतकर्ता ललित उर्फ गोलू कश्यप ने बताया कि उनके दादा दिवंगत दादूराम कश्यप द्वारा वर्ष 1988 में क्रय किए गए मकान को हड़पने के लिए शातिर भू-माफियाओं ने तत्कालीन राजस्व अधिकारियों के साथ मिलकर कूटरचित दस्तावेजों के जरिये मकान नंबर 586/1 के नाम से एक फर्जी संपत्ति कर खाता खुलवा लिया है, जिसका धरातल पर कोई अस्तित्व ही नहीं है।

इस पूरे फर्जीवाड़े का मुख्य सूत्रधार भू-माफिया चंद्रप्रकाश उर्फ हज्जन कश्यप है। चंद्रप्रकाश का आपराधिक रिकॉर्ड बेहद लंबा है और उस पर नौ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं।

इसमें हीरा नगर थाने का वह चर्चित मामला भी शामिल है, जिसमें उसने सरकारी आईटीआई की आठ एकड़ बेशकीमती जमीन के फर्जी दस्तावेज बनाकर अवैध कॉलोनी काटी थी।

इसके लिए उसे पांच साल की जेल की सजा भी हो चुकी है।

अब यही माफिया अपने सहयोगियों सनी कश्यप, छोटेलाल, ईश्वर लाल और गोविंद के साथ मिलकर कश्यप परिवार की संपत्ति को हड़पने के लिए सक्रिय है।

पीड़ित परिवार को मिल रही धमकियां- आरोपियों का हौसला इतना बुलंद है कि वे लगातार पीड़ित परिवार को जान से मारने की धमकियां दे रहे हैं। मौके पर किए गए पंचनामे में भी ललित कश्यप का कब्जा पाया गया है।

पीड़ित परिवार ने अब निगम प्रशासन और पुलिस से तत्काल प्रभाव से इन भू-माफियाओं और इसमें शामिल भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ धोखाधड़ी की संगीन धाराओं में मामला दर्ज कर कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

न आरोपियों पर एफआईआर, न अधिकारियों पर कार्रवाई
इस षड्यंत्र में तत्कालीन प्र. सहा. राजस्व अधिकारी (जोन क्रमांक 03) जितेंद्र पांडे के साथ-साथ निगम के राजस्व एवं जोन के भवन अधिकारियों की भूमिका भी संदिग्ध है।

आरोप है कि नियमों को ताक पर रखकर बिना किसी भौतिक सत्यापन या वैध दस्तावेजों के खाता क्रमांक 1000908320 जारी कर दिया गया।

विभागीय जांच में भी यह खाता पूरी तरह फर्जी पाया गया, जिसके बाद इस फर्जीवाड़े को रोकने के लिए विभाग को आधिकारिक प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी थी, लेकिन महीनों का समय बीत जाने के बाद भी न तो आरोपियों पर एफआईआर दर्ज हुई और न ही जिम्मेदार अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई की गई।

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